Tenali Ramakrishna Stories in Hindi – तेनाली रामकृष्णा की कहानियाँ

Tenali Ramakrishna Stories in Hindi – तेनाली रामकृष्णा की कहानियाँ
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  • नमस्कार, आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है। दोस्तों आपने Tenali Raman का नाम तो सुना ही होगा। तेनाली रामकृष्ण, जिन्हे Vikatakavi के नाम से भी जाना जाता था, वे एक तेलुगु कवि थे जो आज के आंध्र प्रदेश क्षेत्र से लोकप्रिय थे। वे आम तौर पर उनकी बुद्धि और हास्य के लिए जाने जाते थे। तो दोस्तों आज हम उन्हीं की कुछ रोचक किस्से जानेंगे| दोस्तों आज मैं आपको इस आर्टिकल में Tenali Ramakrishna stories in hindi में बताऊंगा जो बहुत ही रोचक है

Tenali Ramakrishna Stories in Hindi/ तेनालीराम की कहानियां

Tenali Ramakrishna Stories in Hindi

तेनालीराम की नयी कहानियां

Tenali Ramakrishna Stories No.1 ->  तेनाली गॉव का रामलिंग

 

तेनालीराम जिसका मूल नाम रामलिंग था, बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि का था। पिता का साया शिशु अवस्था में ही उठ जाने के कारण उसका लालन-पालन ननिहाल (तेनाली नामक गांव) में हुआ था, अत: वह जनसामान्य में तेनालीराम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तेनालीराम जब युवा हुआ तो उसका विवाह अगरया नामक एक युवती से कर दिया गयाउसे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई ।

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तेनालीराम ने विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय के बारे में सुन रखा था कि वे विद्वजनों का बड़ा आदर करते हैं। उसकी भी इच्छा हुई कि वह दरबार बुद्धि कौशल का देकर कुछ धन-सम्मान प्राप्त परिचय करेलेकिन वह इस पर
में पड़ गया कि कैसे फिर कुछ साहस राजा तक पहुंचा जाए? जुटाकर वह राज क पास जाने की ठान बैठा।

जब वह विजयनगर की ओर जा रहा था, तभी मंगलगिरी नामक भेंट कृष्णदेव राय के राजगुरु ताताचारी से हुई। तेनालीराम ने राजगुरु की बडी धकी और राजा से मिलवाने की प्रार्थना की।

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राजगुरु ने सोचा कि यदि ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति राजा के पास पहुंचेगा तो पारखी राजा इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। संभव है दरबार में इसे रख ।  उस स्थिति में उसका क्या होगा? सोचकर राजगुरु मीठी-मीठी कर;
यह बातें तेनालीराम को राजा से मिलवाने का आश्वासन भर देता रहा, लेकिन मन-ही-मन उससे ईष्र्या करने लगा।

 

जाते समय राजगुरु ने तेनालीराम से कहा”तुम चिंता न करोजैसे ही कोई अवसर मिलेगामैं तुम्हें विजयनगर बुलवा लूगा।

राजगुरु से भेंट होने के बाद तेनालीराम विजयनगर जाने का कार्यक्रम रद्द करके गांव लौट आया और निमंत्रण की प्रतीक्षा करने लगा। काफी समय बीत गया, लेकिन निमंत्रण नहीं मिला। तब गांव के लोग उसका मजाक । उड़ाने लगे

आखिर एक दिन वह अपने परिवार सहित विजयनगर की ओर चल पड़ा। वहां पहुंचकर वह राजमहल की ओर कदम बढ़ाने लगा। मार्ग में जो कोई उसका परिचय पूछता तो वह कह देता, “में राजगुरु का शिष्य हूं। ” इस प्रकार महल तक पहुंचने में उसे कोई परेशानी नहीं हुईराजगुरु के कक्ष के निकट पहुंचकर उसने अपनी मां, पत्नी व पुत्र को बाहर ही छोड़ दिया। कक्ष के द्वार पर पहुंचकर उसने एक सेवक से कहा, “राजगुरु से जाकर कहीं कि तेनाली गांव से रामलिंग उनसे मिलने आया है।

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सेवक अंदर गया और कुछ ही देर में लौट आया और बोला, राजगुरु का कहना है कि वह इस नाम के किसी व्यक्ति को नहीं जानते।”

तेनालीराम ने जब यह सुना तो वह हतप्रभ रह गया। उसे गुस्सा भी आया आवेश में आकर वह कक्ष में चला गया
सेवकों को एक तरफ करके स्वयं ही और राजगुरु के पास जाकर बोला, “राजगुरु: क्या आपने मुझे नहीं पहचाना? मैं वही रामलिंग हूं जिसने मंगलगिरी में आपकी तन-मन से सेवा की थी। इतनी जल्दी भूल गए?”

तेनालीराम को क्रोधित देख राजगुरु ने कुछ सेवकों को बुलाकर आदेश दिया, “यह कोई सिरफिरा लगता है। इसे धक्के देकर बाहर कर दो!” सेवकों ने तेनालीराम को कक्ष से ही नहीं वरन् महल से भी बाहर धकेल दिया
बाहर खड़े लोग तेनालीराम का मजाक उड़ाने लगे। तभी उसने निर्णय लिया कि एक दिन वह राजगुरु से इस अपमान का बदला अवश्य लेगा। फिर वह अपने गांव लौट आया

 

Tenali Ramakrishna Stories No.2 ->राजदरबाटी बना तेनालीराम

 

एक बार महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में चर्चा चल रही थी, ” यह संसार क्या है? जीवन क्या है?”
उपरोक्त विषय पर विद्वजन अपने-अपने विचार थे।

अकस्मात्व्य क्त कर रह । तेनालीराम भी किसी तरह दरबार में जा पहुंचा और सबसे पीछे जाकर चुपचाप बैठ गया।
चर्चा चलते काफी समय हो गया था तभी एक विद्वान ने कहा”महाराज! यह संसार तो एक धोखा मात्र है। जो कुछ हम देखते हैं, सुनते हैं, मुंचते चखते या हैं यह सब हमारी कल्पना मात्र है। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। ”

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तभी पीछे बैठे तेनालीराम ने हैरान होकर “! क्या सब पूछा, महाराजयह कोरी कल्पना ही है? क्या इसमें वास्तविकता कुछ भी नहीं है?”

वह विद्वान तेनालीराम से मुखातिब होकर बोला, “हां, हमारे शास्त्रों, धर्मग्रंथों में ऐसा ही बताया गया ह।”
उन महाशय की बात सुनकर दरबार में सन्नाटा-सा छा गया।

तभी सन्नाटे को चीरती हुई तेनालीराम की आवाज गूंजी, “यदि ऐसा ही है तो हमें इस सत्यता को परखना चाहिए। मेरा सुझाव है कि महाराज की ओर से आज दावत दी जाए।

सभी से अनुरोध है कि उस दावत में शामिल हों, लेकिन विद्वान महाशय न आएंवह केवल कल्पना ही करें कि वे दावत चटखारे लेकर खा रहे हैं।”
तेनालीराम की बात सुनकर दरबार में बैठे दरबारी व स्वयं महाराज ठहाका लगाने लगे। इधर विद्वान की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी।

उसी दिन से महाराज ने तेनालीराम को अपने दरबार का विदूषक घोषित कर दिया और उसे स्वर्ण मुद्राओं से भरा एक थाल भी भेंट किया। दरबार तालियों की 1 गड़गड़ाहट से गंज उठा। उन ताली बजाने वालों में राजगुरु ताताचारी भी था।

 

Tenali Ramakrishna Stories No.3 -> दो हाथ धुआं

 

एक बार तेनालीराम के प्रशंसक महाराज से मुखातिब होकर बोले”महाराज चतुराई के मामले में तेनालीराम से बढ़कर अन्य कोई नहीं है।”
यह बात एक मंत्री के गले नहीं उतरी। वह खड़ा होकर बोला, “महाराज! ऐसी बात नहीं है। आपके दरबार में चतुरजनों का बिल्कुल भी अभाव नहीं है।
लेकिन..।” “लेकिन क्या?” महाराज ने उत्सुकतावश पूछा।

तभी वहां उपस्थित सेनापति बोला, “महाराज! मंत्रीजी कहना चाहते हैं कि तेनालीराम के होते अन्य किसी को चतुराई दिखाने का अवसर ही नहीं मिलता” कुछ सोचकर महाराज बोले”अच्छाइस बार तेनालीराम को कुछ भी नहीं करने दिया जाएगा, लेकिन मैं चतुर उसी को मायूंगा जो सामने जल रही धूपबत्ती के धुएं में से दो हाथ धुआं मुझे लाकर देगा।”

आदेश अजीब था, लेकिन पालना तो करनी ही थी। एक-एक करके सभी धुआं नापने लगेधुआं नापते-नापते शाम हो गईलेकिन कोई भी उसे नाप न सका। जब ध नहीं नापा जा सका तब राजा ने तेनालीराम की ओर देखकर कहा”तेनालीराम, अब तुम कहो?”

तभी अन्य दरबारी बोल पड़ेमहाराजयदि यह धुआं नाप सके तो हम , “हां-हां ! इसे चतुर मान लेंगे।”
जब सब सहमत हो गए तब राजा ने तेनालीराम को ही यह कार्य सौंपा तेनालीराम ने अपने एक प्रशंसक के कान में कुछ कहा। वह प्रशंसक वहां से उठकर चला गया। इधर उसके आलोचक इस फिराक में थे कि देखें तेनालीराम क्या गुल खिलाता है।

इस बीच तेनालीराम का प्रशंसक दो हाथ लंबी कांच की एक नली ले आया जिसका एक सिरा बंद था और दूसरा खुला तेनालीराम ने वह नली धूपबत्ती के ऊपर लगा जिससे सारा उस नली दी धुआ 1 में भर गया।

फिर उसने खुले सिरे को रुई की डाट लगाकर बंद कर दिया और कहा“ लीजिए महाराज! दो हाथ धुआं आपको अर्पित है।” महाराज ने वह नली हाथ में ली। फिर उसे सिंहासन के पास रखकर गले में पड़ी मोतियों की माला तेनालीराम के गले में डाल दी और कहा”तेनाली राम वास्तव में ही तुम चतुर हो।”

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Tenali Ramakrishna Stories No.4 -> रसगुल्ले की जड़

सर्वविदित है कि ईरान में गन्ने नहीं होते। इसलिए वहां के लोग गन्ने के बारे में कुछ नहीं जानते।

एक बार की बात है कि वहां का एक व्यापारी चांद खां | भारत म निजी यात्रा पर आयाकई दिनों तक उसने अनेक नगरों का भ्रमण किया।

एक दिन जब वह एक गाव से होकर गुजर रहा था तब उसन दखा कि एक व्यक्ति बड़े चाव से गन्ना चूस रहा था। उसने उस व्यक्ति से पूछा”यह क्या चीज है? ”

 

वह व्यक्ति मजाकिया स्वभाव का था। उसने मजाक करते हुए कहा, इसे रसगुल्ले की जड़ कहते हैं। यह बहुत स्वादिष्ट होती है।”
चांद खां ने थोड़ा-सा गन्ना उस व्यक्ति से लेकर चूसा अच्छा लगा।  वह कुछ गन्ने जाते समय अपने साथ ईरान ले गया। काफी समय बाद चांद खां व्यापारिक यात्रा पर पुन: भारत आया।

इस बार वह विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय का शाही मेहमान था, अतउसकी बहुत आवभगत हुई महाराज ने उस दिन अपने शाही मेहमान के लिए विशेषरूप से रसगुल्ले बनवाए थे।

रात्रि भोजन के समय उन्होंने अपने एक दरबारी के हाथ चांदी की तश्तरी में रसगुल्ले रखवाकर शाही मेहमान के लिए भिजवाए।

वे सोच रहे थे कि रसगुल्ले शाही मेहमान को बहुत पसंद आएंगे तथा वह और रसगुल्लों की फरमाइश करेगा। कुछ देर बाद हा दरबारी रसगुल्लों से भरी तश्तरी वापस लेकर आ गया

 

महाराज के पूछने पर उसने बताया, “महाराज! शाही मेहमान को रसगुल्ले नहीं वरन् रसगुल्ले की जड़ चाहिए”
महाराज ने मंत्री व पुरोहित की देखते हुए कहा”क्या रसगुल्लों की जड़ आर मंत्री व पुरोहित हक्के-बक्के रह गए। उन्हें कोई प्रत्युत्तर न सूझा तो वे मौन रहे।

तभी तेनालीराम बीच में बोल पड़ा, “महाराज! रसगुल्ले की भी जड़ होती है और वह केवल हमारे देश में ही होती है। आप आदेश करें तो मैं वह जड़ ला सकता हूं।”

महाराज ने कहा, “जाओ, वह जड़ लेकर आओ। कल हम शाही मेहमान की तमन्ना पूरा कर। तेनालीराम चला गया। अगले दिन उसने एक गन्ना खरीदा और उसको छिलवाकर छोटे-छोटे टुकड़े करवाए। यह बात अन्य किसी भी दरबारी को पता नहीं थी।

तनालाराम क ने गन्ने के उन टुकड़ों को चांदी की एक तश्तरी में खूबसूरती से सजाकर उस पर मलमल का कपड़ा ढक दिया। फिर वह दरबार में हाजिर हुआ और महाराज को कपड़े से ढकी वह तश्तरी दिखाते हुए कहा”महाराज! इसमें रसगुल्ले की जड़ है।

आप शाही मेहमान की सेवा में पेश करवा दें।” महाराज सहित सभी दरबारी रसगुल्ले की जड़ देखने को उत्सुक थे। महाराज ने कहा, “तेनालीराम! तश्तरी पर से जरा कपड़ा हटाकर दिखा।

तेनालीराम बोला, “महाराज! पहले यह जड़ शाही मेहमान के पास ही भेजी जाएगी। जब वह तश्तरी में थोड़ी-बहुत जड़ छोड़ देंगे तब आपको दिखाई जाएगी।”

अंतत: एक दरबारी शाही मेहमान के कक्ष में पहुंचा और वह तश्तरी उसके पास रखते हुए बोला, “लीजिए, आपके लिए महाराज ने विशेषरूप से भिजवाई है।”

शाही मेहमान प्रसन्न होकर गन्ने के उन टुकड़ों को बड़े चाव से चूसने लगा। जब गए कुछ टुकड़े बच तब दरबारी तश्तरी लेकर दरबार में आया और सबको दिखाते हुए बोला, “महाराजशाही मेहमान को रसगुल्ले की जड़ बहुत पसंद आई और वह आपके बहुत-बहुत आभारी हैं। ”

महाराज ने भी तश्तरी में पड़े गन्ने के टुकड़ों को देखा और तेनालीराम को पास कहा, “तेनालीराम! आज तुमने हमारी इज्जत रख ली। लो तुम्हारा इनाम!”

फिर उन्होंने अपने गले में पडा मोतियों का हार तेनालीराम के गले में डाल दिया । वह देखकर सभी दरबारी हत्प्रभ रह गए और तेनालीराम के विरोधी भी हाथ मलते

 

Tenali Ramakrishna Stories No.5. चोर और तेनालीराम

एक गर्मी की रात, जब तेनाली रमन और उसकी पत्नी अपने घर में सो रहे थे, तो उन्हें बाहर की ओर जंगल की तरफ से आने वाली पत्तियों की एक आवाज सुनाई दी ।
उस समय थोड़ी सी भी हवा नहीं चल रही थी, इसलिए उसने यह आभास हुआ कि झाड़ियों में कुछ चोर छिपे हुए हैं। उन्होंने सोचा कि उन्हें रात में अपने घर को लूटने से बचने की एक योजना बनानी चाहिए।

उसने एक योजना के बारे में सोचा और अपनी पत्नी से कहा, ” प्रिये, मैंने सुना है कि हमारे पड़ोस में कुछ कुख्यात चोर रहते हैं। तो, हमारे पास घर में जितने भी गहने और पैसे है उन्हें छुपाने के लिए हम उन्हें सामने वाले कुए मै डाल देते है।

थोड़ी देर बाद, तेनाली रमन और उनकी पत्नी एक बड़े ट्रंक को लेकर घर से निकल पड़ते हैं, और उसे कुएं में गिरा देते हैं और ट्रंक को गिराने के बाद वो दोनों घर के अंदर वापस चले जाते हैं और सो जाने का नाटक करते हैं। वहां खड़े चोरों ने उन दोनों को देखा और थोड़ी देर वहीं खड़े होकर इंतज़ार किया और फिर उसके बाद चोरों ने कुए मई से पानी निकलना शुरू कर दिया।

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वे अच्छी तरह से खाली करने और खजाना पाने की आशा रखे हुए थे । चोर पूरी रात पानी बाहर खींचते रहे । और आखिरकार चोर, उस ट्रंक को बाहर निकालने में कामयाब रहे, और जब उन्होंने इस ट्रंक को खोला, तो वे बहुत ही चौंक गए और निराश हो गये थे कि इसमें तो सिर्फ कुछ बड़े पत्थरों के अलावा कुछ और नहीं देखा जा सकता था ।

उन्हें समझ आ गया कि तेनाली रमन ने उन्हें चतुरता में मात दे दी और तेनाली रमन को उनकी योजना के बारे मै पहले ही आभास हो गया था । बस तभी तेनाली रमन अपने घर से बाहर निकले और कहा, ” आप सभी दोस्तों को धन्यवाद, मेरे पौधों को पानी देने के लिए। मुझे आपके श्रम के लिए आपको भुगतान करना होगा। ”
यह सुनकर, चोरों ने तेनाली रमन के पैर पकड़ कर माफ़ी मांगी और उन्होंने किसी को भी ना लूटने या चोरी करने का वादा किया । तेनाली रमन ने उन्हें माफ़ कर दिया और उन्हें जाने देने का फैसला कर लिया।

अर्थात – गंभीर हालात मे स्थिर दिमाग के साथ अपनी बुद्धि का प्रयोग करके आप उनसे बाहर निकलने मे सक्षम हो सकते।

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Tenali Ramakrishna Stories No.6. तेनालीराम और सोने के आम

राजा, कृष्णदेवराय की मां एक बहुत पवित्र और रूढ़िवादी महिला थी। वह सभी पवित्र स्थानों का दौरा करती थीं और और वे अपने खजाने में से बहुत सा हिसा मंदिरों मे दान कर दिया करती थी। एक बार जब उन्होंने दान में फल देने की इच्छा प्रकट की और उसके बेटे को बाध्य किया।

कृष्णदेवाराय ने तत्काल रत्नागिरी से कई आम प्राप्त किए। उन्होंने अपनी मां को बहुत सम्मान दिया और और कभी भी उनका सिर नीचा नहीं होने दिया। दुर्भाग्य से, शुभ दिन आने से पहले, उसकी मां की मृत्यु हो गई।

कृष्णदेवराय ने सभी धार्मिक संस्कारों का पालन किया। वे कई दिनों तक चले गए आखिरी दिन, राजा ने कुछ ब्राह्मणों को बुलाया और कहा, ‘मेरी मां की आखिरी इच्छा ब्राह्मणों को आमों की पेशकश करना था। लेकिन वह इस इच्छा को पूरा नहीं कर सकी और मर गई। मैं क्या कर सकता हूं कि मेरी मां की अंतिम इच्छा पूरी हो सके और वह शांति से आराम कर सकें?’

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ब्राह्मण लालची थे उन्होंने कहा कि केवल अगर राजा प्रत्येक ब्राह्मण को एक सोने का आम देगा, तो उसकी मां शांति में आराम कर सकती है।
सुनवाई पर कृष्णदेवराज ने तुरंत कुछ स्वर्ण आमों को बनाया और उन्हें ब्राह्मणों को प्रस्तुत करने का आदेश दिया, अब सोचकर कि उनकी मां सुखी और शांतिपूर्ण होगी।
तेनाली रमन ने इस बारे में सुना और उन्होंने उन ब्राह्मणों को अपनी मां के अंतिम संस्कार समारोह में अपने घर बुलाया।

जब ब्राह्मण तेनाली के घर पहुंचे तोनाली ने सभी दरवाजे और खिड़कियां बंद कर दीं और उनके सामने एक लाल गर्म लोहे की छड़ी लगाई। ब्राह्मणों को अचंभित किया गया था लेकिन तेनाली ने उनके भ्रम को हटा दिया।
‘मेरी मां को घुटने का दर्द था और एक उपाय के रूप में वह मुझे इस गर्म लोहे की छड़ के साथ इलाज करने के लिए कहती थी । लेकिन इससे पहले कि मैं उसकी मदद कर सकूं, वह मर गई तो अब मैं आपको यह सब कुछ देकर अपनी इच्छा पूरी करना चाहता हूं ‘, तेनाली ने ब्राह्मणों से कहा, ब्राह्मण चौंक गए और कहा कि यह उन पर अन्याय है और वे इसका हिस्सा नहीं होंगे।

लेकिन तेनाली ने कहा कि चूंकि उन्होंने राजा से सुनहरी आमों को ले लिया है, क्योंकि इस तरह से वह अपनी मां की आत्मा को शांति प्रदान कर सकता था और इस तरह ही तेनाली की माँ शांति पा सकती थी। लालची ब्राह्मणों को समझ आ गया कि उन्होंने सही नहीं किया है और उन्होंने आम को राजा के पास लौटा दिया ।
बाद में तेनाली रमन ने राजा कृष्णदेवराय को बताया कि इस तरह के लालची लोगों को सोने की चीज़ें देकर महल का खजाना  गलत इस्तमाल नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय, इसे भोजन और जरूरतमंदों की सेवा के लिए रखा जाना चाहिए।

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Tenali Ramakrishna Stories No.7. तेनालीराम और लाल मोर की कहानी

विजयनगर के राजा कृष्णदेव को एक अनोखी चीजों को जमा करने का शौक था इसीलिए उनका हर दरबारी राजा को खुश करने के लिए अनोखी चीजों की खोज में लगे रहते थे , ताकि राजा को खुश करके वो उनसे मोटी रकम वसूल कर सके .

एक बार राजा कृष्णदेव के दरबार में एक दरबारी राजा ने मोटी रकम वसूल करने के लिए एक मोर को लाल रंग करके राजा के सामने पेश कर दिया और कहा ,“ महाराज ये लाल मोर मेँ आपके लिए बहुत मुश्किल से मध्य प्रदेश के घने जंगलों से पकड़ कर लाया हु   राजा भी लाल मोर को देख कर चकित रह गए और उससे घूरते रहे क्योकि उन्होंने भी लाल मोर को कभी नहीं देखा था। इसीलिए राजा ने दरबारी को कहा की की तुम

वास्तव में एक अद्भुत चीज लेकर आए हो और इस मोर को लाने में आपको कितना खर्च करना पडा ?
इतना कहते ही दरबारी ने कहा : मुझे इस मोर को लाने में करीब 25 हजार रुपए खर्च करने पड़े .

 

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राजा ने उस दरबारी को 30 हजार रुपए के साथ 5 हजार रुपए की राशि इनाम के रूप में देने की घोषणा कर दी राजा की घोषणा सुनकर वह दरबारी तेनालीराम की तरफ देखकर मुस्कराने लगा .

फिर क्या था तेनालीराम को समझ आ गया की उसकी मुस्कराहट के पीछे कोई राज है और वह जानते थे कि लाल रंग का मोर कहीं नहीं होता फिर तेनालीराम उस रंग विशेषज्ञ की तलाश में जुट गए जिसने नीले मोर को लाल किया था और दूसरे ही दिन उस चित्रकार को खोज निकाला। तेनालीराम ने 4 नीले मोर को लाल करवा कर खुद भी राजा के सामने पेश कर दिया और महाराज से कहा मै 25 हजार में 4 मोर लेकर आया हु।

राजा ने तेनालीराम को 25 हजार रुपए देने की घोषणा की . तेनाली राम ने यह सुनकर कहा की “ महाराज अगर कुछ देना ही है तो उस चित्रकार को दें जिसने नीले मोरों को इतनी खूबसूरती से लाल रंगा किया है।

राजा को सारा गोरखधंधा समझते देर नहीं लगी . वह समझ गए कि उस दरबारी ने राजा को मूर्ख बनाया था .

राजा ने तुरंत उसी दरबारी से 25 हजार रुपए लेने के साथ 5 जार रुपए जुर्माने का आदेश दिया  और चित्रकार को उचित पुरस्कार दिया गया वह दरबारी बेचारा सा मुंह लेकर रह गया

 

Tenali Ramakrishna Stories No.8: भाषा की पहचान

राजा कृष्णदेव राय विद्वानों का बहुत सम्मान किया करते थे, यह बात सभी जानते थे। एक बार उनके दरबार में एक ऐसा विद्वान आया जिसे अनेक भाषाओं का ज्ञान था।

उस विद्वान ने महाराज का अभिवादन कर अपना परिचय दिया और कहा“महाराज! मैंने सुना है कि आपके दरबार में एक से बढ़कर एक विद्वान हैं, लेकिन उनमें क्या कोई ऐसा भी है जो मेरी मातृभाषा बता सके” कृष्णदेव राय बोले” इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे इस दरबार में एक से बढ़कर एक विद्वान हैं।” फिर उन्होंने तेनालीराम की ओर देखते हुए कहा“हमें अपने विद्वानों पर गर्व है।

भलाहमारे दरबारी विद्वजन आपकी मातृभाषा क्यों नहीं बता सकते? अवश्य ही बता सकेंगे”

फिर वह विद्वान तेलुगुकन्नड़, मराठी, कोंकणी, मलयाली भाषाओं में एक के बाद एक धाराप्रवाह धर्मोपदेश देने लगा। सभी दरबारी विद्वजन चुपचाप सुनते रहे। अंत में वह बोला, “महाराज! आपके दरबारी विद्वजनों से मेरी प्रार्थना है कि व यह बताएं कि जितनी भाषाएं मैं बोल चुका हूं, उनमें से मेरी मातृभाषा कौन-सी है?” विद्वान का प्रश्न सुनकर दरबार में सन्नाटा छा गया।

कोई भी उत्तर नहीं दे सका । तब महाराज ने तेनालीराम की ओर दृष्टि डाली। तेनालीराम सब समझ गया। वह बोला”महाराज उपस्थित विद्वान हमारे अतिथि हैं, कुछ दिनों अत: तक इनका आतिथ्य सत्कार करने के लिए इन्हें अतिथिशाला में ठहराया जाए और साथ ही मुझे भी इनकी सेवा करने का अवसर दिया जाए।”

तेनालीराम से सहमत होकर महाराज ने विद्वान अतिथि को अतिथिशाला में ठहराया। पास ही एक खूबसूरत उद्यान भी था। तेनालीराम को भी विद्वान की सेवा करने का अवसर दिया गया।

एक दिन विद्वान व तेनालीराम दोनों उद्यान में बैठे चर्चा कर रहे थे। विद्वान अलग-अलग भाषाओं में तेनालीराम को कुछ समझा रहा था, जबकि तेनालीराम विद्वान के चरण दबा रहा था।

एकाएक तेनालीराम को बबूल का कांटा दिखाई दिया उसने वह कांटा उठाया और पैर दबाते-दबाते वह कांटा विद्वान के एक पैर में चुभो दिया।

कांटा चुभते ही विद्वान ‘अम्मा-अम्मा’ कहकर पीड़ा से कराहने लगा। फिर तेनालीराम ने वह कांटा निकाल दिया। इस तरह तीन दिन व्यतीत हो चुके थे।

चौथे दिन विद्वान दरबार में उपस्थित हुआ और महाराज से कहने लगा, “क्या आपके दरबारी विद्वजनों को मेरे प्रश्न का उत्तर मिला?”

तेनालीराम भी दरबार में उपस्थित था। महाराज ने उसकी ओर आशान्वित दृष्टि डाली तो वह बोला, महाराज! हमारे विद्वान अतिथि की मातृभाषा तमिल है।”

विद्वान ने जब यह सुना तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने तेनालीराम की बुद्धि का लोहा मानते हुए कहा” तेनालीराम! तुम वाकई कुशाग्र बुद्धि हो, लेकिन यह बताओ तुमने मेरी मातृभाषा कैसे जान ली?”

तब तेनालीराम बोला, “महाशय! क्षमा चाहूंगा। दरअसल आपके पैर में कांटा मैंने ही चुभाया था, मात्र यह जानने के लिए कि आपकी मातृभाषा क्या है, क्योंकि पीड़ा होने पर कोई भी व्यक्ति या तो परमात्मा को पुकारता है अथवा अपनी मातृभाषा का उच्चारण करता है।

जब आपके पैर में कांटा चुभा तब आपने तमिल भाषा में ‘अम्मा-अम्मा’ कहकर पुकारा। तभी मैं समझ गया कि आपकी भाषा तमिल है।” महाराज भी तेनालीराम की इस चतुराई से बड़े प्रभावित हुए।

दरबारियों ने तेनालीराम की भूरि-भूरि प्रशंसा की। बाद में महाराज ने अपने गले का मुक्ताहार के तेनालीराम के गले में डाल दिया।

 

Tenali Ramakrishna Stories No.8: पासा पलट गया

 

दरबार लगा था आर सभी प्रमुख दरबारी उपस्थित थे। तेनालीराम भी वहीं था। तभा राजपुरोहित ने राजा से कहा”महाराज! हम जो भी निर्णय करते हैं वह हम तक ही सीमित रहते हैं। प्रजा उन निर्णयों से अनभिज्ञ रहती है। मेरा सुझाव है कि प्रजा का भी निर्णयों से अवगत कराना चाहिए”

राजपुरोहित के इस सुझाव को सुनकर सभी दरबारी भौचक रह गए महाराज ने उनसे पूछा, “आप कहना क्या चाहत हैं, कुछ स्पष्ट कर।” तब राजपुरोहित ने कहा“महाराज! दरबार म जो कुछ भी निर्णय लिए जाते हैं उनक संदर्भ में प्रजाजनों का भी जानकारी देनी चाहिए।” इसी बीच मंत्री व सेनापति में कुछ कानाफूसी हुई।

फिर मंत्री ने कहा, “महाराज पुरोहितजी का सुझाव अत्युत्तम है। उनके इस सुझाव पर अमल करने का दायित्व तेनालीराम को सौंपना चाहिए, क्योंकि तनालाराम तीक्ष्ण बुद्धि का ह और फिर उस पर राजदरबार का कोई विशेष दायित्व भी नहीं है।” राजा ने कहा, ठीक , यह काम तेनाली रामा  को ही  सौंपा जाता है ।

फिर निश्चित किया गया कि तेनालीराम जनहित के निर्णयों की जानकारी आम जनता तक पहुंचाएगा। इसका तरीका यह होगा कि राजदरबार के निर्णयों को तेनालीराम लिखित में दरोगा को देगा। फिर दरोगा वह लिखित संदेश मुनादी करने वाला के माध्यम से जनता तक पहुंचाएगा।

इधर तेनालीराम समझ चुका था कि यह मंत्री, राजपुरोहित व सेनापति की मिलीभगत का नतीजा है। तेनालीराम ने निश्चय किया कि इन लोगों को सबक सिखाना ही चाहिए। फिर उसने एक योजना बनाईउसी योजना के तहत उसन सप्ताहांत में दरोगा को एक पर्चा थमाया। दरोगा ने मुनादी पीटने वालों को वह पचा थमाते हुए कहा“जाओ, यह संदेश प्रजाजनों तक पहुंचा दो।”

मुनादी पीटने वाला चौराहे पर पहुंचा और उसने ढोल पीटते हुए कहा, “सुनो-सुनो ऐ नगरवासियो! महाराज की इच्छानुसार जनसामान्य को दरबार के निर्णयों से अवगत कराया जा रहा है। वस्तुत: यह दायित्व राजविदूषक तेनालीराम को सौंपा गया था,

लेकिन उनके निर्देशानुसार मैं आपको महाराज का यह संदेश सुना रहा हूं। महाराज चाहते हैं कि सभी प्रजाजनों को न्याय मिले और अपराधी को उसके अपराध का दंड। इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए मंगलवार को महाराज ने दरबार में पुरोहितजी से पुरानी न्याय प्रणाली के बारे में जानना चाहा था। लेकिन पुरोहितजी दरबार में कुछ भी नहीं बता सके, बल्कि वे तो ऊंघ रहे थे। इसी बात पर महाराज ने उन्हें बुरी तरह फटकारा।

बृहस्पतिवार को दरबार में सीमा सुरक्षा के संदर्भ में चर्चा हुई लेकिन उस दिन सेनापतिजी दरबार में विलंब से पहुंचे और उन्हें महाराज की फटकार सुननी पड़ी। दरबार अगले सोमवार को लगेगा।” इतना कहकर मुनादी अब पीटने वाले ने ढोल पीटा और वहां से चला गया।

इस प्रकार हर सप्ताह मुनादी पीटी जाने लगी। हर बार ही तेनालीराम की चर्चा जोरों पर होती और मंत्री, राजपुरोहित व सेनापति की बखिया उधेड़ी जाने लगी। जब मंत्री को उसके गुप्तचरों से तेनालीराम की चर्चा के बारे में जानकारी मिली तब मंत्री ने राजपुरोहित से कहापुरोहितजी! तेनालीराम तो बहुत तेज निकलाउसने तो हमारे ही कान काट लिएउसने तो प्रजाजनों में हमारी किरकिरी कर दी” ।

“लेकिन इसमें मेरा क्या दोष है। मैंने तो समझा था कि महाराज तेनालीराम के गले में ढोल बंधवाकर मुनादी पिटवाएंगे।”

मंत्री बोला”अच्छा, अब तुम चिंता मत करो। दरबार में अगली बार मैं ही कोई चक्कर चलाऊंगा।”

फिर जब दरबार लगा तब मंत्री ने महाराज से निवेदन किया“महाराज! संविधानानुसार हमें दरबार में लिए गए निर्णयों की जानकारी जनसामान्य तक नहीं पहुंचानी चाहिए। कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जो गुप्त ही रखी जाती हैं।”

तभी तेनालीराम ने कहा“मंत्रीजी! मुनादी पिटवाने से पूर्व कहां चला गया था आपका संविधान? ”
तनालाराम का यह बात सुनकर दरबार में उपस्थित सभी दरबारी खिलखिलाकर हंसने लगे। वस्तुत: सभी लोग राजपुरोहितमंत्री व सेनापति की चाल को समझ चुके थे। सबने तेनालीराम की बुद्धि की मन-ही-मन सराहना की

 

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