Short Stories in Hindi छोटी छोटी कहानियाँ हिंदी में

6दोस्तों आज में आपके लिए लाया हु छोटी छोटी लेकिन प्यारी कहानियाँ जो आपको कुछ ना कुछ सीख जरूर देंगी। आज कल लोग short stories पढ़ना चाहते हैं क्योकि उनको पढ़ने में बहुत कम समय लगता है। अगर आप भी short stories hindi में पढ़ने के इच्छुक है तो निचे दिए गया आर्टिकल पूरा पढ़े और हमें जरूर बातये की आपको short stories कैसी लगी 

 

Complete List of Short Stories in Hindi

 

 

Short Stories No 1 बलिदानों की होड़

 

महाराज रघु ने महर्षि वशिष्ठ के द्वारा सरयू के तट पर अपने शत्रुओं को पराजित करने के लिए देवताओं से
आर्शीवाद प्राप्त करने के उद्देश्य से एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया।
महर्षि वशिष्ठ ने जब वेदमंत्रों द्वारा अग्निदेव का आह्वान किया तो उन्हें तुरन्त बोध हुआ कि अग्निदेव यज्ञ की
पूर्णाहुति पर मानव बलि चाहते हैं। यह सुनकर सभी शंकाकुल दृष्टि से एक दूसरे को देखने लगेऔर प्रश्न उठा कि कौन अपनी बलि देगा।
महामात्य ने खड़े होकर कहाइस देश के लिए बलि देने का सर्वप्रथम अधिकार मेरा है।
नहीं आप की परिपक्व दूरदर्शिता की राज्य को आवश्यकता है। वृद्धों की छत्रछाया चाहिए। मैं अपनी बलि
यूँगा-एक प्रौढ़ नागरिक ने कहा। नहीं देश के लिए बलि देने का काम सदैव नयी पीढ़ी का होता है। आपका संरक्षण राष्ट्र को चाहिए, बलि मैं यूँगा-एक तरुण ने कहा।

 

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तभी यज्ञ-कुण्ड में शान्त अग्नि की लपटें तत्काल प्रदीप्त हुई और आकाशवाणी हुई, ‘बलिदानों की होड़ से
बलिदान को चाह पूर्ण हुई।’ अग्निदेव ने प्रसन्न होकर महाराज रघु को विजयश्री का आशीर्वाद देते हुए कहाजिस राष्ट्र के पास इतने बलिदानी हों उसे कौन परास्त कर सकता है।”

 

Short Stories No 2 दावत और नमाज

 

शेख सादी ईरान के रहने वाले फारसी के बड़े विद्वान और शायर थे। एक बार उन्हें एक हाकिम ने अपने यहाँ
दावत पर बुलाया। अभी वे खाना खाने बैठे ही थे कि नमाज का वक्त हो गया। शेख सादी हाकिम से माफी माँग
कर नमाज के लिए खड़े हो गये। नमाज अदा करव घर आये तो बीवी से खाना लगाने को कहा। बीवी हैरत से
उनका मुंह ताकते हुए बोली-“आप तो दावत में गये थे, वहाँ से भूखे ही लौट आये”

शेख सादी ने पूरी घटना सुनाते हुए कहा-अगर मैं नमाज के लिए न उठ खड़ा होता तो भला हाकिम मेरे बारे
में क्या सोचता?

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इस पर बीवी खाना लगाते हुए बोली-‘खाना तो आप जरूर खाइयेमैं लगा देती हूं। लेकिन मेहरबानी करके
नमाज भी फिर से पढ़ लीजिएक्योंकि नमाज तो हुई ही नहीं, दिखावे की जो थी।

 

Short Stories No 3: पत्थर के बदले मीठे फल

महाराज रणजीत सिंह एक बार घोड़े पर सवार होकर सैनिकों के साथ कहीं जा रहे थे। अचानक एक पत्थर
आकर उनको लगापत्थर मारने वाले की तलाश में सैनिक चारो ओर दौड़ पड़े। थोड़ी देर में सैनिक एक वृद्धा को
पकड़ कर लाये और कहा- इसी दुष्ट ने पत्थर मारा हैं।

महाराज ने पास बुलाकर पत्थर मारने का कारण पूछा। वृद्धा ने कहा-महाराज मेरे बच्चे दो दिन से भूखे हैं। घर में
अन्न का एक दाना भी नही है। भोजन की तलाश में घर से निकली तो देखा एक पेड़ फलों से लदा है। मैंने पत्थर
मारकर फल गिराने चाहे। इसी बीच एक पत्थर आपको लग गया है। मैं क्षमा चाहती हूं। महाराज रणजीत सिंह ने कहा इसे कुछ आशर्फियाँ देकर छोड़ दो।

 

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सेनापति ने चकित होकर कहा-महाराज यह कैसा न्यायइसे तो सजा मिलनी चाहिये।

रणजीत सिंह ने हँसकर उत्तर दिया-पत्थर मारने पर जब पेड़ भी मीठे फल दे सकता है तो मैं मनुष्य होकर उसे क्यों
निराश करें?

 

Short Stories No 4: सीप और मोती

 

एक सीप कराह रही थी। उसके पेट में मोती था। प्रसव-पीड़ा उसे कष्ट दे रही थी। कराह का कारण जानने
के बाद सीप की सहेली ने संतोष की साँस ली और अपने भाग्य को सराहते हुए कहा कि “मैं मजे में हैं, मुझे पीड़ा
का झंझट नहीं सहना पड़ा।”

एक बूढ़ा केकड़ा कुछ दूर बैठा यह सब देख सुन रहा था। उसने गर्दन उठाकर देखा और कहा-आज की पीड़ा से
एक सीप से सुन्दर मोती की जन्मदात्री बनना है, लेकिन दूसरी का चैन उसे सदा दरिद्र बनाये रखने वाला है। वह
क्यों नहीं समझती कि पीड़ा ही कष्ट और चैन ही सुख नहीं है।

Short Stories No 5: धन और सज्जनता

इंग्लैंड का बादशाह जेम्स अपना खजाना भरने के लिए राज्य के अमीरों को धन के बदले उपाधियाँ दिया करता
था। यह जानते हुए भी कि उपाधि से कोई महान नहीं बन सकता।
वह मूर्ख और यशलोलुप लोगों की तुच्छ अंहकारवृत्ति का पोषण करते हुए उन लोगों से खूब धन एकत्र करता
रहता था।

 

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एक बार नगर का सर्वाधिक धनी व्यक्ति जेम्स के दरबार में आया। बादशाह ने उससे पूछा-आपको कौन सी
उपाधि चाहिए । इस पर धनी ने उत्तर दिया-सज्जनता ।

बादशाह कुछ देर तो चुप रहे, फिर गम्भीर स्वर में बोले-देखिये मैं आपको धन के बदले ‘लार्ड’ , ‘डयूक’,
‘सर’ आदि सब कुछ बना सकता हूं, लेकिन ‘सज्जन’ बना देना मेरी शक्ति से बाहर है। सज्जनता के लिए सदगुण
चाहिए धनी सिर झुकाये घर लौट आया।

 

Short Stories No 6: नारद और संगीत

एक बार देवर्षि नारद को अपने संगीत-ज्ञान का बड़ा घमंड हो गया। भगवान ने उन्हें समझाया कि अभी तुम्हारा
ज्ञान पूर्ण नही है, फिर भी नारद वीणा पर भगवान का गुण गाते हुए तीनों लोकों में विचरने लगे। एक बार नारद जी
विष्णु लोक जा रहे थे। रास्ते में देखा कि कुछ दिव्य स्त्री पुरुष घायल पड़े थे। उनके कुछ अंग कटे हुए थे। नारद जी के पूछने पर वे दुखी स्वर में बोले- हम सभी राग-रागनियाँ है।

पहले हम अंगों से पूर्ण थे। आजकल नारद नाम का एक व्यक्ति उल्टा-सीधा राग-रागनियों का अलाप करता
फिरता है, जिससे हम लोगों की यह स्थिति हो गयी है। विष्णु भगवान ही हमारे कष्टों को दूर कर सकते हैं।
नारद जी ने यह बात सुनी तो उदास हो गये।

जब वे विष्णु लोक पहुँचे तो प्रभु ने उनकी उदासी का कारण पूछा।

नारद जी ने सारी बातें बता दी। भगवान शंकर के वश की बात हैं। नारद जी भगवान शंकर के पास गये । उन्हें सारी
बातें बतायी। शंकर जी ने उत्तर दिया-मैं ठीक ढंग से राग रागनियों का अलाप करू तो वे नि:संदेह सभी अंगों से पूर्ण
हो जायेंगी।

 

परन्तु मेरे संगीत का श्रोता कोई उत्तम अधिकारी मिलना चाहिये। अब नारद जी को और क्लेश हुआ, सोचने
लगे कि क्या मैं संगीत सुनने का अधिकारी भी नहीं हूं । उन्होंने भगवान शंकर से उत्तम श्रोता चुनने की प्रार्थना की।
शिवजी ने भगवान नारायण का नाम निर्देशित किया।

शिव लोक में संगीत समारोह आरम्भ हुआ। सभी देव, गंधर्व और राग रागनियाँ वहाँ उपस्थित हुई। महादेव जी के राग अलापते ही उनके अंग पूर्ण हो गये। नारद जी साधु हृदय  परम महात्मा तो थे ही, उनका अहंकार दूर हो गया।

वे प्रसन्न हुए तथा शिवजी ने उन्हें विधिवत संगीत शिक्षा दी। और वे संगीताचार्य बने।

 

 

Short Stories No 7  पीड़ित की सेवा सुख

एक बार जब पंडित मदन मोहन मालवीय कुछ आवश्यक कार्यों से बग्घी में बैठकर कहीं जा रहे थे, तो उन्हें सड़क के किनारे किसी महिला के कराहने की आवाज सुनाई दी।

उन्होंने बग्घी रुकवाई और उतरकर देखा-महिला के शरीर से लहू बह रहा था और असह्म वेदना से वह कराह रही थी, एक नन्हा-सा बच्चा भी उसकी गोद में था।

बहुत लोग उधर से गुजरे पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। मालवीय जी ने उसे उठाकर बग्घी में बिठाया और अस्पताल पहुँचेवे तब तक अस्पताल में रहे, जब तक कि उस महिला के समुचित उपचार की सारी व्यवस्था नहीं हो गई उन्होंने जाने से पहले उपचार हेतु महिला को कुछ रुपये भी दिये और डाक्टरों से उसकी समुचित देखभाल का अनुरोध भी किया।

वस्तुत: मालवीय जी पीड़ित की सेवा के सुख को भली भांति जानते थे।

 

Short Stories No 8 स्वर्ग-नरक

आचार्य भिक्षु को मार्ग में एक व्यक्ति मिलाउसने पूछाकौन हो? संत भिक्षु ने कहा-मैं भीखन । लोग। -तुम मुझे भिक्षु कहते हैं। ओह! अनर्थ हो गया। उस व्यक्ति ने अपनी आंखों पर हाथ रखते हुए कहा। वह कैसे? संत भिक्षु ने आश्चर्य व्यक्त किया। राहगीर ने कहा-तुम्हारा मुँह देखने वाला नरक में जाता । है, और तुम्हारा मुँह देखने वाला?

भिक्षु ने पूछ लिया। बड़े गर्व से उसने कहा-मेरा मुँह देखने वाला सीधा स्वर्ग में आचार्य भिक्षु पहुँचे हुए संत थे। उन्होंने कहा किसी का मुँह देखने से कोई स्वर्ग अथवा नरक में जाता है मैं तो ऐसा नहीं मानता। खैर..।

तुम्हारे हिसाब से मुझे तो स्वर्ग ही मिलेगा, तुम्हारा मुँह मैंने जो देखा है। अपनी तुम जानो।

 

Short Stories No 9 विद्या और सुविधा

 

पश्चिम बंगाल के सुप्रसिद्ध मनीषी . ईश्वर चंद्र विद्यासागर का परिवार इतना निर्धन था कि घर में साँझ को दीया जलाने तक की सुविधा नहीं थी।

ऐसे में मेधावी छात्र पंविद्यासागर सरकारी लैम्प पोस्ट की मद्धिम रोशनी में कक्षा की तैयारी किया करते थे। इस तरह विद्यपार्जनो करके भी उन्हें रंचमात्र भी असंतोष नहीं था।

एक रात उसी के किसी धनाड्य सहपाठी ने उनसे कहा। मित्रइस मद्धिम रोशनी में क्यों आंखों को इतनी तकलीफ देते हो?

चलो मेरे बड़े दालान में दरी पर बैठकर पूरी रोशनी में सुविधा से पढ़ाई करो’ युवा विद्यासागर ने सहज भाव से मुस्कराते हुए सहपाठी से कहा‘, विद्योपार्जन में सुविधा की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। विद्या तो कहीं भी अर्जित की जा सकती है।

फिर सुविधा की बात क्यों?’ में विद्यासागर के इस दो टूक उत्तर से वह धनाढय सहपाठी लज्जित होकर चला गया।

 

Short Stories No 10 मुसीबत में झूठ

 

एक बार स्वर्गीय रफी अहमद किदवई के पास एक व्यक्ति रोता-गिड़गिड़ाता हुआ आया। कहने लगा, ‘मुझे अपनी लड़की की शादी करनी है, लेकिन पास में एक फूटी कौड़ी भी नहीं है। रफी साहब ऐसे मौकों पर स्वभाववश पिघल जाते थे।

उन्होंने पूछा कितने पैसे चाहिए? वह व्यक्ति बोला, ‘3 हजार रुपए से काम चल जाएगा।’ रफी साहब ने तत्काल 3 हजार रुपए का चैक काटकर दे दिया।

पास में ही हिन्दी के एक मूर्धन्य साहित्यकार जो उनके अभिन्न मित्र और सहकर्मी भी थे, उस व्यक्ति के जाने के बाद बोले’यह तुमने क्या बेवकूफी की?

उस आदमी की तो शादी भी नहीं हुई है, लड़की कहाँ से आएँगी?’ रफी साहब बोलेतुम भी अजीब आदमी हो। मैं

क्या इस बात को नहीं जानता हूँ?

अरे, वह किसी बड़ी मुसीबत में होगातभी तो इतना झूठ बोलने आया था।

Short Stories No 11: धारणा और भ्रम

मुंशी प्रेमचन्द्र जी बड़े सरल और शान्त स्वभाव के थे। वे कभी किसी से झगड़ते नहीं थे। किन्तु एक बार दुर्भाग्यवश एक व्यक्ति से उनका मतभेद हो गया और वह आवश्यकता से अधिक बढ़ गया। बातों में कुछ तेजी आ गई तो प्रेमचन्द जी को कहना पड़-‘मैं आपको एक संभ्रान्त व्यक्ति मानता था, परन्तु..। ‘

बीच में ही बात काटकर उनके विरोधी ने कहा-‘मेरी भी आपके प्रति कुछ ऐसी ही धारणा थी।’ प्रेमचन्द जी ने मुस्करा कर कहा-‘श्रीमान, आपकी ही धारणा ठीक निकलीमैं ही भ्रम में था।

 

Hindi Short Stories No 12: ऊंट सवार और स्त्री

 

बियाबान रास्ताएक स्त्री जेवरों से लदी, सिर पर गठरी रखे मंथर गति से अपनी राह चली जा रही थी। अभी और कितनी दूरी नापनी है, मन ही मन इसका हिसाब लगा रही थी। काश! रास्ता छोटा हो जाता। ईश्वर कोई सवारी ही भेज देता। उसी पर बैठ अपने गंतव्य की ओर बढ़ जाती, थकान से तो छुटकारा मिल जाता। वह सोच ही रही थी। अचानक उसे अपने पीछे कुछ आहट सुनाई दी।Hindi Short Stories

पलट कर देखा, एक आदमी ऊँट पर आ रहा था, जिसकी रस्सी ऊँट के साथ बंधी थी। स्त्री ने ऊंट सवार से कहाभाई रे! मैं बहुत थक गई हूं। मुझे ऊंट पर बैठा ले। ऊंट सवार जल्दी में था। बोला मुझे जल्दी जाना है। मैं तुम्हें बैठाऊँगा तो मुझे और देर हो जाँएगी। कहकर वह तेजी से आगे बढ़ गया। आगे जाकर उसने सोचा-स्त्री के पास माल भी है और आभूषण भी।

उसे ऊंट पर सवारी देकर सरलता से हथियाया जा सकता है। नाहक ही उसे मना कियायह विचार आते ही वह वापस हो लिया। स्त्री ने देखा-ऊंट सवार उसकी ओर आ रहा है। वह कुछ असमंजस में पड़ी। ऊंट सवार उसके पास आकर बोला-चल, बैठवरना कहेगी कि मुझे ऊँट पर नहीं बिठाया। स्त्री बोली—’रे! अब तू जा। तुझे देर हो जाएगी, मैं पैदल ही चली जाऊँगी।’ अब तुझे क्या हो गया? पहले तो ऊँट पर बैठने को कह रही थी, अब मना कर रही है। किसने तुझे मना किया है? उसी ने जिसने पहले मुझे बैठाने से मना किया ऊट पर था।

 

Hindi Short Stories No 13: सत्य और असत्य

 

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श्रद्धा व प्रतिष्ठा ब्रह्मा जी कि दो पुत्रियाँ समय पाकर विवाह के योग्य हुई। ब्रह्मा जी ने उनके लिए सत्य व असत्य नामक दो वर ढूंढे। एक दिन शुभ बेला में श्रद्धा और प्रतिष्ठा को वर दिखाये गये और उनकी पसंद पूछी गयी। सत्य परिश्रमी और ईमानदार था, किन्तु निर्धन था। दिखने में अधिक सुंदर भी नहीं था।

प्रतिष्ठा ने उसे देखते ही आँखें फेर ली। असत्य आलसी था। बेईमान भी, फिर भी प्रतिष्ठा ने उसे पसंद किया और वरमाला उसके गले में डाल दी। श्रद्धा ने सत्य को देखा और उसे अपना पति मान लिया। विवाह के पश्चात् प्रतिष्ठा सदैव दुखी और अशांत रहती, परन्तु श्रद्धा सत्य को पाकर निहाल थी।

वरण करते समय भूल और विचारशीलता की अपनी महत्ता है। उसका प्रभाव जीवन भर रहता है।

Hindi Short Stories No 14:मूखे क्यों

 

एक दिन की बात है। महाराज भोज की महारानी अंत पुर में किसी से बातचीत कर रही थी। उसी समय वहाँ बिना किसी पूर्व सूचना के भोज उपस्थित हो गये। यह बात
महारानी को नहीं जंची।

अतउन्होंने कहा, ‘आईये मूत्र बैठिये’ महाराज को महारानी का व्यवहार खटका, लेकिन उन्हें लगा कि कोई त्रुटि हो गयी है। वह दरबार में चले गये और अपनी गलती जानने के लिए सभासदों को उसी अंदाज में कहने लगे’आईये मूर्ख बैठिये’ सभासद अपने को अपमानित अनुभव कर रहे थ। जब कालिदास पहुँचे तो उन्हें भी कहा गया, ‘आईये मूर्ख बैठिये।’

कालिदास को बहुत बुरा लगाअतउन्होंने बड़ी विनम्रता से राजा को टोका, ‘हे राजन, जब मैं चलते हुए खाता नहीं बोलते वक्त हसता नहीं, बीती बातों पर चिन्ता नहीं करता,

अहंकार का मुझ में लेश नहीं है और किसी को बातचीत करते देखकर वहाँ जाता भी नहीं हूं, तब मै मूर्स कैसे हो सकता हूं?

इतना सुनना था कि महाराजा को महारानी के साथ की गयी गलती का बोध हो गया।

 

Hindi Short Stories No 15: भगवान सब जगह व्याप्त हैं

 

दुर्योधन की सभा में चीर-हरण के बाद कृतज्ञतावश द्रौपदी ने कृष्ण का धन्यवाद किया और कहा-प्रभु लज्जा।
की रक्षा करने के लिए मैं आपकी आभारी हूं। लेकिन मेरी। शका का समाधान करें कि ‘जब दु:शासन मेरा चीर-हरण कर रहा था तब आपने आने में इतनी देर क्यों की? आपको और जल्दी आना चाहिए था।

भगवान कृष्ण ने कहा’द्रौपदीयह बताओ कि तुमने मुझे क्या कह कर पुकारा था?’ द्रौपदी ने कहा-मैंने गुहार की थी-हे गोविन्द हे द्वारकावासी! हे गोपियों के प्रिय! मेरी रक्षा करो’

 

कृष्ण बोले-‘द्रौपदी, मैं तो इसी सभा में उपस्थित था, लेकिन तुमने मुझे घटघट वासी कृष्ण न कह कर द्वारकावासी
पुकारा था। इसलिए मुझे पहले द्वारका जाकर तब यहाँ आना पड़ापरिणामस्वरूप आने में देर हो गई’ द्रौपदी समझ गई कि भगवान तो घटघट में व्याप्त है। किसी स्थान विशेष में उनका निवास नहीं है।

Hindi Short Stories No 16: मुफ्त का पैसा

 

इंग्लैंड के महान उपन्यासकार रोनाल्ड फेयर बैंक के पितामह नगर के प्रसिद्ध व्यापारियों में गिने जाते थे। एक बार उन्हें व्यापार में काफी घाटा पड़ा।

उनके कई उठाना मित्रों ने उन्हें बिना किसी ब्याज और शर्त रुपया देना चाहा, पर रोनाल्ड साहब के पितामह इसके लिए बिल्कुल तैयार न थे। उनका कहना था कि मैं बिना ब्याज के एक पैसा लेना भी भयंकर पाप समझता हूँ।

 

एक मित्र ने जब इसका कारण पूछातो वे बोले, ‘मित्र मैं तुमसे जो रुपये लूगा उसकी मदद से मैं फिर व्यापार में लाभ कमाऊगा और तब उस लाभ में तुम्हारा भी भाग होगा।

इसलिए मैं बिना ब्याज में मिले पैसे को मुफ्त का पैसा समझता हूँ औरा मुफ्त में मिले पैसे को मैं कदापि नहीं लेता।’

 

 

The Author

Romi Sinha

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