Rao Tula Ram History in Hindi राव तुला राम का जीवन परिचय

Rao Tula Ram History in Hindi राव तुला राम का जीवन परिचय
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हेलो दोस्तों आज हम आपको Rao Tula Ram History और राव तुला राम के जीवन परिचय के बारे में बहुत सारी बातें बातयेंगे। राव तुला राम को लोग अहीरवाल नरेश,रेवाडी नरेश के नाम से भी जानते है राव तुला राम को 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मुख्य नेता के लिए भी जाना जाता है। इस आर्टिकल में हम आपको उनके बचपन से जवानी तक का सफर के बारे में सारी जानकारी देंगे।आईये शुरू करते है Rao Tula Ram in Hindi या राव तुला राम का जीवन परिचय

राव तुला राम का शुरुवाती जीवन।

राव तुला राम का जन्म 09 दिसम्बर 1825 को हरियाणा राज्य के रेवाड़ी शहर में एक अहीर परिवार में हुवा था। इनके पिता का नाम राव पूरन सिंह तथा माता जी का नाम ज्ञान कुँवर था। इनके दादा का नाम राव तेज सिंह था।उनको हिंदी ,उर्दु ,पर्शियन और इंग्लिश बहुत अच्छे से जानते थे।

1857 की क्रांति में राव तुला राम का योगदान

बात उस समय की है जब 10 मई 1857 को चर्बी वाले कारतूस के धार्मिक जोश की आड़ में मेरठ में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलन्द कर ही तो दिया इससे देश में दुबारा से स्वतन्त्रता की इच्छा जाग उठी। राजवंशों ने तलवार तान स्वतन्त्रता देवी का स्वागत किया, समस्त राष्ट्र ने फिरंगी को दूर करने की मन में ठान ली ।
भला इस शुभ अवसर को देख राव राजा तुलाराम कैसे शान्त बैठते ? उन्होंने भी उचित अवसर देख स्वतन्त्रता के लिए शंख ध्वनि बजा दी । वीर राजा तुलाराम की ललकार को सुनकर हरियाणा के समस्त रणबांकुरे स्वतन्त्रता के झण्डे के नीचे इकट्ढे हो गए शत्रु से दो दो हाथ करने के लिए दिल्ली की ओर चल दिए ।

जब राव तुलाराम अपनी सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे, तो रास्ते में सोहना और तावड़ू के बीच अंग्रेजी सेना से मुठभेड़ हो गई, क्योंकि फिरंगियों को राव तुलाराम के बारे में पता चल गया था । दोनों सेनाओं का घमासान युद्ध हुआ । आजादी के दीवाने दिल खोल कर लड़े और मैदान जीत लिया । मिस्टर फोर्ड जो अंग्रेजो की तरफ से लड़ रहा था उसको मुंह की खानी पड़ी और उसकी सारी फौज नष्ट हो गई और वह स्वयं दिल्ली भाग आया ।

यह सब सुनकर राव राजा तुलाराम के चचेरे भाई राव कृष्ण गोपाल जो की नांगल पठानी (रेवाड़ी के पास ) के राव जीवाराम के द्वितीय पुत्र थे और मेरठ में कोतवाल पद पर थे, उन्होंने सारे कैदखानों के दरवाजों को खोल दिया तथा नवयुवकों को स्वतन्त्रता के लिए ललकारा और समस्त वीरों को स्वाधीनता के झण्डे के नीचे एकत्र किया । अपने साथियों सहित जहां अंग्रेज विद्रोह का दमन करने के लिए परामर्श कर रहे थे, उस स्थान पर आक्रमण किया तथा समस्त अंग्रेज अधिकारियों का सफाया कर दिया और फिर मार-धाड़ मचाते अपने साथियों सहित दिल्ली की तरफ बढ़े ।

राव कृष्णगोपाल को जब राजा तुलाराम स्वतन्त्रता के लिए महान् प्रयत्न कर रहे हैं तो उन्होंने एक सभा में बाकी महाराजा को बुलाया जैसे अलवर, राजा बल्लभगढ़, राजा निमराणा, नवाब झज्जर, नवाब फरुखनगर, नवाब पटौदी, नवाब फिरोजपुर झिरका शामिल हुए लेकिन नवाब फरुखनगर, नवाब झज्जर एवं नवाब फिरोजपुर झिरका ने किसी प्रकार की मदद करने से मना कर दिया। इस पर उनको बड़ा क्रोध आया और उन्होंने सभा में ही घोषणा कर दी कि “चाहे कोई सहायता दे या न दे, वह राष्ट्र के लिए कृत-प्रतिज्ञ हैं ।
उन्होंने अपने चचेरे भाई गोपालदेव को सेनापति नियत किया । उसके बाद अंग्रेजो ने फोर्ड के दुबारा एक विशाल के साथ सेना राव तुलाराम से युद्ध करने के लिए भेजा। तब राव तुलाराम ने रेवाड़ी की बजाय महेन्द्रगढ़ के किले में मोर्चा लेने के लिए महेन्द्रगढ़ की ओर प्रस्थान शुरू किया। अंग्रेजों ने गोकुलगढ़ के किले तथा राव तुलाराम के निवासघर, जो रामपुरा (रेवाड़ी) में स्थित है उसको सुरंगें से नष्ट-भ्रष्ट कर दिया

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राव तुलाराम कोशिश कर रहे थे की कैसे भी महेन्द्रगढ़ के किले का फाटक खुल जाये लेकिन ठाकुर स्यालुसिंह जो की वहा के अध्यक्ष थे उसने हजार विनती करने पर भी किले के द्वार आजादी के दीवानों के लिए नहीं खोले (बाद में अंग्रेजों ने दुर्ग न खोलने के उपलक्ष्य में स्यालुसिंह को समस्त कुतानी ग्राम की भूमि प्रदान कर दी ।) शयाद ऐसे बहुत से कारण है जो हमारे देश को जुलमी में देखना पसंद करते थे।

उसके बाद राव तुलाराम ने हार ना मानते हुवे नारनौल के समीप एक पहाड़ी स्थान नसीबपुर के मैदान में साथियों सहित वक्षस्थल खोलकर रणस्थल में डट गये उसके बाद वहा पर युद्ध हुवा वीरों के खून में उबाल था और अंग्रेजो की फाड़ कर रख दी। तीन दिन तक भीषण युद्ध हुआ हिन्दू कुल गौरव महाराणा प्रताप के घोड़े की भांति राव तुलाराम का घोड़ा भी शत्रु सेना को चीरते हुए अंग्रेज अफसर (जो काना साहब के नाम से विख्यात थे) के हाथी के समीप पहुंचा। वीरवर तुलाराम ने हाथी का मस्तक अपनी तलवार के भरपूर वार से पृथक् कर दिया । दूसरे प्रहार से काना साहब को ऊपर पहुंचा।

काना साहब के धराशायी होते ही शत्रु सेना में भगदड़ मच गई । शत्रु सेना तीन मील तक भागी । मि० फोर्ड भी मैदान छोड़ भागा और दादरी के समीप मोड़ी नामक ग्राम में एक जाट चौधरी के यहां शरण ली । बाद में मि० फोर्ड ने अपने शरण देने वाले चौधरी को जहाजगढ़ (रोहतक) के समीप बराणी ग्राम में एक लम्बी चौड़ी जागीर दी और उस गांव का नाम फोर्डपुरा रखा, वहां पर आजकल उस चौधरी के वंशज निवास करते हैं ।देख लो दोस्तों पहले क्या क्या हुवा।

उसके बाद हमारे खुद के भाइयों जैसे पटियाला, नाभा, जीन्द एवं जयपुर की देशद्रोही नागा फौज ने अंग्रेजों की सहायता करके दुबारा भीषण युद्ध छेद दिया अब इतनी बड़ी सेना के होते हुवे छोटी सेना कहा तक चलती

इसी नसीबपुर के मैदान में राजा तुलाराम के महान् प्रतापी योद्धा, मेरठ स्वाधीनता-यज्ञ को आरम्भ करने वाले, अहीरवाल के एक-एक गांव में आजादी का अलख जगाने वाले, राव तुलाराम के चचेरे भाई वीर शिरोमणि राव कृष्णगोपाल एवं कृष्णगोपाल के छोटे भाई वीरवर राव रामलाल जी और राव किशनसिंह, सरदार मणिसिंह, मुफ्ती निजामुद्दीन, शादीराम, रामधनसिंह, समदखां पठान आदि-आदि महावीर क्षत्रिय जनोचित कर्त्तव्य का पालन करते हुए भारत की स्वातन्त्र्य बलिवेदी पर बलिदान हो गये ।

उन महान् योद्धाओं के पवित्र रक्त से रंजित होकर नसीबपुर के मैदान की वीरभूमि हरियाणा का तीर्थस्थान बन गई ।

दुःख है कि आज उस युद्ध को समाप्त हुए एक शताब्दि हो गई किन्तु हरयाणा निवासियों ने आज तक उस पवित्र भूमि पर उन वीरों का कोई स्मारक बनाने का प्रयत्न ही नहीं
किया और साहस भी न किया ।

यदि भारत के अन्य किसी प्रान्त में इतना बलिदान किसी मैदान में होता तो उस प्रान्त के निवासी उस स्थान को इतना महत्व देते कि वह स्थान वीरों के लिए आराध्य-भूमि बन जाता तथा प्रतिवर्ष नवयुवक इस महान् बलिदान-भूमि से प्रेरणा प्राप्त कर अपना कर्त्तव्य पालन करने के लिए उत्साहित होते लेकिन ये हमारा हरियाणा पूरी दुनिया में सबसे अलग है

अर्थात् जो राष्ट्र अपने प्राचीन गौरव को भुला बैठता है, वह राष्ट्र अपनी राष्ट्रीयता के आधार स्तम्भ को खो बैठता है । यही उक्ति हरयाणा के निवासियों पर पूर्णतया चरितार्थ होती है ।

नसीबपुर के मैदान में राव तुलाराम हार गये और अपने बचे हुए सैनिकों सहित रिवाड़ी की तरफ आ गये । सेना की भरती आरम्भ की । परन्तु अब दिन प्रतिदिन अंग्रेजों को पंजाब से ताजा दम सेना की कुमुक मिल रही थी ।

अक्तूबर 1857 के अन्त तक अंग्रेजों के पांव दिल्ली और उत्तरी भारत में जम गये । तुलाराम अपने नये प्रयत्न को सफल न होते देख बीकानेर, जैसलमेर पहुंचे । वहां से कालपी के लिए चल दिये । इन दिनों कालपी स्वतन्त्रता का केन्द्र बना हुआ था । यहां पर पेशवा नाना साहब के भाई, राव साहब, तांत्या टोपे एवं रानी झांसी भी उपस्थित थी ।

उन्होंने राव तुलाराम का महान् स्वागत किया तथा उनसे सम्मति लेते रहे । इस समय अंग्रेजों को बाहर से सहायता मिल रही थी । कालपी स्थित राजाओं ने परस्पर विचार विमर्श कर राव राजा तुलाराम को अफगानिस्तान सहायता प्राप्त करने के उद्देश्य से भेज दिया ।

राव तुलाराम वेष बदलकर अहमदाबाद और बम्बई होते हुए बसरा (ईराक) पहुंचे । इस समय इनके साथ श्री नाहरसिंह, श्री रामसुख एवं सैय्यद नजात अली थे । परन्तु खाड़ी फारस के किनारे बुशहर के अंग्रेज शासक को इनकी उपस्थिति का पता चल गया । भारतीय सैनिकों की टुकड़ी जो यहां थी, उसने राव तुलाराम को सूचित कर दिया और वे वहां से बचकर सिराज (ईरान) की ओर निकल गये ।

सिराज के शासक ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें शाही सेना की सुरक्षा में ईरान के बादशाह के पास तेहरान भेज दिया । तेहरान स्थित अंग्रेज राजदूत ने शाह ईरान पर उनको बन्दी करवाने का जोर दिया, शाह ने निषेध कर दिया ।

तेहरान में रूसी राजदूत से राव तुलाराम की भेंट हुई और उन्होंने सहायता मांगी और राजदूत ने आश्वासन भी दिया । परन्तु पर्याप्त प्रतीक्षा के पश्चात् राव तुलाराम ने अफगानिस्तान में ही भाग्य परखने की सोची । उनको यह भी ज्ञात हुआ कि भारतीय स्वातन्त्र्य संग्राम में भाग लेने वाले बहुत से सैनिक भागकर अफगानिस्तान आ गये हैं । राजा तुलाराम डेढ़ वर्ष पीछे तेहरान से अमीर काबुल के पास आ गये, जो उन दिनों कंधार में थे । वहां रहकर बहुत प्रयत्न किया परन्तु सहायता प्राप्त न हो सकी । राव तुलाराम को बड़ा दुःख हुआ और 6 वर्ष तक अपनी मातृभूमि से दूर रहकर उसकी पराधीनता की जंजीरों को काटने के प्रयत्न में एक दिन काबुल में पेचिस (पेचिश (Dysentery) या प्रवाहिका, पाचन तंत्र का रोग है जिसमें गम्भीर अतिसार (डायरिया) की शिकायत होती है और मल में रक्त एवं श्लेष्मा (mucus) आता है। यदि इसकी चिकित्सा नहीं की गयी तो यह जानलेवा भी हो सकता है। )द्वारा इस संसार से प्रयाण कर गये ।

उन्होंने वसीयत की कि उनकी भस्म रेवाड़ी और गंगा जी में अवश्यमेव भेजी जावे । ब्रिटिश शासन की ओर से 1857 के स्वातन्त्र्य संग्राम में भाग लेने वालों के लिए सार्वजनिक क्षमादान की सूचना पाकर उनके दो साथी राव नाहरसिंह व राव रामसुख वापस भारत आये ।

 

राव तुलाराम समान में किए गए कुछ काम।

23 सितम्बर 2001, को भारत सरकार ने महाराजा राव तुलाराम की स्मृति में डाक टिकेट जारी किया। उनके सम्मान में बने, जफरपुर कलाँ का “राव तुलाराम मेमोरियल चिकित्सालय और महाराजा राव तुलाराम मार्ग पर स्थित ‘रक्षा अध्ययन व विश्लेषण संस्थान’ व महाराजा राव तुलाराम पोलिटेक्निक, वजीरपुर चिराग दिल्ली प्रमुख है।

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  • राव तुलाराम मेमोरियल अस्पताल, जाफरपुर कलान, दिल्ली
  • राव तुलाराम मार्केट, निहाल विहार, नांगलोई, दिल्ली
  • राव तुलाराम मार्केट, मोहन गार्डन, हौसल, दिल्ली
  • राव तुलाराम सरकार सर्वोदय स्कूल, नई दिल्ली
  • श्री तुला राम पब्लिक स्कूल, सुल्तानपुरी, दिल्ली
  • राव तुलाराम स्टेडियम, रेवाड़ी, हरियाणा
  • शाहिद राव तुलाराम पार्क, एलआईसी कार्यालय के पास, चंदौसी, संभल जिला, उत्तर प्रदेश
  • आईजीआई एयरपोर्ट दिल्ली के पास राव तुलाराम मार्ग
  • राव तुलाराम चौक, खेरा गांव, गुड़गांव, हरियाणा
  • राव तुलाराम चौक, मित्र कॉलोनी, महेन्द्रगढ़, हरियाणा
  • राव तुलाराम चौक (नैवाली चौक), रेवाड़ी, हरियाणा
  • राव तुलाराम मेमोरियल पार्क, रेवाड़ी, हरियाणा
  • राव तुलाराम राष्ट्रीय प्रोजेस सेन सेक। स्कूल, बीकानेर, राजस्थान
  • राव तुलरम मॉडल कोलाज, सेक्शन 51 गुड़गांव
  • राव तुलाराम सर्किल (जेल सर्कल), अलवर, राजस्थान
  • राव तुलाराम फाउंटेन पार्क, सेक्शन 4, गुड़गांव
  • राव तुलाराम स्टेडियम, धन कालन, हिसार, हरियाणा
  • राव तुलाराम सेन सेक। स्कूल, जामावाडी, हांसी, हरियाणा
  • शाहिद राव तुलाराम सेन सेक। स्कूल, सुरजनवास, हरियाणा
  • राव तुलाराम खेल स्टेडियम, पटुआडा, हरियाणा
  • राव तुलाराम खेल स्टेडियम, मिश्री, चाकी दादरी, हरियाणा
  • राव तुलाराम चौक, झज्जर, हरियाणा
  • शाहिद राव तुलाराम पार्क, बसंत विहार, बहादुरगढ़, हरियाणा
  • राव तुलाराम विहार, रेवाड़ी, हरियाणा

 

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