Prerak Prasang in Hindi For Student महापुरूषों के श्रेष्ठ प्रेरक प्रसंग

संसार में जो भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व की प्रतिभा से प्रगति की बुलन्दियों पर पहुंचे है उनके हाथ कोई चमत्कार या अलादीन का जादुई चिराग नहीं लग गया था, उन्होंने बहुत परिश्रम लग्नशोलता, कार्य के प्रति सच्ची निष्ठा, धैर्य के साथ अपने उद्देश्य में लगे रहने का मूल मन्त्र था । आज हम आपको बहुत से महापुरूषों के प्रेरक प्रसंग बताएँगे जो की दार्शनिक, लेखक, कवि, आविष्कारक, वैज्ञानिक, सन्त थे और बहुत से लोग सामान्य ग़रीब घरानों में पैदा हुए परन्तु अपनी लग्नशीलता से वे संसार को रोशनी दे गये। प्रेरक प्रसंग मनुष्य के मन-मस्तिष्क को बदल देते हैं, उसके जीवन को सभ्य, सुसंस्कृत और मानवीय करुणा से पूर्ण कर देते हैं। Prerak Prasang in Hindi में पढ़ सकते है जिससे आपको जीवन में बहुत कुछ सिखने को मिलेगा।

ये प्रेरक प्रसंग आपके जीवन में नयी भावनाओं का सञ्चार करेगी, कर्तव्य पथ पर लगे लोगों के लिए मील का पत्थर बनेगी, जो लोग प्रगति का मार्ग ढूंढ़ते हैं, उनका पथ-प्रदर्शक बनेगी।

 

Prerak Prasang in Hindi For Student

 

Prerak Prasang No 1# स्त्री जाति का सम्मान (चंद्रशेखर आजाद )

 

चन्द्रशेखर आज़ाद स्त्री जाति का बड़ा सम्मान करते थे। उन दिनों एक अंग्रेज सम्पादक क्रान्तिकारियों के विरुद्ध बहुत लिखा करता था। इस पर एक साथी ने कहा कि उस सम्पादक को गोली मार दी जाये।

उसने एक योजना भी पेश की कि वह सम्पादक सपत्नीक अमुक समय पर मोटर से गुज़रता है, उसको खत्म कर दिया जाये।

इस पर भैया क्रुद्ध होकर बोले-”स्त्रियों और बच्चों पर हाथ उठाना, क्या यही क्रान्तिकारी का धर्म है?”
साथी चुप रह गया और अपनी भूल स्वीकार की।

 

Prerak Prasang No 2# बच्चों को सुझाव (डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद )

राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू ने एक दिन देखा की उनकी किताब के पन्ने फटे हुए हैं। उन्हें यह समझते देर न लगी कि यह बच्चों का काम है। राजेन्द्र बाबू उनसे बातें कहलवा देना चाहते थे। परन्तु वह चाहते थे कि स्वयं बच्चों पर आरोप न लगायें।
उनकी समझ में ऐसा करने से बच्चों में अपराधी होने की की भावना का उदय होगी।

आखिर उन्हें एक उपाय सूझ ही गया। उन्होंने बच्चों को बुलाकर कहा-‘‘जिस बच्चे न किताब के जितने पन्ने फाडे हैं, उसे उतने पैसे इनाम में दिये जायेंगे।’’ सबने खुशी-खुशी पन्ने फाड़ने की बात बता दी।

उन्हें इनाम भी दिये गये परन्तु साथ ही रोजन्द्र बाबू ने उन्हें समझाया कि पन्ने फाड़ना अच्छी बात नहीं। सारी बात अब बच्चों की समझ में आ गयी थी। उन्होंने अपनी ग़लती कुबूल की और फिर ऐसी गलती न करने का वायदा भी किया।

Prerak Prasang No 3# भगत सिंह के विचार

भगत सिंह ने फांसी का हुक्म सुनने के बाद नवम्बर 1930 में, अपने प्रिय साथी श्री बटुकेश्वर दत्त को लिखा था। बटुकेश्वर दत्त उस समय मुलतान जेल में थे। भगत सिंह का यह पत्र बड़ा मार्मिक है। उन्होंने अपने मन की सारी बातें कह डाली हैं।

उन्होंने पत्र में लिखा-‘मुझे दण्ड सुना दिया गया है और फांसी का आदेश हुआ है। इन कोठरियों में मेरे अतिरिक्त फांसी की प्रतीक्षा करने वाले बहुत से अपराधी हैं। ये लोग यही प्रार्थना कर रहे हैं कि, किसी तरह फांसी टल जाये, परन्तु उनके बीच शायद मैं ही ऐसा आदमी हूं, जो बड़ी बेताबी से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूं, जब मुझे अपने आदर्श के लिए फांसी के फंदे पर झूलने का सौभाग्य प्राप्त होगा।

मैं इस खुशी के साथ फांसी के तख्ते पर चढ़कर दुनिया को दिखा देंगा कि क्रान्तिकारी अपने आदर्शों के लिए कितनी वीरता से बलिदान कर सकते मुझे फांसी का दण्ड मिला है, किन्तु तुम्हें आजीवन कारावास का दण्ड मिला ।

तुम जीवित रहोगे और तुम्हें जीवित रहकर यह दिखाना है कि है क्रान्तिकारी अपने आदर्शों के लिए केवल मर ही नहीं सकते अपितु जीवित रहकर मुसीबत मुकाबला का भी कर सकते हैं।

मृत्यु सांसारिक कठिनाईयों से साधन नहीं मक्ति का बननी चाहिएअपितु जो क्रान्तिकारी संयोगवश फांसी के फन्दे से बच गये हैं, उन्हें जीवित रहकर दुनिया को यह दिखा देना चाहिए कि वे न केवल अपने आदर्शों के लिए फांसी पर चढ़ सकते हैं,

अपितु जेलों की अन्धकारपूर्ण छोटी कोठरियों में घुलजुलकर निकृष्टतम दरजे के अत्याचारों को सहन कर सकते हैं।’ भगत सिंह के ख़याल कैसे थे? यह इस पत्र से स्पष्ट है।

 

Prerak Prasang No 4# अनुसाशन (डॉक्टर जाकिर हुसैन)

राष्ट्रपति जाकिर हुसैन दिल्ली स्थित जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के प्राण थे। अपनी खासी उम्र उन्होंने इस विद्या केन्द्र की स्थापना और विकास में लगा दी। बात उन दिनों की है, जब वह इसके प्रधान थे।

जाकिर साहब बड़े अनुशासनप्रिय और को सफ़ाई पसन्द शिक्षाविद् थे। उनकी इच्छा थी कि वहां के छात्र भी साफ़-सुथरे रहें और प्रतिदिन अपने जूतों पर पॉलिश करके आया करें। परन्तु उन्होंने महसूस किया कि विद्यार्थी उनके कहे पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, इसलिए उन्होंने विद्यार्थियों को अच्छा सबक सिखाना चाहा।

एक दिन प्रात छात्रों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि संस्था के साहब विद्यालय के द्वार पर पॉलिश और बुश लिये बैठे हैं। यह देखकर छात्रगण पानी-पानी हो गये।
इस घटना का विद्यार्थियों पर अनुकूल प्रभाव पड़ा। अब वे नियम से अपने जूतों पर पालिश करके आने लगे थे। उनमे बेहद अनुशासन भी देखने में आता था।

 

Prerak Prasang No 5#  दृढ़ संकल्प ( अब्राहम लिंकन )

लिंकन के नौजवानी के दिनों की घटना है। वह बहुत निर्धन थे, लेकिन उनके अन्दर आगे बढ़ने, कुछ कर गुजरने की बड़ी ललक थी, कठिन संकल्प था।
एक बार उन्हें पता चला कि नदी के दूसरी ओर ओगमोन नामक गांव में एक अवकाश प्राप्त न्यायाधीश रहते हैं, जिनके पास कानून की पुस्तकों का अच्छा संग्रह है। इसलिए लिंकन कड़ाके की सर्दी के दिनों में उस बरौली नदी में नाव में बैठ गये। नाव वह स्वयं खे रहे थे। आधी नदी उन्होंने पार की होगी कि नाव एक बड़े बर्फ के पत्थर से टकराकर चूर-चूर हो गयी। फिर भी साहस के धनी नौजवान लिंकन निराश नहीं हुए। उन्होंने बड़ी मुश्किल से तैरकर नदी पार की और जा पहुंचे रिटायर्ड जज के घर ।

 

इत्तफाक से उस समय जज का घरेलू नौकर भी नहीं , इसलिए था लिंकन को जज के छोटे-मोटे काम भी करने पड़ते। वह जंगल से लकड़ियां बटोरकर लाते और घर में पानी भी भर कर लाते और पारिश्रमिक? पारिश्रमिक के नाम पर सिर्फ एक ही इच्छा कि वह जज की सारी किताबें पढ़ने भर को पा सकें। जज ने खुशी-खुशी उन्हें अपनी पुस्तकें पढ़ने का मौका दिया। संकल्प के धनी लिंकन आगे चलकर अमरीका के राष्ट्रीय जीवन में छाये रहे और देश के सर्वोच्च आसन पर जा विराजे, राष्ट्रपति के रूप में। सच ही है, संकल्प हो, तो आदमी क्या नहीं कर सकता।

Prerak Prasang No 6 # अपना काम स्वयं करो (ईश्वर चन्द्र विद्यासागर)

प्रख्यात शिक्षाविद् ईश्वर चन्द्र विद्या सागर को भला कौन नहीं जानता, जिनके त्याग, परोपकार, न्यायप्रियता, क्षमाशीलता के किस्से मशहूर हो चुके हैं। एक दिन एक नवयुवक कलकत्ता स्टेशन पर गाड़ी से उतरा और कुलीकुली पुकारने लगा। हालांकि उसके पास इतना ही सामान था कि वह आसानी से हो सकता था। एक सीधे-सादे सज्जन उनके पास आये और बोले-‘‘कहां चलना है?” वह युवक किसी स्कूल में पढ़ने (ट्रेनिंग के लिए) आया था।

इसलिए उसने स्कूल का नाम बताया। वह सज्जन उसका सामान उठाकर चलने लगे। स्कूल पास ही में था। जल्दी ही वह पहुंच गये। जब वह सामान रखकर जाने लगे, तो उसने उन्हें इनाम देना चाहा। सामान ढोने वाले ने कहा- मुझे कोई इनाम नहीं चाहिए।

अपना काम स्वयं करने की कोशिश करेंयही मेरा इनाम है।” इतना कहकर वह आदमी चला गया।

अगले रोज जब वह विद्यार्थी कॉलेज पहुंचा, तो प्रार्थना स्थल पर उसने देखा कि वह अदमी प्रधानाचार्य के उच्चासन पर विराजमान हैं। उसे काटो, तो खून नहीं। प्रार्थना के बाद जब विद्यार्थी अपनी-अपनी कक्षाओं में चले गयेतो उसने प्रधानाचार्य के चरणों में अपना सिर रखकर माफी मांगी। प्रधानाचार्य थे-ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, जो किसी भी काम को छोटा नहीं समझते थे।

उन्होंने अपने विद्यार्थी का सामान ढोकर उसे अच्छा सबक सिखाया और अपना काम स्वयं करने की प्रेरणा भी इसी बहाने दी। अब ढूंढे से भी ऐसे प्रधानाचार्य नहीं मिल पाते हैं।

 

Prerak Prasang No 7 # कपड़े के जूते (स्वामी विवेकानन्द )

 

स्वामीजी के अमेरिका प्रवास की बात है। एक दिन वे एक बगीचे में टहल रहे थे। तभी एक अंग्रेज महिला की नजर उन पर पड़ी। उसने स्वामीजी को गौर से देखा और इठलाती हुई बोली-” आप अन्यथा न लें, तो मैं आपसे एक प्रश्न करू ।”

स्वामीजी बोले-‘हां-हां, जरूर प्रश्न पूछिये।” उसने पूछा-‘स्वामीजी ! आपका सारा परिधान तो भारतीय है, पर आपके कपड़े के जूते तो भारतीय नहीं हैं, फिर आपने ये क्यों पहन रखे हैं?” स्वामीजी सहजता से बोले-“ये जूते जिनकी देन हैं, मैं उन्हें यहीं तक रखना चाहता हूं।

मैं इसीलिए इन्हें पहनता हूं।” महिला शर्म से खड़ी हो गयी। कहां तो चली थी स्वामीजी को भारतीयता का पाठ पढ़नेपर उसे अब अपनी श्रेष्ट ‘ जाति का गया ‘‘की महत्ता पता चल था।

 

Prerak Prasang No 8 # हिन्दी की जीत (पट्टाभि सीता रमैया)

 

प्रसिद्ध गांधीवाद नेता और कांग्रेस के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉक्टर पट्टाभि सीता रमैया अपने सभी पत्रों पर हिन्दी में ही पता लिखते थे। इस कारण से दक्षिण के डाकखाने वालों को बड़ी असुविधा होती थी।

उन सबने उनको कहला भेजा कि आप अंग्रेजी 1. में पता लिखा करेंताकि डाक बांटने में आसानी हो। डॉक्टर सीता रमैया ने उनसे कहा- भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है, अत: मैं अपने पत्र-व्यवहार में उसी का प्रयोग करूंगा।” पोस्ट ऑफिस वालों ने उनको धमकी दी-‘‘यदि आप अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आयेतो हम आपकी सारी चिट्ठियां डेड लेटर ऑफिस को भेज देंगे।” डॉक्टर सीता रमैया पर इस धमकी का कोई असर नहीं हुआ।

दोनों के बीच अर्से तक शीतयुद्ध जारी रहा। अन्त मेंडाकखाने वाले झुक ही गये। मजबूरन उन्हें मछली पट्टणम के डाकखाने में एक हिन्दी जानने वाले आदमी को रखना पड़ा। इस तरह जीत हिन्दी की ही हुई।

 

The Author

Romi Sinha

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