पंचतंत्र की मजेदार कहानियां 😋 Panchatantra Stories in Hindi 😇

पंचतंत्र की मजेदार कहानियां 😋 Panchatantra Stories in Hindi 😇
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दोस्तों आज हम आपको पंचतंत्र की कहानियो के बारे में बातयेंगे। पंचतंत्र की कहानियां 2500 साल पहले विष्णु शर्मा द्वारा लिखी गई थी जिनका महत्त्व आज का मार्गदर्शन किया जाता है। आज हम आपके लिए लाये है पंचतंत्र की सबसे अच्छी कहानियाँ। Panchatantra Stories in Hindi बहुत ही प्रेरणादायक कहानियाँ आईये पढ़ते है 

Panchatantra Stories in Hindi

Panchatantra Stories in Hindi

दक्षिण के किसी जनपद में एक नगर था—महिलारोप्य। वहाँ का राजा अमरशक्ति बड़ा ही पराक्रमी तथा उदार था। संपूर्ण कलाओं में पारंगत राजा अमरशक्ति के तीन पुत्र थे—बहुशक्तिउग्रशक्ति तथा अनतशाक्त। राजा स्वयं जितना ही नीति, विद्वान, गुणी और कलाओं में पारंगत था, दुर्भाग्य से उसके तीनों पुत्र उतने ही उदंड अज्ञानी और दुर्दिनीत थे।

अपने पुत्रों की मूर्खता और अज्ञान से चिंतित राजा ने एक दिन अपने मंत्रियों से कहाऐसे मूर्ख और अविवेकी पुत्रों से अच्छा तो निस्संतान रहना होता। पुत्रों के मरण से भी इतनी पीड़ा नहीं होती, जितनी मूवं पुत्र से होती है। मर जाने पर तो पुत्र एक ही बार दुःख देता हैकिंतु ऐसे पुत्र जीवनभर अभिशाप की तरह पीड़ा तथा अपमान का कारण बनते हैं। हमारे राज्य में तो हजारों विद्वानकलाकार एवं नीतिविशारद महापंडित रहते हैं। कोई ऐसा उपाय करो कि ये निकम्मे राजपुत्र शिक्षित होकर विवेक और ज्ञान की ओर बढ़ें।”

मंत्री विचारविमर्श करने लगे। अंत में मंत्री सुमति ने कहा, ‘महाराज व्यक्ति का जीवनकाल तो बहुत ही अनिश्चित और छोटा होता है। हमारे राजपुत्र अब बड़े हो चुके हैं। विधिवत् व्याकरण एवं शब्दशास्त्र का अध्ययन आरंभ करेंगे तो बहुत दिन लग जाएंगे। इनके लिए तो यही उचित होगा कि इनको किसी संक्षिप्त शास्त्र के आधार पर शिक्षा दी। जाएजिसमें सार-सार ग्रहण करके निस्सार को छोड़ दिया गया हो, जैसे हंस दूध तो ग्रहण कर लेता , पानी को छोड़ देता है। ऐसे एक महापंडित विष्णु शर्मा आपके राज्य में ही रहते हैं। सभी शास्त्रों में पारंगत विष्णु शर्मा की छात्रों में बड़ी प्रतिष्ठा है। आप तो राजपुत्रों को शिक्षा के लिए उनके हाथों ही सौंप दीजिए”

राजा अमरशक्ति ने यही किया। उन्होंने महापंडित विष्णु शर्मा का आदर-सत्कार करने के बाद विनय के साथ अनुरोध किया‘आर्यआप मेरे पुत्रों पर इतनी कृपा कीजिए कि इन्हें अर्थशास्त्र का ज्ञान हो जाए। मैं आपको दक्षिणा में सौ गाँव प्रदान करेंगा।”
आचार्य विष्णु शर्मा ने निर्धक स्वर में कहा“मैं विद्या का विक्रय नहीं करता, देव मुझे सौ गाँव लेकर अपनी विद्या बेचनी नहीं है। किंतु मैं वचन देता हूँ कि छह मास में ही आपके पुत्रों को नीतियों में पारंगत कर ढूँगा। यदि न कर सकें तो ईश्वर मुझे विद्या से शून्य कर दे!” महापंडित की यह विकट प्रतिज्ञा सुनकर सभी स्तब्ध रह गए।

राजा अमरशक्ति ने मंत्रियों क साथ विष्णु शर्मा की पूजा-अभ्यर्थना की और तीनों राजपुत्रों को उनके हाथ सौंप दिया।

राजपुत्रों को लेकर विष्णु शर्मा अपने आवास पर पहुँचे। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार छह मास में ही उन्हें अर्थनीति में निपुण करने के लिए एक अत्यंत रोचक ग्रंथ की रचना की। उसमें पाँच तंत्र थे मित्रभेद, मित्रसंप्राप्ति मित्रलाभ, काकोलूकीय, लब्धप्रणाशम् तथा अपरीक्षितकारक। इसी कारण उस ग्रंथ का नाम ‘पंचतंत्र’ प्रसिद्ध हो गया। लोक-गाथाओं से उठाए गए दृष्टांतों से भरपूर इस रोचक ग्रंथ का अध्ययन करके तीनों अशिक्षित और उड राजपुत्र ब्राह्मण की प्रतिज्ञा के अनुसार छह मास में ही नीतिशास्त्र में पारंगत हो गए।

 

पंचतंत्र को पाँच तंत्रों में बाँटा गया है तो आईये पढ़ते है पंचतंत्र की सभी कहानियाँ

प्रथम तंत्र

Panchatantra Stories No. 1 मित्रभेद

दक्षिण के किसी जनपद में एक नगर था—महिलारोप्य। वहीं वर्धमान नाम का एक वैश्य रहता था। उसने सदाचारपूर्वक काफी धन कमाया था। एक रोज रात को सोते समय उसके मन में आया कि अपने पास कितनी भी धनसंपत्ति हो, फिर भी धन की वृद्धि करने क लिए धनोपार्जन का सतत प्रयास करते रहना चाहिए। मित्र और बंधुबांधव तभी तक आत्मीयता दिखाते हैं, जब तक मनुष्य के पास धन होता है। धनवान् व्यक्ति को ही उत्तम पुरुष और विद्वान् भी माना जाता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को निरंतर धन की वृद्धि के लिए उचित उपाय करते रहना चाहिए।

उसने अंततः व्यापार करने का निश्चय कर लिया। अगले दिन से ही उसने व्यापार के लिए तैयारी आरंभ कर दी। उसने ढेर सारी ऐसी सामग्री खरीदी जो परदेश में अच्छे मूल्य पर बिक सके। एक दिन सारी सामग्री रथों पर लादकर वह व्यापारियों के एक दल के साथ मथुरा की ओर चल पड़ा।

वर्धमान के रथ में उसके दो प्रिय बैल जुते थे। एक का नाम संजीवक था, दूसरे का नंदक। दोनों ही खूब हृष्ट-पुष्ट और बलिष्ठ थे। लेकिन यमुना नदी के पास जंगल के भीतर फैले दलदल में फंस जाने के कारण संजीवक सहसा जुआ तोड़कर गिर पड़ा। उसका एक पाँव टूट जाने के कारण वह चलने में असमर्थ हो गया।

वर्धमान संजीवक को बहुत चाहता था। उसकी पीड़ा से दुखी वह तीन रातों तक जंगल में ही पड़ा रहा। उसे आशा थी कि शायद कुछ सँभल जाने पर संजीवक फिर चल सके। वर्धमान के साथी व्यापारियों ने उसे समझाया कि संजीवक के कारण सिंहबाघ आदि वन्य पशु आसपास ही भंडराने लगे हैं। इस एक बैल के लिए हम सबका जीवन खतरे में डालना ठीक नहीं। बुद्धिमानों को चाहिए कि जब बहुत कुछ दाँव पर लगा हो तो थोड़े का त्याग करके अधिक- से-अधिक बचा लें। आप भी संजीवक का मोह छोड़कर यहाँ से निकल चलेंइसीमें हम सबकी भलाई है।

संजीवक को उस दशा में छोड़ते बड़ी पीड़ा हो रही थी, तो भी विवशता  थी। वर्धमान ने संजीवक की रक्षा के लिए कुछ रक्षक नियुक्त कर दिए और स्वयं दल के साथ मथुरा नगर की ओर बढ़ गया। उनके जाने के बाद रक्षकों की रात बड़ी कठिनाई से बीती। चारों ओर से हिंत्र जंतुओं की दहाड़ सुनाई पड़ रही थी। भोर होते ही सारे रक्षक वहाँ से भागे और जाकर व्यापारियों के दल में मिल गएउन्होंने वर्धमान को झूठी सूचना दी कि संजीवक तो रात में ही मर गया।

वर्धमान दुख से तड़प उठा; लेकिन अब कर भी क्या सकता था! उधर यमुना-तट की शीतल बयार से संजीवक धीरेधीरे स्वस्थ हो चला। फिर एक दिन वह उठ खड़ा हुआ। तट पर जाकर वह हरीहरी कोमल घास चरने लगा। शरीर में जान पड़ी और कुछ ही दिनों में वह स्वच्छंदतापूर्वक चरता-खाता हुआ काफी बलिष्ठ हो गया।

रगपुट्टे कस उठेऊँची डील के कारण वह खूब स्वस्थ और बलशाली दिखने लगा। अब वह प्राय: इधर-उधर भटकता रहता और जोश में आकर शिखर को अपने भारी-भरकम सींगों से चीरता-सा जोर-जोर से डकारता-हंकारता रहता था ।

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उस वन का राजा एक सिंह था। उसका नाम था पिंगलक। एक दिन पिंगलक पानी पीने के लिए यमुनातट पर पहुँचा ही था कि पास ही कहीं से संजीवक का गंभीर गर्जन सुनाई पड़ा। उस विचित्र गर्जन को सुनकर पिंगलक आतंकित हो उठा। व्याकुल होकर वह बिना पानी पिए ही लौट पड़ा और घने जंगल के बीच एक वट वृक्ष के नीचे छिपकर बैठ गया। सावधानी के लिए उसने अपने मित्रोंअमात्यों और बंधुबांधवों को अपने चारों और व्यूह बनाकर बैठा दिया, जिससे कोई अचानक सीधा उसपर आक्रमण न कर सके।

पिंगलक का पहले एक श्रृंगाल मंत्री था। अब वह तो जीवित नहीं था, पर उसके दो पुत्र थे करटक और दमनक। इन दोनों को पिंगलक सिंह की सभा में मंत्री का पद नहीं मिला था। इस बात से दोनों दुखी भी थे; किंतु वे सदा वनराज पिंगलक के आगेपीछे ही रहते थे।

उन दोनों ने पिंगलक को इस प्रकार चारों ओर घेरासा बनाकर दुबके बैठे देखा तो आपस में विचार करने लगे।

दमनक बोला‘भाई करटक, हमारा स्वामी राजा पिंगलक प्यास से व्याकुल होकर यमुनातट पर पानी पीने गया था। लेकिन बिना पानी पिए  ही एकाएक लौट आया और इस तरह व्यूह के बीच दुबककर बैठा है। आखिर इसका क्या कारण हो सकता है?”

करटक ने खीजकर कहा‘अरे होगा कुछवह जाने और उसके मंत्री जानें! हमें इस बखेड़े में पड़ने से क्या लाभ! बिना किसी मतलब के कोई काम नहीं करना चाहिए। ऐसे ही बेकार का काम करने के कारण बेचारा बंदर जान से हाथ धो बैठा था।’’ यह बंदरवाली कथा कैसी है? दमनक ने पूछा करटक सुनाने लगा

Panchatantra Stories No. 2:  कील उखाड़ने वाला बंदर

 

एक धनवान् वणिकपुत्र बड़ा धार्मिक स्वभाव का था। उसने अपने नगर के निकट ही एक उपवन में वृक्षों के बीच मंदिर बनवाने की सोची। बस, सोचने की देर थी, काम शुरु हो गया। मंदिर की नींव पड़ गई। स्तंभ बनने लगे। मंदिर में लगाने के लिए पास ही लकड़ी की चिराई होने लगी। दोपहर में सभी शिल्पी कारीगर तथा बढ़ईमजदूर भोजन करने के लिए नगर की ओर चले जाते थे।

एक दोपहरी में बंदरों का झुंड भटकताभटकता उस ओर आ निकला वहाँ सुनसान देखकर बंदर मौज में आकर खेलनेकूदने लगेएक नटखट बंदर पास ही पड़े लकड़ी के मोटे से कुंदे पर चढ़ गया। वह अर्जुनवृक्ष का भारी-भरकम तना था। बढ़ई पल्ले बनाने के लिए उसकी चिराई कर रहे थे। कुंदा आधी दूर तक चीर दिया गया था। दोनों खंडों को अलग रखने के लिए बढ़ई ने बीचोबीच खैर की लकड़ी की एक मोटी-सी कील बनाकर फंसा रखी थी।

उसपर निगाह पड़ते ही नटखट बंदर जाकर चिरे हुए खंडों के बीचो बीच बैठ गया। कुछ देर इधर उधर कूदता रहाफिर कील को हिलाने लगा। थोड़ी देर बाद उसने अचानक कील उखाड़ ली। कील हटते ही कुंदे के दोनों खंड जोर से जुड़ गएबंदर उनके बीच फंसा था। वह कुचला गया और देखते ही देखते तड़पकर मर गया।

कहानी सुनाकर करटक बोला, “इसीलिए कहता हूँ कि जिस काम से कोई अर्थ न सिद्ध होता होउसे नहीं करना चाहिए। व्यर्थ का काम करने  से जान भी जा सकती है। अरेअब भी पिंगलक जो शिकार करके लाता है, उससे हमें भरपेट भोजन तो मिल ही जाता है। तब बेकार ही झंझट में पड़ने से क्या फायदा!’

दमनक बोला‘तो तुम क्या केवल भोजन के लिए ही जीते हो? यह तो ठीक नहीं। अपना पेट कौन नहीं भर लेता! जीना तो उसका ही उचित है जिसके जीने से और भी अनेक लोगों का जीवन चलता हो। दूसरी बात यह कि शक्ति होते हुए भी जो उसका उपयोग नहीं करता और उसे यों ही नष्ट होने देता , उसे भी अंत में अपमानित होना पड़ता है!” करटक ने कहा“लेकिन हम दोनों तो ऐसे भी मंत्रीपद से च्युत हैं।

फिर राजा के बारे में यह सब जानने की चेष्टा करने से क्या लाभ? ऐसी हालत में तो राजा से कुछ कहना भी अपनी हंसी उड़वाना ही होगा। व्यक्ति को अपनी वाणी का उपयोग भी वहीं करना चाहिएजहाँ उसके प्रयोग से किसीका कुछ लाभ हो!”

भाईतुम ठीक नहीं समझतेराजा से दूर रहकर तो रही-सही इज्जत भी गंवा देंगे हम। जो राजा के समीप रहता है, उसीपर राजा की निगाह भी रहती है और राजा के पास होने से ही व्यक्ति असाधारण हो जाता है।” करटक ने पूछा, ‘‘तुम आखिर करना क्या चाहते हो? ” “हमारा स्वामी पिंगलक आज भयभीत है।’दमनक बोला, ‘उसके सारे सहचर भी डरेडरेसे हैं। मैं उनके भय का कारण जानना चाहता हूं।” “तुम्हें कैसे पता कि वे डरे हुए हैं?”

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“लो, यह भी कोई मुश्किल है! पिंगलक के हाव-भाव, चाल ढाल उसकी बातचीत, आँखों और चेहरे से ही स्पष्ट जान पड़ता है कि वह भयभीत है। में उसके पास जाकर उसके भय के कारण का पता करेंगा। फिर अपनी बुद्धि का प्रयोग करके उसका भय दूर कर टूगा। इस तरह उसे वश में करके में फिर से अपना मंत्रीपद प्राप्त करेगा। ’’

करटक ने फिर भी शंका जताई, ‘तुम इस विषय में तो कुछ जानते नहीं कि राजा की सेवा किस प्रकार करनी चाहिए। ऐसी स्थिति में उसे वश में कैसे कर लोगे?’

दमनक बोला, ‘राजसेवा के बारे में मैं नहीं जानतायह तुम कैसे कह सकते हो? बचपन में पिता के साथ रहकर मैंने सेवाधर्म तथा राजनीति के विषय में जो कुछ भी सुनासब अच्छी तरह सीख लिया है। इस पृथ्वी में  अपार स्वर्ण है, उस ता बस शूरवीर विद्वान् तथा राजा क चतुर सवक ही प्राप्त कर सकते हैं।”

करटक को फिर भी विश्वास नहीं आ रहा था। उसने कहा“मुझ यह बताओ कि तुम पिंगलक के पास जाकर कहोगे क्या?” “अभी से मैं क्या कहूंवार्तालाप के समय तो एक बात से दूसरी बात अपने आप निकलती जाती है। जैसा प्रसंग आएगा वैसी ही बात करेगा।

उचित अनुचित और समय का विचार करके ही जो कहना होगा, कहूंगा। पिता की गोद में ही मैंने यह नीति-वचन सुना है कि अप्रासंगिक बात कहनेवाले को अपमान सहना ही पड़ता है, चाहे वह देवताओं के गुरु बृहस्पति ही क्यों न हों।”

 

करटक ने कहा“तो फिर यह भी याद रखना कि शेरबाघ आदि हिंत्र जंतुओं तथा सर्प जैसे कुटिल जंतुओं से संपन्न पर्वत जिस प्रकार दुर्गम और विषम होते हैं उसी प्रकार राजा भी क्रूर तथा दुष्ट व्यक्तियों की संगति के कारण बड़े कठोर होते हैं। जल्दी प्रसन्न नहीं होते और यदि कोई भूल से भी राजा की इच्छा के विरुद्ध कुछ कर दे तो साँप की तरह डसकर उसे नष्ट करते उन्हें देर नहीं लगती।”

दमनक बोला‘आप ठीक कहते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति को स्वामी की इच्छा के अनुकूल कार्य करके उसे प्रसन्न करना चाहिए। इसी मंत्र से उसे वश में किया जा सकता है।”
करटक ने समझ लिया कि दमनक ने मन-ही-मन पिंगलक से मिलने का दृढ़ निश्चय कर लिया है। वह बोला, ‘ऐसा विचार है तो अवश्य जाओ।

बसमेरी एक बात रखना कि राजा के पास पहुँचकर हर समय सावधान रहना। तुम्हारे साथ ही मेरा भविष्य भी जुड़ा है। तुम्हारा पथ मंगलमयकरटक की अनुमति पाकर दमनक उसे प्रणाम करके पिंगलक से मिलने के लिए चल पड़ा।

सुरक्षा के लिए व्यूह के बीचोबीच बैठे पिंगलक ने दूर से ही दमनक को अपनी ओर आते देख लिया। उसने व्यूह के द्वार पर नियुक्त प्रहरी से कहामेरे पूर्व महामंत्री का पुत्र दमनक आ रहा है। उसे निर्भय प्रवेश करने दो और उचित आसन पर बैठाने का प्रबंध करो’

साथ ही उसका संकेत पाकर वह निकट ही दूसरे मंडल में बैठ गया। सिंहराज पिंगलक ने अपना भारी पंजा उठाकर स्नेह दिखाते हुए दमनक के कंधे पर रखा और आदर के साथ पूछा, ‘कहोदमनक, कुशल से तो रहे? आज बहुत दिनों के बाद दिखाई पड़ेकिधर से आ रहे हो?” दमनक बोला, ‘महाराज के चरणों में हमारा क्या प्रयोजन हो सकता है! किंतु समय के अनुसार राजाओं को भी उत्तममध्यम तथा अधम हर कोटि के व्यक्ति से काम पड़ सकता है।

ऐसे भी हम लोग महाराज के सदा से ही सेवक रहते आए हैं। दुर्भाग्य से हमें हमारा पद और अधिकार नहीं मिल पाया है तो भी हम आपकी सेवा छोड़कर कहाँ जा सकते हैं। हम लाख छोटे और असमर्थ सहीकिंतु कोई ऐसा भी अवसर आ सकता है, जब महाराज हमारी ही सेवा लेने का विचार करें।”

पिंगलक उस समय उद्विग्न था। बोला, ‘तुम छोटेबड़े या समर्थ- असमर्थ की बात छोड़ो, दमनक। तुम हमारे मंत्री के पुत्र हो, अतः तुम जो भी कहना चाहते हो, निर्भय होकर कहो।’’

अभयदान पाकर भी चालाक दमनक ने राजा के भय के विषय में सबके सामने बात करना ठीक नहीं समझा। उसने अपनी बात कहने के लिए एकांत का अनुरोध किया।
पिंगलक ने अपने अनुचरों की ओर देखा। राजा की इच्छा समझकर आसपास के जीवजंतु हटकर दूर जा बैठे।

एकांत होने पर दमनक ने बड़ी चतुराई से पिंगलक की दुखती रग ही छेड़ दी। बोला“स्वामी, आप तो यमुना-तट पर पानी पीने जा रहे , फिर सहसा प्यासे ही लौटकर इस मंडल के बीच इस तरह चिंता से व्यग्र होकर क्यों बैठे हैं: ” दमनक की बात सुनकर सिंह पहले तो सकुचा फिर दमनक की गया।

चतुराई पर भरोसा करके उसने अपना भेद खोल देना उचित समझा। पलभर सोचकर बोला, ‘दमनक, यह जो रहरहकर गर्जना-सी होती है, इसे तुम भी सुन रहे हो न?”

“सुन रहा हूं, महाराज” बसइसीके कारण मैं क्षुब्ध हैं। तट पर यही गर्जना बारबार हो रही थी। लगता , इस वन में कोई विकट जंतु आ गया है। जिसकी गर्जना ही इतनी भयंकर , वह स्वयं कैसा होगा! इसके कारण मैं तो यह जंगल छोड़कर कहीं और चले जाने का विचार कर रहा हूं।” दमनक ने कहा”लेकिन मात्र शब्द सुनकर भय के मारे अपना राज्य छोड़ना तो उचित नहीं हैमहाराज! शब्द अथवा ध्वनि का क्या है।

कितने ही बाजों की ध्वनि भी गर्जना की-सी बड़ी गंभीर होती है और अपने पुरखों का स्थान छोड़ने से पहले पता तो करना ही चाहिए कि ध्वनि का कारण क्या है। यह तो गोमायु गीदड़ की तरह डरने की बात हुईजिसे बाद में पता चला कि ढोल में तो पोल-हीपोल है।’’

पिंगलक ने पूछा“गोमायु गीदड़ के साथ क्या घटना हुई थी? दमनक गोमायु की कहानी सुनाने लगा

Panchatantra Stories No. 3:  ढोल में पोल

भूख से परेशान होकर गोमायु नामक एक गीदड़ इधरउधर भटक रहा था। घूमतेघूमते वह ऐसी जगह पर जा पहुंचा, जहां दो सेनाओं का युद्ध हो चुका था। युद्धभूमि में निकट ही एक वृक्ष के नीचे भारी-सा नगाड़ा पड़ा था। हवा से हिलनेवाली वृक्ष की टहनियाँ नगाड़े से टकरातीं तो ढम ढम की आवाज होती थी।

गोमायु नगाड़े से उठती तेज आवाजें सुनकर बहुत डर गया। उसे लगा कि अंतकाल ही निकट आ गया है! भलाई इसीमें है कि मैं यह जंगल छोड़कर कहीं दूसरी जगह चला जाऊँ। फिर विचार आया कि अपने पूर्वजों का निवास यह जंगल छोड़कर जाना भी ठीक नहीं है।

जो व्यक्ति भय और प्रसन्नता के जोश में बिना सोचेसमझे जल्दबाजी में कोई काम करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। गोमायु ने निश्चय किया कि पहले यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि यह भयंकर आवाज आ कहाँ से रही है। वह धीरे-धीरे टोह लेता हुआ वहीं जा पहुंचाजहाँ नगाड़ा पड़ा था। गोमायु ने इससे पहले कभी नगाड़ा नहीं देखा था।

सामने इतना भारीभरकम जीव देखकर उसके मुंह में पानी आ गया। उसने सोचा, बहुत दिनों के बाद भरपेट भोजन करने की कोई इतनी बड़ी चीज मिली है। इसमें अवश्य काफी मात्रा में मांस खून और चरबी भरी होगी। यह सोचकर उसने नगाड़े पर मढ़ा हुआ कड़ा चमड़ा किसी तरह एक जगहसे काट डाला और बड़ी आशा के साथ छेद में से भीतर घुस गया। लेकिन भीतर उसे क्या मिलना था! सूखा चमड़ा काटने के कारण उसके दांत भी टूट गए थे। काठ से तो पेट भरता नहीं।

उसकी समझ में यह भी आया कि केवल आवाज सुनकर ही नहीं डर जाना चाहिए। अगर डर कर वह भागता तो पुरखों का घर भी हाथ से चला गया होता।

यह कहानी सुनने के बाद पिंगलक ने कहा”भाईमैं क्या करें? जब मेरा पूरा परिवार और सभी साथी भयभीत होकर भागने पर तुले हैं तो अकेला मैं ही कैसे धैर्य से रह सकता हूं?”
दमनक ने कहा, “इसमें आपके सेवकों का क्या दोष है! जैसा मालिक करेगा वैसा ही सेवक करेंगे।

तो भी आप तब तक यहाँ ठहरिए जब तक मैं उस आवाज के विषय में ठीक-ठीक पता न लगा हूं।” पिंगलक ने आश्चर्य से पूछा“क्या तुम वास्तव में वहाँ जाने की सोच रहे हो?”

दमनक ने जवाब दिया, ‘स्वामी की आज्ञा से तो योग्य सेवक कोई भी काम कर सकता है, चाहे उसे साँप के मुह में हाथ डालना पड़े या समुद्र ही पार करना पड़े। राजाओं को चाहिए कि ऐसे ही सेवक को सदा अपने निकट रखें।’’

पिंगलक ने कहा, “अगर ऐसी बात है तो जाओ, भद्र, तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो।’’ दमनक उसको प्रणाम करके आवाज की दिशा में चल पड़ा। पिंगलक को पछतावा होने लगा कि मैंने बेकार ही दमनक की बातों में आकर उसे अपने मन का भेद बता दिया। उसका क्या विश्वास पहले मंत्री का पद छिन जाने के कारण वह खिन्न तो है ही।

बदला लेने के लिए यह भी तो हो सकता है कि दमनक लालच में आकर शत्रु से मिल जाए और बाद में घात लगाकर मुझको ही मरवा दे। खैरअब तो एक ही रास्ता है। कि कहीं दूसरी जगह छिपकर दमनक के आने की राह देखी जाए। उधर दमनक खोजते-खोजते संजीवक के पास पहुचा तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा।

जिसके डर से सिंह की जान निकल रही थी, वह तो यह मामूली-सा बैल है। दमनक इस स्थिति से लाभ उठाने की सोचने लगाअब तो इस बैल से संधि या विग्रहकुछ भी करके पिंगलक को सहज ही अपने वश में किया जा सकता है। यही सोचता-सोचता वह लौटकर पिंगलक के पास पहुँचा।

पिंगलक उसे आते देख सभलकर बैठ गया। दमनक ने पिंगलक को प्रणाम किया।

पिंगलक ने पूछा, ‘तुमने उस भयंकर प्राणी को देखा क्या?”

दमनक ने कहा‘आपकी कृपा से मैं उसे देख आया हूं।” पिंगलक ने अपनी सेंप मिटाने के लिए कहा“तो फिर उस बलवान जंतु ने तुम्हें छोड़ कैसे दिया? शायद उसने इसीलिए तुमको छोड़ दिया होगा कि बलशाली लोग अपने समान बलवाले से ही वैर या मित्रता करते हैं। कहाँ वह महाबली और कहाँ तुम जैसा तुच्छविनम्र प्राणी!” दमनक ने मन का क्षोभ छिपाकर कहा‘ऐसा ही सही। वह सचमुच महान् है।

बलशाली है और मैं एकदम , दीन प्राणी हूँ। तो भी यदि आप कहें तो मैं उसे भी लाकर आपकी सेवा में लगा सकता हूं।” पिंगलक ने चकित होकर कहा‘सच कहते हो? ऐसा संभव है?” दमनक बोला‘‘बद्धि के लिए कुछ भी असंभव नहीं। ”

पिंगलक को आश्चर्य हुआ–सच? तब पिंगलक ने कहा, ‘‘अगर ऐसी बात है तो मैं आज से ही तुमको अपना मंत्री नियुक्त करता हूं। तुम्हें प्रजा पर दया और दंड के अधिकार देता हूं।

पद और अधिकार पाकर प्रसन्न दमनक बड़ी शान से चलता हुआ संजीवक के पास पहुंचा और गुर्राकर बोला, अरे दुष्ट बैलइधर आ। मेरे स्वामी पिंगलक तुझे बुला रहे हैं। इस प्रकार निश्शंक होकर डकराने गरजने की तुझे हिम्मत कैसे हुई?”

संजीवक ने पूछा, यह पिंगलक कौन है, भाई?” दमनक ने जवाब दिया, “अरे! तू क्या वनराज सिंह पिंगलक को नहीं जानता? अभी तुझे पता चल जाएगा। वह देखबरगद के पेड़ के नीचे अपने परिवार के साथ जो सिंह बैठा है, वही हमारे स्वामी पिंगलक हैं।’

यह सुनकर सजीवक को कपकपी छूट गई। वह कातर स्वर में बोला “भाईतुम तो चतुर सुजान लगते हो। अपने स्वामी से मुझे माफ करवा दो तो मैं अभी तुम्हारे साथ चला चलता हूं।”

दमनक ने कहा, “बात तो ठीक है, तुम्हारी! अच्छा, ठहरो। मैं अभी स्वामी से पूछकर आता हूं।” वह पिंगलक के पास जाकर बोला, ‘स्वामीवह कोई मामूली जंतु नहीं है। वह तो भगवान् शंकर का वाहन वृषभ है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि भगवान् शकर के आदेश से वह नित्य यहा आकर यमुना-तट पर हरी हरी घास चरता है और इस वन में घूमा करता है।”

पिंगलक भयभीत होकर बोलायह सच ही होगा, क्योंकि भगवान् की कृपा के बिना घास चरनेवाला यह प्राणी सर्षों से भरे वन में इस तरह से डकराता हुआ, निर्भय विचरण नहीं कर सकता। खेर, यह बता कि अब वह कहता क्या है?’

दमनक बोला, ‘मैंने उससे कह दिया है कि यह वन भगवती दुर्गा के वाहन मेरे स्वामी पिंगलक सिंह के अधिकार में है, इसलिए उनके पास चलकर भाईचारे के साथ रहते हुए इस वन में सुख से चरोमेरी बात सुनकर उसने आपसे मित्रता की याचना की है।”

पिंगलक बहुत खुश हुआ। वह प्रशंसा करते हुए बोला‘मंत्रिवरतुम धन्य हो! मैंने उसको अभयदान दिया, लेकिन तुम मुझे भी उससे अभयदान दिलाकर मेरे पास ले आओ। ”

दमनक अपनी बुद्धि और भाग्य पर इतराता हुआ फिर संजीवक के पास पहुँचा। बोला,“मित्र! मेरे स्वामी ने तुमको अभयदान दे दिया है। अब तुम निडर होकर मेरे साथ चलो। किंतु याद रहे कि राजा का साथ और कृपा पाने के बाद भी तुम हमसे उचित व्यवहार ही करना। कहीं घमंड में आकर मनमाना आचरण न कर बैठना। मैं समयानुकूल ही शासन करूंगा। मंत्री के पद पर तुम्हारे रहने से हम दोनों को राज्य-लक्ष्मी का सुख मिलेगा।

जो व्यक्ति अहंकार के कारण उत्तममध्यम और अधम व्यक्तियों का उचित सम्मान नहीं करते, वे राजा का सम्मान पाने के बाद भी दंतिल की तरह दु:ख भोगते हैं।’’

संजीवक ने पूछा, यह दंतिल कौन था?” दमनक कथा सुनाने लगा-

 

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