20 + Moral Stories in Hindi for Class 3 With Pictures 2018

दोस्तों हमारी साइट का नाम Jobloo.in आप सभी को अजीब लगता होगा लेकिन इसका main use सिंपल और सरल रखना है। आज हम आपके लिए लाये है moral stories हिंदी भाषा में। शिक्षाप्रद कहानियो का पूरा संग्रह आपके लिए लाये हैं। Moral Stories in Hindi जो ज्यादातर स्कूल के बच्चो से पूछी जाती है।

 

Moral Stories in Hindi for Class 3

 

पानी और प्यासे

एक आदमी थका माँदा था। बहुत खोज के बाद एक कुंआ दिखा। वह यह देखकर आश्वस्त हुआ कि कुएँ में
पानी है, रस्सी पड़ी है, डोल पड़ा है और एक आदमी भी आवाज दी, भैयाबहुत प्यासा हूँ जरा पानी पिला दो।
बैठे हुए आदमी ने कहा‘मैं अमीर जादा हूँ, मैं पानी नहीं निकाल सकता। ऊपर आओ, तुम भी पिओ, मुझे भी पिला
आगन्तुक ने कहा, ‘मैं भी नवाबजादा हूँ पानी नहीं निकाल सकता’ दोनों बैठ गये।

थोड़ी देर बाद तीसरा आदमी आयाचिल्लाया। पानी पानी।’ दोनों ने कहा, ‘ऊपर आओ, पानी तुम भी पी लो हमें
भी पिला दो।’ ऐसा क्यों? दोनों ने अपनी स्थिति बता दी। तीसरा भी प्यासा ही बैठ गया। बोला में शहजादा हूँ। घंटा बीता एक और आदमी आयाबोला भैया, पानी पिलाओ, सब बोले, पानी हम नहीं निकाल सकते। तुम पी
लो, हमें भी पिला दो, पर यह क्यों?

 

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पहला-मैं अमीरजादा दूसरा-मैं नवाबजादा । तीसरा मैं शहजादा हूं। चौथे आदमी ने पानी निकालापीया। बाकी
बचा पानी वापस कुएँ में डाल दिया। बोलामैं हरामजादा हूँ, मैं पीना जानता हूँ, पिलाना नहीं जानता।

 

लड़के का पश्चाताप

एक लड़का लोगों को अक्सर अपशब्द कहता, चिढ़ाता व तंग करता था। उसे यह सब करके बड़ा मजा आता था। इस आदत के चलते कई बार उसे मार भी पड़ी थी। कुछ लोगों ने उसे समझाया भी, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ।
एक बार एक साधु पीपल के पेड़ के नीचे समाधि लगाए बैठा थातभी लड़का वहां आया और उसे गाली देकर 12
। वह भाग गया। कुछ दूर जाकर उसने देखा कि साधु पर तो कोई असर ही नहीं हुआ। न तो वह चिढ़ा और न
ही उसे मारने दौड़ा। अत: वह पुन: साधु के पास गया और जोर-जोर से उसे गालियां देने लगा।


साधु ने उस लड़के की तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। वह अपने में ही मगन रहा। लड़का आश्चर्यचकित था कि साधु कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं व्यक्त कर रहा है।

वहीं खड़ा एक आदमी भी यह सब देख रहा था। जब उससे नहीं गया तो रहा
वह उस साधु से बोला, “बाबा! वह लड़का आपको गालियां दे रहा है और आप उसे कुछ नहीं कह रहे आखिर क्यों?”

साधु ने कहा, “ भले ही वह लड़का मुझे गालियां दे रहा है, पर मैं गालियां ले कहा रहा हूं और गालियां ले ही नहीं रहा हूं तो वह गालियां उसी के पास जब म क
रह जाती हैं। अर्थात् वह स्वयं को ही गालियां दे रहा है। अपशब्द निकालकर अपना
ही मुख अपवित्र कर रहा है।”

साधु की यह बात गालिया देने वाला लड़का भी सुन रहा था। वह सोचने लगा, दूसरे लोग मुझे इसलिए मारने दौड़ते थे, क्योंकि वे गालियां लेते थे, पर साधु बाबा ने तो गालियां ली ही नहीं और वे गालियां मेरे पास हा रह गइ। ओहकितनी गंदी गालियां दीं मैंने अपने आपको।’

लड़के का मन घृणा से भर आया। वह साधु के पास गया और बोला “बाबा, मुझे माफ कर दो। अब मैं किसी को गाली नहीं ढूंगा।” राम नावारे |

साधु ने कहा, “बेटा, तुम्हें अपने किए पर पश्चाताप हो रहा है, इसलिए तुम्हारे अपराध स्वत: ही माफ हो गए हैं।”
लड़के ने साधु का आशीर्वाद लिया और उसके बाद उसने किसी को भी गाली नहीं दी।

कथा-सार

जो चीज हमारी नहीं, दूसरा कोई देना चाहे ता भी हम न ल..ता वह किसकी हुई? उसी की न, जिसके पास ह। साधु ने इस बात का अहसास जब उस लड़के को कराया तो उसे पश्चाताप हुआ। अपशब्द कहने की उसकी
आदत मारने-पीटने या गुस्सा करने से तो नहीं छूटी, लेकिन प्रेमभरे दो बोल अपना काम कर गए।

 

मजबूरी का झूठ

महाकवि अल्लामा फामज बनारसी दानवीर के नाम से विख्यात थे। वह प्रत्येक जुमेरात (गुरुवार) को दिल खोलकर और मुट्ठी बंद कर दान करते थे। एक दिन सदा की भाँति एक जुमेरात को उनके पास एक सायल (फकीर) आया और उसे जो लेना था ले गया ।

दूसरे दिन फिर वह व्यक्ति महाकवि के पास आया और आकर बोला ‘हुजूर कल मैं किसी वजह से नहीं आ पाया था, अत: आज मैं हुजूर की खिदमत में आया हूं।

‘ तीसरे दिन पुन: वह व्यक्ति आया और उसने फिर कहा कि इस जुमेरात को मैं न आ पाया था, इसलिए आज आया हैं। इत्तफाक से वह तीनों दिन उनके एक शिष्य के सामने आया।

जब सायल चला गया । तो शिष्य ने महाकवि से कहा, हुजूर वह व्यक्ति सरासर झूठ बोल रहा था। यह तो मेरे सामने तीनों दिन आयाफिर भी आपने बजाय इसको डांटने के तीनों दिन इसकी मदद की।

इस पर महाकवि मुस्कुराये और बोले’बेटा इतना सदा याद रखना कि जब इंसान को कोई मजबूरी बहुत ज्यादा सताती है तभी वह इतना झूठ बोलता है।’

 

 

अनित्य शरीर को देखा

राजगृह में सिरिया नाम की एक परम सुन्दरी गणिका थी। उसने तथागत के उपदेश को सुनकर स्त्रोतापति फल को प्राप्त कर लिया था तथा प्रति दिन अपने घर में भिक्षुकों को बड़े सम्मान के साथ दान देती थी। वह एक दिन भिक्षुकों को दान देकर तत्काल हुई बीमारी से मर गई।

उसका मृत शरीर श्मशान में राजा द्वारा सुरक्षित रखवाया गया। तीसरे दिन तथागत भिक्षु संघ के साथ वहा गएऔर उस मृत शरीर को भिक्षुओं को दिखलाकर कहाभिक्षुओं इस प्रकार का रूप भी नष्ट हो गया।

 

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देखो भिक्षुओंपीड़ित शरीर को!’ तथागत ने उपदेश देते हुए आगे कहा, ‘इस चित्रित शरीर को देखो, जो वर्षों से युक्त फूलापीड़ित तथा अनेक संकल्पों से युक्त है, जिसकी स्थिति अनित्य है।’

 

कुपुत्र

प्रसिद्ध विद्वान बालभट्ट से किसी ने पूछा कि आजकल आपका पुत्र क्या करता है? बालभट्ट अपने कुपुत्र के आचरणों से दुखी थे बोले पक्षिमत्स्यगान् हन्ति। परिपन्य च तिष्ठाति। बातेन जीवति। अधुना। न वश: पूर्व वत्सत्र। अर्थात्-पक्षी, मत्स्य और मृगों को मारता हैकुमार्ग पर ।

चलता है, लुच्चे लुगाड़ों के साथ रहता है, अब वह पहले की तरह हमारे वश में नहीं। इस श्लोक के छ: टुकड़े हैं। जैसा कि चिन्हों  में दिखाया गया है और वे छहों पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी’ के सूत्र हैं। सूत्रों को जोड़कर ही श्लोक बना दिया गया है।

 

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मृत्यु का डर

एक सन्त पानी के जहाज से यात्रा कर रहे थे। यात्रा लम्बी थी, अत: यात्री उनके सत्संग का लाभ उठाते। वे सत्संग में एक बात अवश्य याद दिलाते कि संसार नश्वर है, सदैव मृत्यु को याद रखों। सन्त का सूत्र था, ‘मृत्यु का सदैव ध्यान।’ किन्तु मुसाफिरों को संत की बात जची नहीं। एक दिन समुद्र में भयंकर तूफान उठा। समूचे जहाज में हाय-तौबा मच गई। त्राहि-त्राहि में कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था। सब प्राण-रक्षा के लिए चिन्तित थे, किन्तु असहाय क्या करत? सभी प्रार्थना में लीन हो गए सबने देखा कि सन्त सहज, अनुद्विग्न बैठे हैं। तूफान शान्त हुआ। एक यात्री ने संत से जाकर पूछा, ‘आपको मृत्यु का डर नहीं लगा?’ सन्त ने कहा‘मृत्यु का फन्दा समुद्र में ही नहीं, पृथ्वी पर भी सदैव इसी प्रकार झूलता रहता है, फिर डरना किस बात का। अज्ञानी अविवेकी ही डरते हैं मृत्यु से। फिर भी डर कर व बचत नहीं।

 

 

रमेश जी और सच

प्रात:कालीन भ्रमण के दौरान रमेश जी का सामना एक फटेहाल युवक से हो गया। युवक की आँखें अंगारों की तरह दहक रही थी। उन्होंने पूछा, ‘कौन हो भाई?’ ‘मै सत्य हूँ,’ उसने बताया। पर । रमेश जी को सत्य की दुर्दशा देखकर उस दया आ गई। वह उसे अपने साथ घर ले आएसत्य उनके साथ रहने लगा।

सत्य ने उन्हें बताया कि उनकी पत्नी का प्यार एक दिखावा है। एक साधारण लेक्चरर के पल्ले बंध जाने से वह मन ही मन दुखी रहती है। सच के साथ के प्रभाव से वह जान गये कि उनके छात्र स्वार्थवश ही उनका आदर करते हैं।

पीट-पीछे उनकी बुराई करते हैं, और कई कड़वे सत्य उन्हें ज्ञान होने लगे अब रमेश जी के सामने दो ही रास्ते थे। या तो सच को धक्के मारकर अपने घर से बाहर निकाल दें या वह भी फटेहाल होकर सच के साथ सड़कों पर भटकने लगे कहानियों का संसार है

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