Hindi Story For Kids With Moral – बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियाँ 20+

दोस्तों आज में आपके लिए लाया हु हिंदी कहानियाँ सिर्फ बच्चो को लिए। इन कहानियों में आपको नैतिक ज्ञान भी मिलेगा जो आपके छोटे बच्चो के लिए बहुत जरुरी है। आज कल की लाइफ में हम हिंदी कहानियाँ को भूलते जा रहे इसलिए में आप सबके लिए लाया हूँ Hindi story for kids with moral value 

 

Hindi Story For Kids No. 1   ढोल वाले की मूर्खता

 

एक बार ढालवादक रमैया और उसका पुत्र कालू कांचिपुरी के एक विवाह समारोह में गए। समारोह समाप्त होने पर दोनों को खूब धन और आभूषण पुरस्कार स्वरूप मिले। पुरस्कार पाकर वे खुशी-खुशी अपने घर की ओर लौट चले।

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पितापुत्र दोनों जंगल से गुजर रहे थे कि पुत्र बोलाबापू, मजा आ गया। आज तो उम्मीद से ज्यादा कमाई हो गई”
“तुमने बहुत अच्छा ढोल बजाया था बेटा, इसीलिए हम पर धन की वर्षा हुई है।” रमैया खुश होकर बोला।
जब वे बीच जंगल में पहुंचे तब रमैया के बट ने ढोल बजाना शुरू कर दिया।
“अरे! यह क्या कर रहे हो बेटा?” रमैया ने टोका।

 

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आज म बहुत खुश हूं बापू, मेरा मन बार-बार ढोल बजाने को कर रहा है।” “लेकिन इतनी जोर से न बजाओ। इस जंगल में लुटेरे बहुत हैं।

आवाज सुनकर तुरंत इधर आ जाएंगे।” रमैया ने अपने पुत्र को समझाते हुए कहा। “आप चिंता न करें बाप, मैं ढोल की प्रचंड ध्वनि से उन्हें भगा ऊंगा।”

उधर छिपे जंगल में हुए कुछ लुटेरों ने ढोल की सुनी तो साचा, आवाज उन्होंने लगता है कोई राजा जंगल में शिकार खेलने आया है।

कुछ देर बाद रमैया बोला, “बेटा, अब बस भी करोयह धुन केवल एक ही बार बजाई जाती है।”
किंतु कानू नहीं माना और ढोल बजाता ही रहा।

“बंद करो ढोल बजाना! तुम मानते क्यों नहीं? यहि लुटेरों को खबर लग गई तो..?” झुंझलाते हुए रमैया ने कानू से कहा बाप, आप बेकार ही चिंता करते हैं। मैं लुटेरों को इतना भयभीत कर ढूंगा कि वे इधर आने की सोच भी नहीं सकेंगे।” ऐसा कहकर वह फिर ढोल बजाने लगा।

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उधर लुटेरों के सरदार ने अपने साथियों से कहा”अरेफिर वही धुन? इसका मतलब किसी भी हालत में यह राजा का दल नहीं हो सकता” मुझे तो लगता है कि किसी नौसिखिए ने खूब पैसा कमाया है और इसी खुशी में वह फूला नहीं समा रहा।” एक लुटेरे ने अपनी राय प्रकट की।

“ठीक है। चलो, हम उस पर धावा बोल देते हैं।” लुटेरों के सरदार ने आदेश देते हुए कहा।

कुछ ही देर बाद लुटेरे ढोलवादक और उसके बेटे के पास जा पहुंचे। उन दोनों के हाथों में मोटी-मोटी गठरियां देखकर लुटेरों का सरदार बोला, “जरूर इन गठरियों में ढेर सारा माल होगा। छीन लो इनसे ये गठरियां।” लुटेरों ने उन दोनों पितापुत्र से गठरियां छीन लीं और उन्हें मार-पीटकर वहां से भगा दिया।

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“ मैंने तुम्हें पहले ही ढोल बजाने को मना किया था, पर तुम माने ही नहीं। इस तरह तुमने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।” रमैया ने अपना सिर धुनते हुए उसस कहा।

मुझे शिक्षा मिल गई है बापू, कि बड़ों की बात न मानने का अंजाम हमेशा बुरा ही होता है।” फिर दोनों उदास मन से अपने घर की ओर चल पड़े।

ढोल वाले की मूर्खता का  कथा-सार / नैतिक ज्ञान 

बड़े-बुजुर्ग जो कुछ भी कहते हैं उसमें भलाई छिपी होती है। उनका कहा प्रायः अनुभवसिद्ध होता है। का का पिता जानता था जंगल में ढोल बजाने । का अंजाम, इसीलिए उसने कानू को ढोल बजाने से मना किया था। जो बड़ों
की बात नहीं मानते वे बाद में पछताते हैं।

 

Hindi Story For Kids No. 2  लालची कौवा

 

कंचनपुर के एक धनी व्यापारी के रसोईघर में एक कबूतर ने घोंसला बनाया हुआ था। एक दिन एक लालची कौवा उधर आ निकला। वहां मछली को देखकर उसके मुंह में पानी भर आया। उसने सोचा कि मुझे इस रसोईघर में घुसना चाहिए, पर कैसे?


तभी उसकी निगाह कबूतर पर जा पड़ी। उसने सोचा कि यदि मैं कबूतर से दोस्ती कर यूं तो शायद बात बन जाए।
कबूतर जब दाना चुगने बाहर निकला तो कौवा उसके साथ लग गया।

थोड़ी ही देर बाद कबूतर ने जब पीछे मुड़कर देखा तो अपने पीछे कौवे को पाया। उसने कौवे से पूछा, “तुम मेरे पीछे क्यों लगे हो?” तुम मुझे अच्छे लगते हो। इसलिए तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं।” कौवे ने मीठे स्वर में कहा।

“बात तो तुम ठीक कह रहे हो, मगर हमारा-तुम्हाराभोजन अलग-अलग है। मैं बीज खाता हूं और तुम कीड़े।” कबूतर ने कहा। “कोई बात नहीं, हम इकट्ठे रह लेंगे” कौवे ने चापलूसी करते हुए कहा शाम को दोनों पेट भरकर वापस आ गए।

व्यापारी ने कबूतर के साथ कौवे को भी देखा तो सोचा कि शायद यह उसका मित्र होगा। एक दिन व्यापारी ने रसोइए से कहा, “कुछ मेहमान आ र आज रहे हैं। उनके लिए स्वादिष्ट मछलियां बनाना।” कौवा यह सब सुन रहा था।

रसोइए ने स्वादिष्ट मछलियां बनाईं। तभी कबूतर कौवे से बोला”चलो, हम भोजन करने बाहर चलते हैं।” मक्कार कौवे ने कहा, “आज मेरा पेट दर्द कर रहा है, तुम अकेले ही चले जाओ।”

कबूतर भोजन की तलाश में बाहर निकल गया। उधर कौवा रसोइए के बाहर निकलने का इंतजार कर रहा था। जैसे ही रसोइया बाहर निकलाकौवा तुरंत थाली की ओर झपटा और मछली का टुकड़ा मुंह में भरकर घोंसले में जा
बैठा और खाने लगा।

रसोइए को जब रसोई में खटपट’ की आवाज सुनाई वह वापस रसोईघर दा तब की ओर लपका।

उसने देखा कि कौवा घोंसले में बैठा मछली का टुकड़ा मजे से खा रहा है। यह देखकर रसोइए को बहुत गुस्सा आया और उसने कौवे की गरदन पकड़कर मरोड़ दी। शाम को जब कबूतर दाना चुगकर आया तब उसने कौवे का हश्र देखा जब उसने घोंसले में मछली का अधखाया टुकड़ा पड़ा देखा तो उसकी समझ में आ गया कि उसने जरूर लालच किया होगा तभी उसकी यह हालत हुई है।

 लालची कौवा का  कथा-सार / नैतिक ज्ञान 

 

दुष्ट प्रकृति के प्राणी को उसकी दुष्टता का फल अवश्य मिलता है। कबूतर से मित्रता की आड़ में कौवा अपना स्वार्थ सिद्ध करना । वह नहीं चाहता था जानता था कि लालच के वशीभूत होकर प्राणों को संकट में डालने वाले से बड़ा मूर्ख और कोई नहीं होता। वैसे भी पक्षियों में कौवा बड़ा चालाक होता है।

वह अपना हित साधन करने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकता है। कौवे को नफे-नुकसान से कोई मतलब नहीं होता। वह तो किसी भी तरह अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है

 

Hindi Story For Kids No. 3: राजा का कर्तव्य

 

राजा प्रतापराय अपनी प्रजा के प्रति बहुत ही कर्तव्यनिष्ठ था। एक बार प्रजा ने अपने और कल्याण की वृद्धि के लिए यज्ञ करने का विचार किया। राजा क यश
राजा ने यज्ञ करने की अनुमति दे दी, साथ ही उस यज्ञ के लिए हरसंभव मदद की भी पेशकश की, किंतु प्रजा प्रतिनिधियों ने यह कहकर मानने से इनकार कर दिया कि यह यज्ञ राजा के कल्याण हेतु प्रजा की तरफ से होगा।

अत: उस यज्ञ का सारा खर्च भी प्रजा ही मिलकर वहन करेगी, साथ ही प्रतिनिधियों ने राजा से यज्ञ में उपस्थित होने को कहा। राजा ने उनकी बात को स्वीकार कर लिया।

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नियत समय पर यज्ञ शुरू हो गया। यज्ञ 21 दिन का था। प्रतिदिन राजा स्वयं भी यज्ञ में उपस्थित होता था और अपने हाथों से आहुतियां देता था। यज्ञ को बीस
दिन हो चुके थे। प्रजा को बस इंतजार था तो इक्कीसवें दिन का। उस दिन राजा को इक्कीस आहुतियां देनी थीं। इसक बाद राजा प्रतापराय का यश पूरी दुनिया में फैल जाना था।

इक्कीसवें दिन प्रात: यज्ञ की सारी तैयारियां हो गई। राजा का इंतजार हो रहा था। जब काफी देर तक राजा वहां नहीं पहुंचा तो कुछ लोग महल में चले गए। महल में पता चला कि राजा वहां नहीं है। वह सुबह-सवेरे ही सैनिकों के साथ कहीं चला गया था। प्रजा को जब यह खबर मिली तो वह उदास हो गई। यज्ञ ” भी पूण नहीं हो पाया।

चार दिन बाद जब राजा लौटा तो लोग उससे मिलने के लिए महल में गए। राजा ने उनसे कहा”मुझे अफसोस है कि आप लोगों का यज्ञ पूरा नहीं हो पाया, किंतु मेरा जाना जरूरी था। पड़ोसी राज्य ने हम पर आक्रमण कर दिया था और वे लोग नगर की सीमा तक आ गए थे। हम लोगों ने दुश्मनों को मार भगाया।”

प्रजा खुश हुई और राजा को बधाई देते हुए कहा”महाराज! यदि एक दिन और रुक जाते तो आप यशस्वी राजा बन जाते। ” राजा ने कहा, “यदि मैं एक दिन और रुक जाता तो हम लोग पड़ोसी राज्य के गुलाम हो जात। आज भले ही मैं यशस्वी नहीं हूं, लेकिन स्वतंत्र तो हूं।

मैं राजा हूं और प्रजाजनों के प्रति मेरा यह कर्तव्य है कि उन्हें स्वतंत्र वातावरण ” म दू।

राजा का कर्तव्य कथा-सार / नैतिक ज्ञान

 

राजा का सर्वप्रथम धर्म है । प्रजा की रक्षा करना। इसी से उसके यश-कीर्ति का अनुमान लगता है। यज्ञ करने से राजा यशस्वी होता या नहीं, यह तो ऊपर वाला जाने, लेकिन
उस समय का यही तकाजा था कि सीमा पर पहुंचे शत्रु को मुंहतोड़ जवाब दिया जाता, जैसा उस समझदार राजा ने दिया भी।

 

 

Hindi Story For Kids No. 3: लोभी मछुआरा 

 

एक दिन जोगराम और उसका बेटा मछली पकड़ने के लिए नदी किनारे गए। एक रमणीय स्थान देखकर जोगराम ने पानी में कांटा डाल दिया। थोड़ी ही देर में एक मछली कांटे में फंस गई। जोगराम ने कांटा खींचना शुरू कियाकिंतु नाकामयाब रहा। उसने सोचा कि शायद आज कोई बड़ी मछली फंस गई है, अत उसने अपने लड़के से कहा”जाकर अपनी मां से कह दे कि वह पड़ोसियों से झगड़ना शुरू कर दे।”

“लेकिन क्यों पिताजी?” लड़के ने पूछा।

“सवाल मत कर, जो कहा है, वह कर” जोगराम बोला।

लड़का वहां से चला गया। घर आकर उसने अपनी मां से कहा, “पिताजी ने कहा है कि तुम पड़ोसियों से झगडा करा”

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तेरा बापू अपने आपको समझता क्या है। इतने अच्छे पड़ोसियों से कोई झगड़ा करता है क्या? अरेअच्छे पड़ोसी तो हीरे-जवाहरात से भी ज्यादा कीमती होते हैं।
‘बापू ने बहुत बड़ी मछली पकड़ी है।”

“ऐ! क्या कहा तूने, बहुत बड़ी मछली.?”
‘हा मा।”
तब तो मैं अभी झगड़ा करके आती हूं।”
‘ पर क्यों मां?”
तेरे बापू मछली लेकर आएंगे तो पड़ोसियों को भी हिस्सा देना पड़ेगा। जब पड़ोसियों से बोलचाल ही बंद हो जाएगी तो किसी को भी कुछ नहीं देना पड़ेगा” इतना कहकर उसने अपने चेहरे पर कालिख पोती तथा कान के पीछे कुछ पत्तियां खोसी और घर से बाहर निकल गई।

 

“हे ईश्वर, यह तुमने अपनी क्या हालत बना रखी है?” एक पड़ोसन ने कहा।

“कहीं तुम्हारा दिमाग तो नहीं घूम गया है?” दूसरी पड़ोसन बोली। ‘तू मुझे पागल कह रही है, तेरी इतनी हिम्मत।”

फिर देखते देखते उस औरत ने झगड़ना शुरू कर दिया। नौबत यहां तक आ गई कि कोतवाल को बीच-बचाव के लिए आना पड़ा।
वह उनको पकडकर हाकिम के पास ले गया। हाकिम ने ध्यान से दोनों के बयान सने और फैसला दिया, “सारे फसाद की जड़ जोगराम की पत्नी है। इस पर आठ सिक्कों का जुर्माना किया जाता है।”

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आठ सिक्के!”

आठ सिक्कों का जुर्माना अदा करके वह रुसी सूरत लिए घर की ओर चल दी। आठ सिक्कों से मैं बड़ीबड़ी चार मछलियां खरीद सकती थी। अब मेरा पति
जो बड़ी मछली लाने वाला है वह इस खर्च और झगड़े के काबिल हो तब तो बात बन सकती है। यही सोचती हुई वह घर की ओर चली जा रही थी। तभी उसे शोरगुल सुनाई दिया। लगता है बच्चे किसी का मजाक उड़ा रहे हैं। फिर वह उस ओर गई तो देखा कि वह उसका पति ही है। उसने सब बच्चों को डांटकर भगा दिया। “हुआ क्या है? तुम्हारे कपड़े कहां हैं, तुम्हारी आंख को क्या हुआ और वह मछली कहां है?”

“मेरा कांटा किसी बड़े पौधे की जड़ में अटक गया था और मैं समझा कोई बड़ी मछली फंसी है। जब मैं कांटा निकालने की कोशिश कर रहा था तब जड़
उखड़कर मेरी आंख में आ लगी और जब मैं किनारे आया तब देखा कि कोई मेरे कपड़े उठाकर भाग रहा है।” दर्द से कराहता हुआ जोगराम बोला। फिर वह दोनों पागलों जैसी हालत में अपने घर की ओर चल पड़े

 

लोभी मछुआरा कथा-सार / नैतिक ज्ञान

दु:खसुख को आपस में बांटने से प्रेम बढ़ता है। अपने हिस्से में से थोड़ा-सा किसी पहाड़ पत्नी को दे देने से नहीं टूट जाता, लेकिन जोगराम और उसकी तो आकंठ लोभ में डूबे थे। ध्र्यान रहे कि लालची व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता।

 

Hindi Story For Kids No. 4 : कहा गए भगवान 

पंडित दीनदयाल गांव के एक मंदिर के पुजारी थे। उस मंदिर में काफी चढ़ावा आता था। आगेपीछे कोई था नहीं, सो सारा चढ़ावा बच्चों में बांट दिया करते थे। बच्चे भी उनके इर्द-गिर्द मंडराते रहते थे।

एक बार पंडित दीनदयाल ने तीर्थयात्रा पर जाने का विचार कियालेकिन समस्या यह थी कि पीछे से भगवान की सेवा-पूजा कौन करेगा। इसका भी उन्होंने समाधान खोज लिया उन्होंने प्रभु नामक लड़के को बुलाया और कहाकल से कुछ दिनों के लिए मैं तीर्थयात्रा पर जा रहा हूं। मंदिर का सारा काम-काज तुम्हीं को देखना है।”
प्रभु पंद्रह-सोलह साल का था, लेकिन उसमें अभी भी बच्चा बुद्धि ही थी।

सारा कामकाज समझाकर पंडित दीनदयाल अगले दिन तीर्थयात्रा पर निकल पड़े अब प्रभु भगवान की सेवापूजा करता, भोग लगाता और सारा दिन मंदिर में ही व्यतीत करता। – बच्चे खेलने के लिए उसे बुलाने के ) आत तब भी नहीं जाता, लेकिन के।

 

जब वह अन्य बच्चों को खेलते देखता तो उसका भी मन खेलने को करता, लेकिन पंडितजी को दिए वचन से बंधा हुआ था।

एक दिन सभी बच्चे पत्थर मारकर जामुन तोड़ रहे थे। उसके भी मन में आया कि वह भी जामुन तोड़े। वह स्वयं को रोक नहीं पाया। पत्थर कहीं दिखाई नहीं दिए तो वह मंदिर में गया और वहां से ‘शालग्राम’ उठा लाया और उनको फेंककर जामुन तोड़ने लगा। उसे जामुन तो मिल गएलेकिन शालग्राम नदारद हो गए। न जाने किन पत्थरों में मिल गएकुछ शालग्राम नदी में गिर पड़े।

इधर पंडित दीनदयाल के वापस लौटने में मात्र एक दिन शेष रह गया था । अब उसे चिंता सताने लगी कि भगवान शालग्राम को पत्थर के रूप में फेंक-फेंककर तो वह जामुन खा गया। पंडितजी आकर पूछेगे तो वह क्या उत्तर देगा।

तभी उसके दिमाग में एक विचार आया। उसने सोचा कि शालग्राम भगवान काले-काले थे; और जामुन भी काले ही होते हैं। फिर जितने शालग्राम पंडितजी छोड़ गए थे वह उतने ही जामुन ले आया और उनको चंदन का तिलक लगाकर मंदिर में रख दिया।

अगले दिन पंडितजी आए तो उन्होंने प्रभु से पूछा”क्यों बेटा! सब ठीक ठाक तो है ना ।

प्रभु बोला, “जी पंडितजी! सब ठीक ठाक है।”

पंडितजी स्नान आदि करके जब पूजन करने लगे तो देखा कि शालग्राम छोटे-छोटे हो गए हैं? उन्होंने प्रभु को बुलाया और पूछा, “क्यों रे प्रभु! ये शालग्राम छोटे-छोटे कैसे दिखलाई पड़ रहे हैं?’

तब प्रभु बोला, “पंडितजी! मैं क्या करू? मैं तो इन्हें रोज कई बार नहलाता था। और चंदन लगाता था। अब ये घिस गए तो मैं क्या करू?”

पंडित दीनदयाल उसके बाल-मन की बात समझ गए। वह उसकी ओर देखते हुए बोले, “पुनि-पुनि चंदन, पुनि-पुनि पानी। घिस गए शालग्राम हम का जानी।

ऐसा ही हुआ न प्रभु।” प्रभु उनकी ओर देखता रह गया।

कहा गए भगवान कथा-सार / नैतिक ज्ञान

बाल-मन अपराध के प्रति बेहद संवेदनशील होता है। प्रताड़ना से बचने के लिए कोई भी कहानी गढ़ लेता है।

 

The Author

Romi Sinha

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