महिला सशक्तिकरण पर निबंध – Essay on Women Empowerment in Hindi

हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु Essay on Women Empowerment in Hindi पर पुरा आर्टिकल। महिला सशक्तिकरण का मतलब महिलाओ की उस क्षमता से है जिससे उनमे ये योग्यता आ जाती है की वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय खुद ले सके। अगर आप Women Empowerment के ऊपर essay ढूंढ रहे है तो यह आर्टिकल आपकी बहुत मदद करेगा । आईये पढ़ते है Essay on Women Empowerment in Hindi में।

 

महिला सशक्तिकरण पर निबंध Essay on Women Empowerment in Hindi

Essay on Women Empowerment in Hindi

प्रस्तावनाः नारी का सम्मान करना एवं उसके हितों की रक्षा करना हमारे देश की सदियों पुरानी संस्कृति है। यह एक विडम्बना ही है कि भारतीय समाज में नारी की स्थिति अत्यन्त विरोधाभासी रही है। एक तरफ तो उसे शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है तो दूसरी ओर उसे बेचारी अबला’ भी कहा जाता है। इन दोनों ही अतिवादी धारणाओं ने नारी के स्वतन्त्र विकास में बाधा पहुंचाई है। प्राचीनकाल से ही नारी को इन्सान के रूप में देखने के प्रयास सम्भवतः कम ही हुये हैं। पुरुष के बराबर स्थान एवं अधिकारों की मांग ने भी उसे अत्यधिक छला है। अतः वह आज तक ‘मानवी’ का स्थान प्राप्त करने से भी वंचित रही है।

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चिन्तनात्मक विकासः सदियों से ही भारतीय समाज में नारी की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उसी के बलबूते पर भारतीय समाज खड़ा है। नारी ने भिन्नभिन्न रूपों में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चाहे वह सीता हो, झांसी की रानीइन्दिरा गाँधी हो, सरोजनी नायडू हो। किन्तु फिर भी वह सदियों से ही क्रूर समाज के अत्याचारों एवं शोषण का शिकार होती आई हैं।

उसके हितों की रक्षा करने के लिए एवं समानता तथा न्याय दिलाने के लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। महिला विकास के लिए आज विश्व भर में ‘महिला दिवस’ मनाये जा रहे हैं। संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग की जा रही है। इतना सब होने पर भी यह प्रतिदिन अत्याचारों एवं शोषण का शिकार हो रही है। मानवीय क्रूरता एवं हिंसा से ग्रसित है।

यद्यपि वह शिक्षित , हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है तथापि आवश्यकता इस बात की है कि उसे वास्तव में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय प्रदान किया जाये। समाज का चहुँमुखी वास्तविक विकास तभी सम्भव होगा। उपसंहारः स्पष्ट है कि भारत में शताब्दियों की पराधीनता के कारण महिलाएं अभी तक समाज में पूरी तरह वह स्थान प्राप्त नहीं कर सकी हैं जो उन्हें मिलना चाहिए और जहाँ दहेज की वजह से कितनी ही बहूबेटियों को जान से हाथ धोने पड़ते हैं तथा बलात्कार आदि की घटनाएं भी होती रहती हैं, वहां हमारी सभ्यता और सांस्कृतिक परम्पराओं और शिक्षा के प्रसार तथा नित्यप्रति बढ़ रही जागरूकता के कारण भारत की नारी आज भी दुनिया की महिलाओं से आगे है और पुरुषों के साथ हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर देश और समाज की प्रगति में अपना हिस्सा डाल रही है।

सदियों से समय की धार पर चलती हुई नारी अनेक विडम्बनाओं और विसंगतियों के बीच जीती रही है। पूष्याभोग्या, सहचरीसहधर्मिणी, माँ, बहन एवं अर्धागिनी इन सभी रूपों में उसका शोषित और दमित स्वरूप । वैदिक काल में अपनी विद्वता के लिए सम्मान पाने वाली नारी मुगलकाल में रनिवासों की शोभा बनकर रह गई। लेकिन उसके संघर्षों सेउसकी योग्यता से बन्धनों की कड़ियां चरमरा गई। उसकी क्षमताओं को पुरुष प्रधान समाज रोक नहीं पाया। उसने स्वतन्त्रता संग्राम सरीखे आन्दोलनों में कमर कसकर भाग लिया और स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् संविधान में बराबरी का दर्जा पाया।

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राम राज्य से लेकर अब तक एक लम्बा संघर्षमय सफर किया है नारी ने। कई समाज सुधारकों, आंदोलनों और संगठनों द्वारा उठाई आवाजों के प्रयासों से यहां तक पहुंची है, नारी। जीवन के हर क्षेत्र में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली नारी की सामाजिक स्थिति में फिर भी परिवर्तन ‘ना’ के बराबर हुआ है। घर बाहर की दोहरी जिम्मेदारी निभाने वाली महिलाओं से यह पुरुष प्रधान समाज चाहता है कि वह अपने को पुरुषों के सामने दूसरे दर्जे पर समझें। आज की संघर्षशील नारी इन परस्पर विरोधी अपेक्षाओं को आसानी से नहीं स्वीकारती।

आज की नारी के सामने जब सीता या गांधारी के आदर्शों का उदाहरण दिया जाता है तब वह इन चरित्रों के हर पहलू को ज्यों का त्यों स्वीकारने में असमर्थ रहती है। देश, कालपरिवेश और आवश्यकताओं का व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्व है, समाज इनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। सीता के समय के और इस समय के सामाजिक परिवेश में धरतीआसमान का अंतर है। समाज सेविका श्रीमती ज्योत्सना बत्रा का कहना है कि आज के परिवेश में सीता बनना बड़ा कठिन है। सीता स्वयं में एक फिलोसिफी थीं। उनका जन्म मानव-जाति को, मानवमूल्यों को समझाने के लिए हुआ था।

दूसरों के लिए आदर्श बनने के लिए व्यक्ति को स्वयं बहुत त्याग करने पड़ते हैं जैसे सीता ने किए। राम और सीता ने जीवन को दूसरों के लिए ही जिया। राम जानते थे कि धोबी द्वारा किया गया दोषारोपण गलत है, मिथ्या है। परंतु उन्होंने उसका प्रतिरोध न करके प्रजा की संतुष्टि के लिए सीता का त्याग कर दिया। राम की मर्यादा पर कोई आंच न आएप्रजा उन पर उंगली न उठाए यह सोचकर सीता ने पति द्वारा दिए गए बनवास को स्वीकार किया और वाल्मीकि के आश्रम में रहने लगीं। अब न राम सरीखे शासक हैं न वाल्मीकि समान गुरू।

हम सभी जानते हैं कि सीता के जीवन का संपूर्ण आनंद पति में ही केंद्रित था। पति की सहचरी बनी वह चित्रकूट की कुटिया में भी राजभवन सा सुख पाती थी। मेरी कुटिया में राजभवन मन भाया’, सीता का यह कथन अपने पति श्री राम के प्रति उनकी अगाध आस्था को दर्शाता है। सीता अपना और राम का जन्मजन्म का नाता मानती थीं। आज भी भारतीय नारी पति के साथ अपना जन्मजन्म का नाता मानती है।

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युगदृष्टा, युगसृष्टा नारियों के चरित्र हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। हम उनके चरित्र के मूल तत्वों का समावेश अपनी जिंदगी में कर सकते हैं। श्रीमती डॉक्टर आशा शाहिद के अनुसार ‘लगभग चौबीस वर्षों से मैं अमरीका में रह रही हैं। हमने अपनी एक मात्र बेटी में भारतीय मूल के संस्कार डाले हैं, उसे रामायण व सीता के चरित्रों से अवगत कराया है। यों तो सीता धरती पुत्री थी। शिवजी के भारी भरकम धनुष को सरकाकर उन्होंने अपनी शक्ति का परिचय दिया था, पर अग्नि परीक्षा… ?

आज के समय में अच्छी शिक्षा पाना, अच्छी नौकरी पाना, दफ्तरों की राजनीति का शिकार न बनना, अपने घर और दफ्तर की जिम्मेदारियाँ अच्छी तरह निभाना ये किसी अग्निपरीक्षा से कम हैं?”

हर हाल में पति का साथ देने को उत्सुक सीता के चरित्र की यह विशेषता थी। डॉक्टर मनीषा देशपाण्डे के अनुसार सीता का उदाहरण पतिव्रताओं में सर्वोपरि है। इसमें सन्देह नहीं कि वह कठिनाई के समय में पति का मनोबल बढ़ानेविवाह के समय लिए गये वचनों को निभाने, उनकी सहचारी बन उनके साथ वनों को गई।

जब मैं सीता के बारे में सोचती हैं तो एक बात मेरे दिमाग में आती है वह है हमारी सामाजिक परिस्थितियों में रामराज्य से अब तक का बदलाव उस समय की नारी को पतिव्रता और कर्तव्य परायण जरूर होना चाहिए था। सीता इन गुणों पर खरी उतरती थीं। वह एक सुपर वूमैन थीं।

फिर भी सीता की पहचान अपने पति व बच्चों के कारण थी जैसे राम की पत्नी, लवकुश की मां। उनकी पूरी जिंदगी उनके परिवार के इर्द गिर्द ही सीमित रह गईवह समाज की अपेक्षाओं को पूरा करती रहीं। सीता के चरित्र की कुछ बातें मैं पसंद करती हैं, जैसे पति को सपोर्ट करना। वह दृढ़ चरित्र की महिला थी। आज की नारी होने के नाते मैं महसूस करती हूं कि एक व्यक्ति के रूप में मेरी अपनी पहचान होना जरूरी है। मैं सिर्फ एक पत्नी, एक मां, एक बहन या बेटी के रोल तक सीमित नहीं रहना चाहती। मैं समाज की सक्रिय सदस्य बनना चाहती हैं”

नैसर्गिक रूप से तो स्त्री-पुरुष एकदूसरे के पूरक हैं ही। जिस आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में मनुष्य अपने व्यक्तित्व की नयी ऊंचाइयां छू रहा है, उसके निर्माण में भी स्त्री की भूमिका दूसरे दर्जे की नहीं मानी जा सकती। हमारे अपने देश में भी, जब से देश के आधुनिक राष्ट्र में परिवर्तित होने की प्रक्रिया आरंभ होती है, तभी से हम स्त्रियों को सामाजिक, राजनीतिक प्रक्रियाओं में सक्रिय भूमिका निभाते पाते हैं।

यह और बात है कि जब इन प्रक्रियाओं को इतिहास या राष्ट्रीय ‘माइथालॉजी का रूप दिया जाता है, तब स्त्रियों को केवल पुरुष की प्रेरणा’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है या फिर अधिक से अधिक ऐसी वीरांगनाओं के रूप में, जिन्हें परिस्थितियां पराक्रम के लिए। बाध्य कर देती हैं।

सामाजिकराजनीतिक विवेक और इतिहास बोध पर भी स्त्री का कोई दावा हो सकता है, यह आम तौर से राष्ट्रीय वृत्तांतों में स्वीकार नहीं किया जाता। भारत के पहले स्वाधीनता-संग्राम 1857 के दो उदाहरणों से यह बात समझी जा सकती है:

महारानी लक्ष्मीबाई कुशल प्रशासक और नेता थीं, लेकिन उनकी मुख्य छवि हमारा राष्ट्रीय वृत्तांत एक युद्धरत वीरांगना का ही बनाता है। अवध की बेगम हजरतमहल के बारे में तो हम सिवा इसके कुछ याद नहीं करते कि वह भी 1857 के नेताओं में से एक थीं, जबकि बेगम हजरतमहल वह व्यक्ति थीं, जिन्होंने विक्टोरिया की ‘गदरके बाद जारी की गयी घोषणा का प्रतिवाद विद्रोही पक्ष की ओर से जारी किया था। लक्ष्मीबाई हो या हजरतमहल, मोतीबाई हों या अलकाजी—ये स्त्रियां अपवाद नहीं थीं, बल्कि उस दौर की सामान्य राजनीतिक चेतना से ही इनके व्यक्तित्व परिभाषित होते थे। 1857-58 के दमन के बाद राजनीतिक चेतना का जो उमार आया, उसका सामाजिक आधार नये विकसित हो रहे मध्य वर्ग में था। इस उभार में, एक लंबे अरसे तक स्त्री की स्थिति प्रतीकात्मक बनी रही। इस बात को अच्छी तरह समझने की जरूरत है।

जिस विद्रोह (1857) की जड़ें परंपरा में थीं, उसमें स्त्री की साझेदारी लगभग बराबरी की थी और जिस ‘विद्रोहका सामाजिक आधार अंग्रेजीदां भद्रलोक में था, उनमें स्त्री की हैसियत प्रेरणा और प्रतीक की थी। यह इस बात का एक और प्रमाण है कि भारतीय समाज में प्रगति और जड़ता का द्वंद परंपरा बनाम आधुनिकता के द्वंद्व का पर्यायवाची नहीं है। परंपरा में निहित जड़ताप्रगतिहीनता और अमानवीयता के पहलू तो अपनी जगह है ही, लेकिन आधुनिकता में भी सब कुछ गतिशीलप्रगतिशील हो, ऐसा नहीं है। उल्टेहमारे समाज में आयी आधुनिकता के सामाजिक आधार और उसके बौद्धिक स्त्रोतों की बदौलत उस आधुनिकता का दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी पहलू उसके प्रगतिशील पहलू से कहीं अधिक प्रचण्ड है।

जातिवाद विरोध के नाम पर सवर्ण जातिवाद की बेशर्म वकालत हो या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर फासिस्ट मिजाज की चट्टानी संवेदनहीनता ऐसी तमाम समाजतोड़क और पीछे दे’ प्रवृत्तियों का सामाजिक आधार और बौद्धिक तेज हमारे परम आधुनिक भद्रलोक द्वारा ही सप्लाई किया जाता है। भारतीय गवाह है कि पारम्परिक और सामाजिक दृष्टिकोण से स्त्रियों की हमेशा उपेक्षा की गयी है। मानव समाज की सबसे पुरानी और सबसे व्यापक गलतियों में से एक मुख्य गलती यह है कि आज तक भारतीय नारी के साथ समानता व न्याय का व्यवहार नहीं हुआ है।

 

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भारतीय संविधान निर्माताओं ने संविधान के विभिन्न प्रावधानों के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का निश्चय किया कि सभी को सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक न्याय प्राप्त हो सके, ताकि प्रत्येक भारतवासी को स्वतंत्रता के साथसाथ अवसर की समानता का आनन्द भी मिल सके। इसलिए भारत के संविधान की। उद्देशिकामूल अधिकारों तथा राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में ऐसे प्रावधान किए गये जिसमें महिलाओंअल्पसंख्यकों और समाज के निर्बल वर्गों को आगे आने का अवसर मिल सके, ताकि वे भी देश की मुख्यधारा से जुड़ सकें। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया तथा अनेक यातनाएं एवं अत्याचार सहे थे।

इसलिए संविधान निर्माताओं ने यह जरूरी समझा कि राष्ट्र को मजबूतसंगठित एवं प्रगतिशील बनाने के लिए महिलाओंयुवतियों एवं बच्चों की सुरक्षा, संरक्षण एवं उन्नति के लिए विशेष व्यवस्था की जाएताकि उनका पिछड़ापन समाप्त हो सके।

सौभाग्यवश, राजनीतिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक वोट के आधार पर समाज के प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी जाति, संप्रदायलिंग अथवा धर्म से संबंधित हो, को समानता का अवसर प्रदान किया गया है। प्रजातंत्र एवं गणतंत्र में सरकार अथवा शासक बदलने में वास्तविक शासक” अर्थात् मतदाता का कितना महत्व है यह समयसमय पर सरकारें बदलकर प्रस्तुत किया गया है। महिलाओं को मताधिकार एवं सरकार में भागीदारी का अधिकार अनेक देशों विशेषकार इस्लामिक देशों की महिलाओं से पहले प्राप्त हुआ।

केवल सामाजिक समानता के क्षेत्र में महिलाओं और बालिकाओं को आवश्यक, पर्याप्त एवं प्रमावी समानता प्राप्त नहीं हो सकी है। दूसरी ओर महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार एवं अपराधों में निरंतर वृद्धि हो रही है, जोकि चिंता का विषय है। यह स्थिति तब और शोचनीय हो जाती है जब संविधान के भाग तीन में उल्लिखित मूल अधिकारों में यह स्पष्ट व्यवस्था है कि समानता के अधिकार के अंतर्गत भारतवर्ष में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। (अनुच्छेद14) तथा राज्य किसी भारतीय नागरिक के विरुद्ध केवल लिंग के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा (अनुच्छेद15।

इसी अनुच्छेद के भाग 3 में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से नहीं रोकेगी।

आज जरूरत है नारी को समय की मुख्यधारा से जोड़ने की। आज भी नारी ममतामयी है, त्यागमयी है। नारी त्याग और साधना के बलबूते पर समाज के प्रत्येक पहलू से जुड़ी है। वह पढ़ीलिखी है। आत्मनिर्भर है, अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति सचेत , संघर्षरत है। यद्यपि नारी शिक्षा से आज कामकाजी महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है। हमारे समाज में उसकी निस्वार्थ सेवा हर क्षेत्र में है। तथापि वह नौकरी पेशा न होकर गृहणी होते हुये भी घरेलू दायित्वों का निर्वाह निष्ठापूर्वक करती है। किन्तु फिर भी उन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

कामकाजी महिलाएँ तो दोहरे स्तर पर पारिवारिक और सामाजिक शोषण की शिकार हैं। जैसेजैसे समय आगे बढ़ रहा है वैसेवैसे भारतीय नारी के भी कदम आगे बढ़ रहे हैं। आज वह देवीनहीं बनना चाहतीं, वह सही और सच्चे अर्थों में अच्छा इंसान बनना चाहती है। नैतिक मूल्यों और मानवीय मूल्यों को नकारा नहीं जा सकता। हमारे पारम्परिक चरित्र नैतिक मूल्यों की धरोहर हैं। पौराणिक चरित्रों के आदर्श हमारी जड़े हैं। आज के संदर्भ में उपयुक्त लगने वाले उनके गुणों को तथा शाश्वत आदशों को हमें अपनाना चाहिए।

आज की जुझारू महिला का व्यक्तित्व उसकी कार्यक्षमता में झलकता है और आज की संघर्षशील नारी को एक नहीं कई अग्निपरीक्षाएं देनी पड़ती हैं। सारी दुनिया में आज महिला दिवस मनाये जा रहे हैं। संसद में उनके हितों की रक्षा हेतु 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग की जा रही है। इससे आधी दुनिया कही जाने वाली महिलाओं की दशा में कोई परिवर्तन आएगाइसकी तो कोई संभावना नहीं है। मगर लोगों का ध्यान कुछ देर के लिए इस ओर अवश्य जाएगा क्योंकि इस अवसर पर पत्र पत्रिकाओं में महिलाओं की समस्याओं से सम्बन्धित कुछ लेख भी छपेंगे और कुछ गोष्ठियों आदि के आयोजन भी होंगे।

इसके अतिरिक्त हमारे समाज की अपनी कुछ तियां हैं, जोकि महिलाओं के प्रति भेदभाव को बढ़ाती हैं। इनमें दहेज प्रथालड़के के जन्म पर समारोह तथा लड़की के जन्म पर अप्रसन्नता व्यक्त करना, पुरुष द्वारा ही सामाजिक एवं धार्मिक कृत्य करना, पर्दा प्रथा, गर्भस्थ शिशुओं का लिंग परीक्षण तथा बालिका भ्रूणों का गर्भपातलड़के के लिए इलाज तथा अन्य उपचार आदि नैतिकता व चरित्र के बारे में महिलाओं और पुरुषों के प्रति दोहरे मानदण्ड, लड़कियों और महिलाओं के लिए अनेक सामाजिक वर्जनाएं तथा पुरुषों के लिए स्वच्छंदता आदि शामिल हैं। इसके अलावा महिलाओं से कई अन्य क्षेत्रों में भी भेदभाव होता है, भले ही कानून इस प्रकार के भेदभाव को वर्जित करता है। रोजगार व सम्पत्ति के अधिकार में इस प्रकार का भेदभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

जहां तक पैतृक सम्पत्ति का मामला है पुरुष ही वहां सम्पत्ति का वारिस व नियंत्रणकर्ता होता है। इसी प्रकार रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं को समान अवसर दिए जाने की बात कही जाती है लेकिन वास्तविकता यह है कि वहां भी उनसे भेदभाव होता है। ऐसे भी कई अवसर आते हैं। जबकि उनका कई तरीकों से शोषण होता है।

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महिलाओं के हित में विधेयक लाना तथा सरकार द्वारा उनके विकास के लिए विभिन्न परियोजनाएं बनाने के लिए प्रयास उचित हैं, लेकिन जिस बात की सर्वाधिक आवश्यकता है वह यह है कि इसे एक सामाजिक आंदोलन बनाया जाए। नि:संदेह सरकार इस बारे में एक जागरूकता तो उत्पन्न कर सकती है लेकिन इसके प्रति गतिशीलता की भावना तो जनता के मध्य से ही उठनी चाहिए। लेकिन इस बारे में दुख की बात यह है कि कुछ नहीं हो रहा है। विडम्बना यह है कि महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए अतीत में जिस प्रकार के समाज सुधार आंदोलन हुए थे वैसे आंदोलन आज नहीं हो रहे हैं।

सरकारी कार्यक्रम अभी तक जनता को इस प्रकार के अभियानों में प्रेरित करके नई पहल कराने में विफल रहे हैं। समाज सुधार के प्रति निष्ठावान, उत्साही लोगों व संगठनों को इस दिशा में आगे बढ़ना होगा।

महिला सशक्तिकरण पर निबंध Essay on Women Empowerment in Hindi

किसी भी समाज का स्वरूप वहां की महिलाओं की स्थिति एवं दशा पर निर्भर करता है। जिस समाज में महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ और सम्मानजनक होगी, वह समाज भी सुदृढ़ और मजबूत होगा। यदि देखा जाए तो आधुनिक काल की अपेक्षा प्राचीन भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति अधिक दृढ़ थी, उन्हें पुरुषों के समान अधिकार भी प्राप्त थे तथा समस्त सामाजिक-धार्मिक कार्यकलापों में उनकी सहभागिता अनिवार्य थी। गार्गी, अपाला, विद्योत्तमा जैसी विदूषी नारियां इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। कालांतर में भारत पर होने वाले लगातार विदेशी आक्रमणों के परिणामस्वरूप धीरेधीरे महिलाओं की स्थिति में गिरावट आई और वर्तमान में स्थिति यह है कि हम महिलाओं के सशक्तीकरण पर चर्चा कर रहे हैं अर्थात् जो नारी स्वयं में शक्तिस्वरूपा है, अन्नपूर्णा है, सृष्टि का प्रमुख आधार है, उसके सशक्तीकरण पर विचारविमर्श किया जा रहा है। यही तथ्य स्वयं में उसकी हासमान स्थिति का द्योतक है।

वस्तुतः भारत का सामाजिक ढांचा ही महिलाओं और पुरुषों के लिए पृथक पृथक भूमिकाओं का निर्धारण करता है, जिसके दुर्भाग्यपूर्ण परिणामस्वरूप वर्तमान में प्रत्येक स्तर पर महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है। आज अमेरिका सहित विश्व का कोई भी राष्ट्र यह दावा कर पाने में सर्वथा असमर्थ है कि उसके यहां किसी भी रूप में महिलाओं का उत्पीड़न नहीं किया जाता। वर्तमान में महिलाएं तृतीय विश्व की भांति हैं, जहां उनके अधिकार सीमित और कर्तव्य असीमित हैं। लम्बे संघर्ष के पश्चात् भारतीय महिलाओं ने समाज में अपनी स्थिति में सुधार ला पाने और समाज में अपना कुछ स्थान बनाने में सफलता अर्जित की है। महिलाओं की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगत हो रहे हैं, किंतु इन परिवर्तनों की गति काफी अधिक धीमी है।

महिलाओं के सशक्तीकरण का प्रश्न ही सामाजिक न्याय, लोकतंत्र एवं समेकित सामाजिक विकास के दर्शन पर आधारित है। सशक्तीकरण वह बहुआयामी प्रक्रिया है, जो कि महिलाओं में सामाजिक आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने की क्षमता का पर्याप्त विकास करने का प्रयत्न करती है। सशक्तीकरण से अभिप्राय शक्ति का अधिग्रहण मात्र नहीं है, अपितु इसके द्वारा उनमें शक्ति के प्रयोग की क्षमता का समुचित विकास किया जाता है।

महिलाओं को सामाजिक हाशिए से हटाकर समाज की मुख्य धारा में लाना, निर्णय लेने की क्षमता का विकास करना, उनमें पराश्रितता की भावना और हीन भावना को समाप्त करना ही सशक्तीकरण है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष 1 लाख 25 हजार महिलाएं गर्भधारण के कारण अथवा बच्चों के जन्म के समय मृत्यु का शिकार बन जाती हैं। प्रतिवर्ष जन्म लेने वाली एक करोड़ बीस लाख लड़कियों में से 30 प्रतिशत लड़कियां अपना 15वां जन्मदिन देखने के लिए जीवित नहीं रह पातीं। 72 प्रतिशत गर्भवती ग्रामीण महिलाएं निरक्षर हैं। कक्षा एक में प्रवेश लेने वाली प्रत्येक दस लड़कियों में से केवल छह लड़कियां ही कक्षा पांच तक पहुंच पाती हैं।

 

वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व में काम के घण्टों में 60 प्रतिशत से अधिक का योगदान महिलाओं का होता है, फिर भी, वे मात्र एक प्रतिशत सम्पत्ति की ही मालिक हैं। आकड़े स्पष्ट करते हैं कि महिलाएं एक दिन में पुरुषों से छह घण्टे अधिक कार्य करती हैं। इसके पश्चात् भी उन्हें महत्वहीन समझा जाता है। पचास प्रतिशत कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर उत्पीड़न का शिकार होती हैं। 1996 में अंतर्रासदीय परिषद द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 100 देशों में 10 प्रतिशत राजनीतिक दलों का ही नेतृत्व महिलाएं करती हैं। विकसित देशों की लोकतांत्रिक संस्थाओं में भी महिलाओं को उनकी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है। होता है कि, देश में महिलाओं के प्रति बढ़ रहे अपराधों के कारणों में प्रमुख हैं-धर्म, देश में स्त्रीपुरुष साक्षरता एवं लिंग अनुपात पर दृष्टिपात करने पर यह ज्ञात जाति, वर्ग, पारिवारिक संरचनाविवाह पद्धति, नातेदारीऔद्योगीकरणनगरीकरण पाश्चात्य शिक्षा एवं संस्कृति, आधुनिकीकरणबढ़ता उपभोक्तावाद, आदि।

स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् भारत के संविधान में अनुच्छेद14 के अंतर्गत स्त्रीपुरुष समानता पर चर्चा की गई। हिन्दू विवाह अधिनियम1955; विशेष विवाह अधिनियम1954, विधवा पुनर्विवाह अधिनियम1956हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरणपोषण अधिनियम, 1956 के माध्यम से जहां महिलाओं को सामाजिक अधिकार प्रदान किए गए वहीं हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम1956 द्वारा उसे सम्पत्ति का अधिकार प्रदान किया गया है। इसके अतिरिक्त उसके आर्थिक अधिकारों के साथसाथ उसके सम्मान को सुरक्षा प्रदान करने की दृष्टि से 1948 में फैक्ट्री अधिनियम तथा 1976 में समान पारिश्रमिक अधिनियम बनाए गए।

समाज के सभी वर्गों की 18 वर्ष से ऊपर की महिलाओं को, चाहे वे शिक्षित हों अथवा अशिक्षितपुरुषों के समान मताधिकार प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त महिलाओं के कल्याणार्थ 1961 में दहेज निषेध अधिनियम एवं प्रसूति लाभ अधिनियम1986 में अश्लील चित्रण निवारण अधिनियम तथा 2006 में घरेलू हिंसा महिला संरक्षणअधिनियम भी पारित किए गए।

महिला सशक्तीकरण की दिशा में ठोस प्रयास करते हुए सरकार द्वारा 1985 में महिला एवं बाल विकास विभाग की स्थापना तथा 31 जनवरी1992 को राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गई। 1992 से देश में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा। भारत सरकार ने वर्ष 2001 को महिला सशक्तीकरण वर्ष घोषित किया। महिलाओं के कल्याण हेतु सरकार द्वारा अनेक योजनाओं एवं कार्यक्रमों का कार्यान्वयन किया गया है, इनमें प्रमुख हैं-महिला समृद्धि योजनामहिला सामाख्या, इंदिरा महिला योजना, बालिका समृद्धि योजना, स्वयंसिद्धा योजना आदि । सरकार द्वारा महिला उत्थान की दिशा में किए गए इतने प्रयासों के पश्चात् भी भारतीय समाज में महिलाओं की दशा शोचनीय है। कन्या आज भी अधिकांश भारतीय घरों में अनचाही संतान है । यही पसंदनापसंद लैंगिक भेदभाव का सर्वप्रमुख कारण है, जो कि परिवार के स्तर से आरम्भ होकर महिलाओं के प्रति हिंसा को प्रोत्साहित करते हैं। उन्हें समाज में पुरुषों के समान अधिकार एवं स्वतंत्रता का उपभोग करने से रोकती है।

 

इसके अतिरिक्त समाज में महिलाओं की दुर्दशा का एक अन्य प्रमुख कारण सरकारी योजनाओं का उचित क्रियान्वयन न होने के कारण अपेक्षित परिणामों की प्राप्ति न होना है। यह कहा जा सकता है कि महिलाओं की बदतर स्थिति के लिए अकुशल प्रबंधन के साथ-साथ समाज भी समान रूप से दोषी व उत्तरदायी है। महिला सशक्तीकरण की दिशा में किए जाने वाले प्रयासों को सफल बनाने हेतु यह आवश्यक है कि समाज की मानसिकताविशेषतः स्वयं महिलाओं की मानसिकतामें परिवर्तन लाया जाए। समाज महिलाओं को मात्र महिला की दृष्टि से न देखे अपितु उसे एक मनुष्य माने तथा महिलाएं भी स्वयं को अबला नहीं सबला समझों। इस दिशा में गैरसरकारी संगठन अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ ही महिलाओं की स्थिति को नीचा बनाने वाली सामाजिक परम्पराएं समाप्त की जानी चाहिएमहिलाओं को साक्षर बनाने की दिशा में ठोस प्रयास किए जाने चाहिएमहिलाओं की गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए उत्पीड़ित महिलाओं को सरकारी एवं गैरसरकारी संगठनों द्वारा पर्याप्त सहायता दी जानी चाहिए तथा महिलाओं के लिए स्वरोजगार योजनाओं आदि को पर्याप्त महत्व प्रदान किया जाना चाहिए।

 

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समयसमय पर आयोजित होने वाली संगोष्ठियों एवं सम्मेलनों में महिला सशक्तीकरण सम्बन्धी विचारों से इस तथ्य को बल प्राप्त होता है कि यह वर्तमान समाज की आवश्यकता है किंतु मात्र लम्बे-चौड़े भाषणों और वाद-विवादों मात्र से महिलाओं का उत्थान सम्भव नहीं है। इसके लिए समाज को महिला सशक्तीकरण के पौधे को अपने प्रयासों रूपी जल से सींचना होगा, महिलाओं को उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा एवं सम्मान पुनः लौटाना होगा, इन सबसे ऊपर नारी को अपने अस्तित्व, अपने ‘स्व’ की पहचान बनानी होगी। जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन महिला सशक्तीकरण का लक्ष्य भी प्राप्त हो जाएगा।

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