बेरोजगारी की समस्या पर निबंध Essay on Unemployment in Hindi

हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु Essay on Unemployment in Hindi पर पुरा आर्टिकल। बेरोजगारी एक ऐसी समस्या है जो हमारे देश को अंदर से खोकला कर रही है। आज यह सबसे बड़ी समस्या है जिसको खत्म करने के लिए हमें सबसे पहले इसको अच्छे से जानना होगा। इस आर्टिकल में हम Unemployment के अलग अलग तरह के essay लिख रहे हो आपको Unemployment को समझने में बहुत मदद करंगे।

अगर आप Unemployment के ऊपर essay ढूंढ रहे है तो यह आर्टिकल आपकी बहुत मदद करेगा । आईये पढ़ते है Essay on Unemployment in Hindi पर बहुत कुछ लिख सकते है।

Essay on Unemployment in Hindi

बेरोजगारी पर निबन्ध Essay on Unemployment in Hindi

 

भारत में बेरोज़गारी की समस्या एक भयानक समस्या है। यहाँ लगभग 44 लाख लोग प्रतिवर्ष बेरोज़गारों की पंक्ति में आकर खड़े हो जाते हैं। आज भारत में करोडों अशिक्षित और शिक्षित बेरोजगार हैं। बेरोज़गारी का पहला और सबसे मुख्य कारण जनसंख्या में निरंतर वृद्धि होना है। भारत में जनसंख्या 25 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रही है। जिसके लिए प्रतिवर्ष 50 लाख व्यक्तियों को रोज़गार देने की आवश्यकता पड़ती है जबकि मात्र 5-6 लाख लोगों को ही रोज़गार मिल पाता है। बेरोज़गारी के लिए हमारी शिक्षाप्रणाली दोषपूर्ण है।

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यहाँ व्यवसाय प्रधान शिक्षा का अभाव है। व्यावहारिक या तकनीकी शिक्षा के अभाव में शिक्षा पूरी करने के बाद विद्यार्थी बेरोज़गार रहता है। इसके अतिरिक्त लघु और कुटीर उद्योगों के बंद होने के कारण भी बेरोज़गारी बढ़ रही है। कच्चे माल के अभाव और तैयार माल के बाज़ार में खपत न होने के कारण श्रमिक लघु एवं कुटीर उद्योगों को छोड़ रहे हैं। इस प्रकार बेरोज़गारी की समस्या और बढ़ रही है।

यंत्रीकरण अथवा मशीनीकरण ने भी असंख्य लोगों के हाथ से रोज़गार छीनकर उन्हें बेरोज़गार कर दिया है, क्योंकि एक मशीन कई श्रमिकों का काम निपटा देती है। फलस्वरूप बड़ी संख्या में लोग बेरोज़गार हो रहे हैं।

इस बेरोज़गारी का समाधान भी संभव है। बेरोज़गारी को कम करने का सर्वोत्तम उपाय है-जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाना। जनसंख्या को बढ़ने से रोककर भी बेरोज़गारी को रोका जा सकता है। इसके अलावा शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाया जाना चाहिए ताकि शिक्षित होने के बाद विद्यार्थी को रोज़गार मिल सके। बेरोज़गारी कम करने के लिए लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास भी अत्यावश्यक है।

सरकार द्वारा धन, कच्चा माल, तकनीकी सहायता देकर तथा इनके तैयार माल की खपत कराके इन उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिएइससे भी बेरोज़गारी में कमी आएगी। इसके अतिरिक्त मुर्गी पालनदुग्ध व्यवसायबागवानी आदि उद्योग-धंधों को विकसित करके भी रोज़गार बढ़ाया जा सकता है।

सरकार को चाहिए कि बेरोज़गारी को कम करने के लिए वह सड़क-निर्माणवृक्षारोपण आदि कार्यों पर जोर दे ताकि अशिक्षित बेरोज़गारों को रोज़गार मिल सके। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जन्म दर में कमी करके, शिक्षा का व्यवसायीकरण करके और लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देकर बेरोज़गारी का स्थायी समाधान सम्भव है।

बेरोजगारी पर निबन्ध Essay on Unemployment in Hindi

 

रोजगार व्यक्ति की आधारभूत आवश्यकता है. ईश्वर ने हमें मस्तिष्क, हाथ, पाँव, दिमाग की अनेक शक्तियाँ, हृदय और भावना प्रदान की हैं जिससे कि उनका पूर्ण सदुपयोग किया जा सके और मनुष्य आत्मसिद्धि प्राप्त कर सके. शायद हमारे जीवन का ही लक्ष्य हो, किन्तु यदि हमारे पास करने को कोई काम ही नहीं है, यदि ऊपर वर्णित शक्तियों का प्रयोग करने के लिए हमारे पास अवसर ही नहीं है, तो बहुतसी समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं. प्रथम हम अपनी शारीरिक और मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकतेद्वितीय, कार्य की अनुपस्थिति में हमें शरारत करना आएगा. तृतीय, उपयुक्त रोजगार अवसरों के अभाव में हम अपना नैतिक और आध्यात्मिक विकास भी करने में समर्थ नहीं होंगे. इस प्रकार ऐसे समाज में, जिसमें रोजगार की समस्या जटिल है, उसमें निराशा, अपराध और अविकसित व्यक्तित्व होंगे.

 

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भारत लगभग इसी प्रकार की परिस्थिति से गुजर रहा है. यहाँ बेरोजगारी की समस्या वड़ी जटिल हो गई है. हमारे रोजगार कार्यालयों में करोड़ों लोग पंजीकृत हैं जिनको काम दिया जाना है. इनके अतिरिक्त, ऐसे भी व्यक्ति हैं, और उनकी संख्या भी लाखों में है, जोकि अपने को रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत नहीं करा पाते.

भारत में बेरोजगारी की समस्या के कई कारण हैं. पहला कारण है तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या, सरकारजिस अनुपात में जनसंख्या बढ़ती है, उस अनुपात में नौकरियों का सृजन नहीं कर पाती. द्वितीय, हमारी दूषित शिक्षा व्यवस्था ने भी समस्या को उलझा दिया है, जबकि लाखों की तादाद में लोग रोजगार की तलाश कर रहे हैं, वहीं बहुत से उद्योग, प्रतिष्ठान और संस्थाएँ ऐसी हैं, जहाँ पर उपयुक्त कार्य करने वालों की बहुत कमी है. हम रोजगारपरक शिक्षा को प्रारम्भ नहीं कर पाए हैं और न उद्योग के साथ शिक्षा का तालमेल ही बैठा पाए हैं.

बेरोजगारी का एक अन्य कारण अपर्याप्त औद्योगीकरण और कुटीर उद्योग धन्धों की मंद प्रगति है. बड़े बड़े उद्योगपतियों के निहित स्वार्थों के कारण कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन नहीं मिल पाता. हमारे बेरोजगार युवकों का सफेदपोश नौकरी के लिए प्रेम भी वेरोजगारी का एक अन्य कारण है. हमारे नौजवान नियमित नीकरी की तलाश में अपनी शक्ति एवं संसाधन खर्च कर देंगेकिन्तु अपना कारोबार प्रारम्भ नहीं करेंगे.

यहाँ तक कि एक कृषि स्नातक भी खेतों में कार्य नहीं करेगा, बल्कि कृषि संस्थानों या सरकारी नौकरी में उपयुक्त पद के लिए प्रतीक्षा करेगा. वास्तव में हमारे नवयुवकों का भी दोष नहीं. अपने कारोबार में विनियोग करने के लिए उनके पास पर्याप्त साधन एवं पूंजी नहीं है. वे अप्रशिक्षित भी होते हैं और उनकी प्रशिक्षण और परामर्शी सुविधाओं तक पहुंच नहीं है. इन कठिनाइयों के कारण उनकी जोखिम उठाने की क्षमता कमजोर पड़ती है और स्वतन्त्र

कारोबार प्रारम्भ करने की उनकी इच्छा कुंठित हो जाती है. एक कारण यह भी है कि नवयुवकों में अपने पैतृक व्यवसाय छोड़ने की प्रवृत्ति हो गयी है. पुराने जमाने में पुत्र अपने पिता का व्यवसाय अपना लेता था इसलिए उसके लिए बेरोजगारी की समस्या का प्रश्न ही नहीं उठता था. हमारे देश में बेरोजगारी का एक अन्य कारण है, दूषित नियोजन, हमारे नियोजक मानवशक्ति के नियोजन की ओर उचित ध्यान देने में असफल रहे हैं.

वे अपना सारा ध्यान संसाधनों के नियोजन की ओर लगाते रहे हैं. यही कारण है कि नियोजन के फलस्वरूप काफी मात्रा में सृजित पूंजियों और उससे उत्पन्न हुए कुल सुख में बड़ा भारी अन्तर है. कुल राष्ट्रीय उत्पादन के सन्दर्भ में देश कितना ही सम्पन्न क्यों न हो जाए नागरिकों का सुख सुनिश्चित नहीं किया जा सकता यदि उपयुक्त और सही रोजगार के अवसर प्रदान नहीं किए जाते, किन्तु बेरोजगारी की समस्या के लिए केवल सरकार को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता. भारत में बहुत से ऐसे लोग हैं जो कार्य की प्रतिष्ठा को नहीं समझते हैं और ऐसी नौकरियों की प्रतीक्षा करते रहते हैं जिनमें काम तो कम करना पड़े और प्राप्ति अधिक हो. उनकी सुस्ती और कठिन कार्य में लगने की अनिच्छा उनको बेरोजगार रखती है.

बेरोजगारी की समस्या का शीघ्र से शीघ्र हल निकालना होगा. सबसे बड़ी आवश्यकता मानव शक्ति का नियोजन है. हमें अपने नवयुवक और नवयुवतियों को रोजगार परक और व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करनी होगी. त्वरित औद्योगीकरण और कुटीर उद्योगों के लिए उचित प्रोत्साहन की आवश्यकता है. काफी संख्या में प्रत्येक गाँव, कस्वा और शहर में लघु स्तर के एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना से रोजगार के असंख्य अवसर खिलेंगे. हमारे नवयुवकों में जोखिम उठाने की भावना का संचार करना पड़ेगा और धन्धा प्रारम्भ करने के लिए उन्हें पथ प्रदर्शन देना पड़ेगा.

आसान शतों पर विनियोग हेतु उनको पूंजी उपलब्ध करानी होगी. अन्त में, हमें जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाना होगा. संतोष का विषय है कि हमारे नियोजक इसी दिशा में कार्य कर रहे हैं. रोजगार की कई योजनाएं चलाई गई हैं, जिनमें से मुख्य हैं ट्राइसेम (ट्रेनिंग ऑफ रूरल यूथ फॉर सैल्फ इम्पलॉयमेंट) और ग्रामीण वेरोजगारों के लिए एन. आरई. पी. (नेशनल रूरल इम्पलॉयमेंट प्रोग्राम). आरएल. ई. जी. पी (रूरल लैंडस इम्पलॉयमेंट गारंटी प्रोग्राम), स्पेशल कम्पोनेंट प्लान, जवाहर रोजगार योजना तथा नेहरू रोजगार योजना आदि. जवाहर रोजगार योजना को अब ग्राम समृद्धि योजना में परिवर्तित कर दिया गया है.

ग्रामीण बेरोजगारी की अन्य योजनाएं हैं अन्नपूर्णा योजना तथा स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजनानगरीय लोगों के लिए नेहरू रोजगार योजना का पुनः नामकरण करके उसे स्वर्ण जयन्ती शहरी रोजगार योजना’ कहा जाने लगा है. वर्ष 2006 से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना प्रारम्भ की गई है जिसका उद्देश्य है गाँवों के निर्धन बेरोजगारों को वर्ष में 10 दिन का रोजगार उपलब्ध कराना देश का औद्योगीकरण तीव्रगति से आगे बढ़ रहा है.

सरकार ने कुछ संस्थानों में स्वयं उद्यम चलाने से सम्बन्धित पाठ्यक्रम का प्रचलन किया है जिससे कि गतिशील नवयुवकों को अपने स्वयं के उद्यम स्थापित करने हेतु प्रोत्साहित किया जा सके. कुछ राज्य सरकारों ने हाईस्कूल और माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में व्यावसायिक शिक्षा के कोर्टों का प्रचलन किया है और चुनी हुई संस्थाओं में विभिन्न ट्रेडों की स्थापना के लिए धन जुटाया है. योजना कार्यक्रम का विस्तार करके सभी संस्थाओं में व्यावसायिक शिक्षा के कोर्स प्रारम्भ करने की है

. बड़ी संख्या में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI) खोले जा रहे हैं. इस व्यवस्था से पिछले समय में बहुत अच्छे नतीजे निकले हैं. आर्थिक उदारीकरण कार्यक्रम से रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं.

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परिश्रमी और उत्साही नवयुवक स्वयं के उद्यम स्थापित करने हेतु आकर्षित हो रहे हैं. इस प्रकार व्यक्तिगत क्षेत्र में रोजगार की क्षमता बढ़ी है. आगे और भी अधिक उदारीकरण से हमारे साहसी और प्रतिभाशाली युवकों के लिए रोजगार के आकर्षक अवसर खुलेंगेऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जिनमें लोगों ने बिल्कुल शुरूआत से प्रारम्भ किया और थोड़े से समय के कमरकस श्रम के बल पर लाखों रुपए कमाए और अपने को ही नहीं दूसरों को भी रोजगार प्रदान किया.

भारत के पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कुछ क्षेत्रों में आर्थिक क्रिया अपनी चरम सीमा पर है और बेरोजगारी का लगभग अस्तित्व ही नहीं रहा. हमें अपने आलस्य को त्याग मैदान में कूदना है, जिसको परिश्रमी और साहसी युवकों की प्रतीक्षा है.

Essay on Unemployment in Hindi बेरोजगारी पर निबन्ध

 

भारत एक विकासशील देश है। इस समय इसके सम्मुख लगभग वे सभी समस्याएं विद्यमान हैं, जो प्राय: विकासशील देशों के सम्मुख होती हैं। उन समस्याओं में सर्वप्रमुख समस्या बेरोजगारी है। भारत में तीन प्रकार की बेरोजगारी पाई जाती हैपूर्ण बेरोजगारी, अर्द्ध बेरोजगारी तथा मौसमी बेरोजगारी। बेरोजगारी किसी भी प्रकार की क्यों न हो, किसी भी देश के लिए इसका सीमा से अधिक बढ़ना बहुत ही भयानक और विस्फोटक होता है।

ग्रामीण और शहरी इलाकों के आधार पर बेरोजगारी का विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि शहरों में अधिक संख्या शिक्षित बेरोजगारों की होती है। गाँवों में तथा गांवों से शहरों में आए बेरोजगारों में अशिक्षित बेरोजगारों की संख्या ही अधिक होती है। देहातों में रहने वाले किसानों को अर्द्धबेरोजगारी का सामना करना पड़ता। है, क्योंकि कृषि कार्य एक मौसमी उद्यम है। इसी कारण खेतिहर मजदूर वर्ष भर काम न मिलने के कारण अर्द्धबेरोजगार के रूप में समय गुजारते हैं।

ग्रामीण इलाकों में आय का मुख्य साधन कृषि ही होता है। यद्यपि वहाँ हथकरघा या दस्तकारी से जुड़े कार्य भी किए जाते हैं, लेकिन उनमें रोजगार के अवसर सीमित होते हैं। शहरी इलाकों में व्यापार, सरकारी तथा प्राइवेट नौकरियाँनिजी व्यवसाय, विभिन्न प्रकार के अन्य कामधंधे तथा दुकानदारी आदि रोजगार के प्रमुख साधन होते हैं, परंतु इनमें भी धीरे-धीरे रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं।

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आज प्रमुख और विचारणीय प्रश्न यह है कि देश में बेरोजगारी की समस्या इतनी भयंकर क्यों हो गई है? इसका मुख्य कारण यह है कि देश में जितनी तेजी से आर्थिक विकास होना चाहिए था, वह नहीं हुआ है। दूसरा प्रमुख कारण देश की जनसंख्या का बहुत तेजी से बढ़ना है, जिसके फलस्वरूप बेरोजगारी की संख्या में भी तेजी से इजाफा हो रहा है। देश को इस समस्या से निजात दिलाने के लिए सही दिशा में प्रयास करने की जरूरत है। देश के नीतिनिर्माताओं को नीतियाँ बनाते समय यह देखना चाहिए कि देश में बेरोजगारी की प्रकृति स्वरूप और स्थिति कैसी है, बेरोजगारों की संख्या कितनी है तथा उन सभी के लिए किस प्रकार रोजगार की समुचित व्यवस्था की जाए। नीति-निर्माताओं को यह भी देखना चाहिए कि नई बनी नीतियों से रोजगार के अवसर किस हद तक पैदा होंगे तथा लोगों को किस प्रकार की तथा कितनी शिक्षा या प्रशिक्षण की व्यवस्था करानी होगी। परंतु दुर्भाग्यवश हमारे नीति-निर्माता योजनाएँ बनाते समय इन बातों को महत्व नहीं देते। आजादी के बाद से अब तक विभिन्न पंचवर्षीय योजनाएँ बनती रहीं, लेकिन बेरोजगारी की निरंतर बढ़ती समस्या के समाधान के लिए कोई सार्थक पहल नहीं की गई। यदि हमारे योजनाकारों ने जनसंख्या को वृद्धि पर आरंभ से ही अंकुश लगाने की दिशा में प्रयास किए होते, तो आज स्थिति इतनी खराब नहीं होती।

देश में जनसंख्या वृद्धि के साथसाथ बेरोजगारों की संख्या में भी निरंतर वृद्धि होती रही है। यद्यपि सरकार ने नए उद्योग-धंधों की स्थापना की, परंतु उससे रोजगार के अधिक अवसरों का सृजन न हो सका। शिक्षा का विस्तार हुआ, परंतु योजनाएँ आवश्यकतानुरूप नहीं बनीं और शिक्षित बेरोजगारों की कतार लंबी होती चली गई।

यद्यपि सरकार ने विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत विकास के कार्यक्रम लागू किएलेकिन उनका लाभ ग्रामीण क्षेत्रों को नहीं मिला। इन क्षेत्रों में सरकार ने उद्योग-धंधों के विकास के लिए कोई प्रयास नहीं कियाफलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्र पिछड़ते चले गएबेरोजगारों की भीड़ ने रोजगार की तलाश में शहरों की ओर रुख किया, जिससे शहरों में भी बेरोजगारी की समस्या बढ़ती चली गई।

इस संदर्भ में जहाँ तक शिक्षा का प्रश्न है, यह देखने में आ रहा है कि शिक्षा व्यवस्था हमारी योजनाओं का अंग तो बन चुकी है, लेकिन इस शिक्षा व्यवस्था का देश की जनशक्ति की विविध आवश्यताओं के साथ कोई तालमेल नहीं है। शिक्षा के विकास का सीधा संबंध रोजगार से होना चाहिएपरंतु ऐसा न होने के कारण शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में अतिशय वृद्धि होती रही है। आज के शिक्षित बेरोजगारों की मनोवृत्ति का भी इसमें कम योगदान नहीं है। आज सामान्य शिक्षा प्राप्त युवक भी सिर्फ कार्यालयी कार्य ही करना चाहता है, वह दस्तकारी या हाथ व कपड़े गंदे करने वाला काम नहीं करना चाहता। दूसरी ओर जिन नवयुवकों ने तकनीकी या व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त की होती है, वे भी रोजगार के अवसरों की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण बेरोजगार बने रहते हैं। आर्थिक कारणों से वे अपना व्यवसाय करने का साहस भी नहीं जुटा पाते और क्लर्क और अफसर की नौकरी के इच्छुक युवकों की कतार में खड़े हो जाते हैं।

 

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यद्यपि सरकार ने बेरोजगारों को नौकरी दिलाने हेतु लगभग हर शहर में रोजगार कार्यालय खोले हैं। ये कार्यालय बेरोजगारी की समस्या के समाधान में पूरी तरह असफल और उद्देश्यहीन ही साबित हुए हैं। इस समस्या के समाधान हेतु कुछ सुझाव इस प्रकार हैं

(1) जनसंख्या की वृद्धि दर को नियत्रित करने की है। सरकार को परिवार आवश्यकता नियोजन के कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
(2) सरकारी स्तर पर विशेष कार्यक्रम चलाए जाने चाहिएजिनमें युवकों को स्वरोजगार हेतु प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता भी दी जानी चाहिए।
(3) ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय कृषि की उपज पर आधारित लघु उद्योगों की स्थापना की जानी चाहिए।
(4) प्रारम्भिक शिक्षा से इतर शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाया जाना अति आवश्यक है। उच्च शिक्षा को रोजगार से अवश्य ही जोड़ा जाना चाहिए
(5) सरकार को न केवल अपने कारखाने और उपक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में खोलने चाहिए बल्कि पूंजीपतियों को भी प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि वे अपने उद्योग वहाँ। स्थापित करें। बेरोजगारी की समस्या एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है, जिसके समाधान हेतु पूरे संकल्प के साथ सही दिशा में प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

 

Essay on Unemployment in Hindi – बेरोजगारी पर निबन्ध

 

प्रमुख राष्ट्रीय समस्याओं में बेरोजगारी का स्थान अव्वल नंबर पर है। सरकार ने इस समस्या को नकेल देने के लिए जितने भी प्रयास किए व नाकाफी साबित हुए हैं। असल में इस समस्या ने अनेक सामाजिक व कानूनी पहलुओं पर प्रश्नवाचक सवाल भी खड़े कर दिए हैं। बेरोजगारी के कारण युवकों में फैले आक्रोश व असंतोष ने समाज में हिंसा, तोड़फोड़, मारधाड़ व अनेक तरह के आर्थिक अपराधों को जन्म दिया है। औद्योगिकीकरण यंत्रीकरण व मौजूदा दौर में चल रही सरकार की आर्थिक उदारीकरण की नीति ने इस समस्या के स्वरूप को और भी जटिल बना दिया है।

भारत में जनसंख्या का आधिक्य, बेकारी की समस्या को जटिल बनाता है । अन्न, आवास, कपड़ेशिक्षा सभी पर जनसंख्या का प्रभाव पड़ता है। योड़ी-सी आमदनी से दर्जनों बच्चों का पालन कैसे संभव हो सकता है। जनसंख्या नियंत्रण का कार्यक्रम भारत में फेल हो चुका है। इस पर नियंत्रण पाने के लिए कई पूर्वाग्रही तथा एक सम्प्रदाय । विशेष के लोग रोड़ा अटकाते हैं और मजहब की दुहाई देकर ज्यादा बच्चे पैदा करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। स्व. संजय गांधी ने एक बार इस दिशा में सही कदम उठाया था। किन्तु दैवी दुर्घटना के कारण एक संकल्परत् युवक असमय ही काल के ग्रास में चला गया और जनसंख्या पर जो रोक लगाई जा रही थी वह कालान्तर में प्रभावहीन हो गई ।

पंचवर्षीय योजनाओं की असफलता भी बेकारी बढ़ने का एक कारण है। योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जो समयसीमा तथा लक्ष्य रखें जाते हैं, वे बहुत कम पूरे हो पाते । हैं। नतीजा यह निकलता है कि राष्ट्रीय आमदनी का एक बड़ा भाग तो शहरों को सजाने -संवारने में खर्च हो जाता है और गांवों को हम पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं करा पाते। वहां के बेचारे युवक रोजीरोटी की तलाश, बीमार मां-बाप की चिकित्सा, नवजात शिशु को मामूली-सा दूध उपलब्ध कराने की आशा में शहर भागते हैं जहां आकर वे हैवान |

उद्योगपतियों के चंगुल में पड़कर दिनरात मशक्कत करते हैं, रिक्शे चलाते हैं और जब परिश्रम करके थोड़े पैसे समेटकर गांव पहुंचते हैं तब तक वे शहर की कोई महाव्याधि टी.बी, आंत्रशोथकैंसर का शिकार बन चुके होते हैं और मर जाते हैं। मानवता के साथ यह मजाक देश में बेकारी बढ़ने के कारण किया जा रहा है। इसको रोकने का काम सरकार का है किन्तु आज सरकार बेकारी और गरीबी हटाने का नाटक तो करती है परन्तु उनकी राजनीति तो वोट बटोरने की ओर ज्यादा रहती है। विडम्बना यह है कि सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, जनसहयोग एवं सहकारिता, कुटीर उद्योगों की उपेक्षा करती है।

इनके लिए स्थिर नीति निर्धारित नहीं की जाती और प्रतिवर्ष हजारों बच्चे स्कूलकॉलेज की शिक्षा पूरी करके रोजगार केन्द्रों के चक्कर काटने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यूपीए सरकार द्वारा लागू राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून हालांकि इसी समस्या से निजात पाने के लिए लागू किया गया है परन्तु सरकार को इसका सफल क्रियान्वयन भी सुनिश्चित कराना होगा तभी तेजी से बढ़ती इस समस्या पर कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है।

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