राजनीति पर निबंध – Essay on Politics in Hindi @ 2020

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हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु Essay on Politics in Hindi पर पुरा आर्टिकल। आज हम आपके सामने Politics के बारे में कुछ जानकारी लाये है जो आपको हिंदी essay के दवारा दी जाएगी। आईये शुरू करते है Essay on Politics in Hindi

राजनीति पर निबंध – Essay on Politics in Hindi @

Essay on Politics

देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि मौजूदा राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अनेक व्यक्ति दाल में नमक की मानिंद खुल गए हैं। संसद व विधानसभाओं में ऐसे कई सांसद व विधायक हैं, जिनके खिलाफ विभिन्न अपराधों के आरोप हैं। या फिर ऐसे लोगों जिनकी पृष्ठभूमि (Background ) आपराधिक रही है। बिहार, उत्तर प्रदेश व देश के अन्य राज्यों में कई ऐसे विधायक व विधान परिषद सदस्य (एमएलसी.हैं, जो आपराधिक आरोपों की पृष्ठभूमि के बावजूद मंत्रीपद सरीखे अन्य महत्वपूर्ण पदों को ‘सुशोभितकर रहे हैं। हाल ही में ऐसे कई सांसदों व विधायकों को आजीवन कारावास तक की सजा हो चुकी है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की दृष्टि में राजनीति सेवा व लोककल्याण का एक सशक्त माध्यम है।

वे कहा करते थे कि जो लोग समाज को कुछ देना चाहते हैं, या समाज या राष्ट्र के लिए स्वार्थ लिप्सा को छोड़कर त्याग करना चाहते हैं, ऐसे निर्मल चरित्र वाले लोगों को ही राजनीति में पदार्पण करना चाहिए। किंतु आज गांधीजी की ये सारी बातें दफना दी गई हैं। आज के दौर में राजनेताओं के लिए राजनीति किसी भी कीमत पर सत्ता प्राप्ति और अपनी स्वार्थलिप्सा की पूर्णता का माध्यम बन गई है।

ऐसा नहीं है कि सभी राजनेता भ्रष्ट हैं। पर 1975 के बाद से राजनीति में जिस तरह से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का प्रवेश हुआ है और हो रहा है, वह बात गहन चिंता का विषय है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों व प्रबुद्ध व्यक्तियों का मानना है कि सन् 1975 के बाद चुनावी राजनीति में जिस तरह से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों ने शिरकत करनी शुरू की उसी का नतीजा है कि मौजूदा राजनीति अपराधीकरण की गिरफ्त में जा पहुंची। असल में राजनीति में अपराधीकरण की इस प्रवृत्ति के लिए किसी एक राजनीतिक पार्टी को दोष देना बेकार है।

कहावत है कि जैसा पानी कुएं में होगा, वही बाल्टी में आएगा। निःसंदेह 1975 के बाद देश के राजनेताओं की सोच, प्रवृत्ति व उनके दृष्टिकोण में काफी नकारात्मक बदलाव आए1947 में आजादी मिलने के बाद से लेकर कमोबेश 1975 तक राजनेता चुनाव जीतने के लिए हर तरह के हथकंडे नहीं अपनाते थे। उन्हें अपने कृतित्व व जनता के लिए किए गए सेवाकार्य पर भरोसा था।

कालांतर में राजनेताओं ने किसी भी तरह से चुनाव जीतने को ही अपना साध्य बना लिया। वोट बैंक की जातिवादी राजनीति की पृष्ठभमि में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को राजनेताओं के करीब आने का मौका मिला। वही कुछ राजनेता जिन्हें खुद पर भरोसा नहीं था) भी येनकेनप्रकारेण (By hook or by crook) चुनाव जीतने की प्रवृत्ति के आदी हो गए। मतपत्रों की लूट व मतदाताओं को डराधमका, मतदान से वंचित करने में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग काफी सहायक हो सकते थे। नतीजतन आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की सियासत में शिरकत बढ़ने लगी ।

वहीं कतिपय नेतागण भी अपने प्रतिद्वंद्वियों को सबक सिखाने या उन्हें नीचा दिखाने के लिए ऐसे लोगों का इस्तेमाल करने लगे। दूसरी ओर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले ऐसे लोगों को कतिपय राजनीतिज्ञों से संरक्षण प्राप्त हुआ। नतीजतन बेखौफ हो अपनी कारस्तानियों को अंजाम देने लगे। राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रवेश पर नकेल लगाने के लिए निर्वाचन आयोग (Election Commission) ने भी अपनी चिंता जताई है।

आयोग के दिशानिर्देश के अनुसार दोष सिद्ध (Convicted) व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य है। पर इस क्रम में सुलगता सवाल यह है कि हमारे देश में किसी आपराधिक मामले के सिद्ध होने में भी वर्षों का समय लग जाता है, तब कहीं न्यायालय अपना फैसला सुना पाते हैं। इस समस्या के समाधान में राजनीतिक दलों को पहल करनी चाहिए।

यदि सभी राजनीतिक दल यह तय कर लें कि उन्हें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को चुनाव में टिकट नहीं देना है, तो इस समस्या का हल सहजता से निकल सकता है। इसी तरह जनता को भी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनाव में वोट नहीं देने चाहिए।

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राजनीति पर निबंध

भारतीय राजनीति बहुत सारी पार्टियों की कार्यप्रणाली है। हमारे अलग-अलग सांस्कृतिक और सामाजिक ढाँचे हैं। धर्म अक्सर हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के ऊपर राज करते हैं। धर्मों को अफीम जनता स्वयं के अन्दर भरती है और वह धर्म के नाम पर कोई। भी कार्य करने के लिए तैयार हैं।

सात और सत्तर के दशक के बुद्धिमान राजनेता ने धर्म को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया और इस तरह धर्म का तूफान, राजनैतिक रूप में जोर-शोर से बदल गया और आज अलगाव है कि हमारा राजनीतिक तरीका विशेषकर धार्मिक, यांत्रिक प्रणाली में कार्य कर रहा है।

धर्म ने हमारी जिंदगी को राह दिखाना बंद कर दिया है (ताकि हम एक बेहतर इंसान, पड़ोसी या जाति बन सकें) और अब यह राजनैतिक कौशल का माध्यम बन गया है। ताकि हम संसद के सदस्य, संवैधानिक गुट के सदस्य, राजाओं को बनाने वाले और गरीब जनता के मसीहा बन जाएं ताकि हम अपने बुरे अंत तक पहुँच पाएं। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद जातिवाद के जोर से और बहुत बड़े पैमाने पर दंगों की वजह से गिराई गई।

इसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दुओं ने उसे राम जन्मभूमि कहा जिससे मुसलमानों को दुख पहुँचा। मुसलमानों ने उसे ‘बाबरी मस्जिद’ कहा जिससे हिन्दुओं को दुःख पहुँचा।

इससे दंगे उत्पन्न हुए, जिसमें बहुत से लोगों की जानें गयीं। आगे चलकर गुजरात में मासूम ईसाइयों का संहार (जो दलित हिंदुओं से परिवर्तित हुए थे), फरवरी 1999 के दौरान ऑस्ट्रेलियन ईसाई ग्राह्म स्टीइन को अपने दो बेटों के साथ उड़ीसा में जिंदा जला दिया गया। जातिवाद की ऐसी स्थिति एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए सही नहीं है।

जनता इस तरह की धार्मिक लड़ाईयों को कम कर सकती है। यदि वह जातिवाद की चिंता कम करे और राजनेताओं की चालों को पहचान पाएं तो वह बहुत सारी जिंदगियों और माल के नुकसान को बचा सकते हैं।

उदाहरण के लिए एक गाँव का किसान जातिवाद के मामले से ज्यादा परेशान हो जाएगा एक शहरी व्यक्ति के मुकाबले, जिसके लिए यह देश के आम मसलें हैं। इसलिए हम इससे यह निष्कर्ष ले सकते हैं कि गांव के लोगों को जातिवाद और धार्मिक मद्दों पर आसानी से बहकाया जा सकता है।

शहर की जनता काफी व्यस्क होती है वह इन मुद्दों को अपने व्यवसाय, परिवारों और राष्ट्रीयता में भूल जाते हैं। इसलिए एन.जी.ओ.. राज्य, सामाजिक कार्यकर्ता और मीडिया को सबसे पहले गाँवों की जनसंख्या को शिक्षित करना चाहिए, यह एक कठिन प्रयास है जिसको राष्ट्रीय पैमाने पर चलाना होगा, ताकि भविष्य में होने वाले खून-खराबे को रोका जाए।

6 दिसंबर, 1998 का दिन भारत में शांतिपूर्ण तरीके से बीता। हमे भविष्य में होने वाली हिंसा को गाँवों के लोगों को शिक्षित करके रोक सकते हैं। राष्ट्रीय एकीकरण अभियान नाजुक मुद्दों को सुलझा सकते हैं।

जातिवाद को भारतीय राजनीतिक घटनाओं से अलग नहीं किया जा सूलता। भारतीय धर्म के | बिना राजनीति के लिए पूरे रूप से तैयार नहीं है। जबकि पचास सालों के काल में इस स्थिति | का बदलना संभव है क्योंकि जनता धीरे-धीरे साक्षर, जागरूक और समृद्ध होती जा रही है। जनता राष्ट्र को बनाती है न कि धार्मिक शक्तियाँ। एक समय ऐसा आएगा जब राष्ट्रीयता नया धर्म होगा (जैसा जापान में हुआ था) और धार्मिक प्रभाव हमारे घर के कमरे से बाहर नहीं फैल पाएगा। हम उस स्वर्णिम युग का इंतजार कर रहे हैं।

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राजनीति पर निबंध

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की दृष्टि में राजनीति, सेवा व लोककल्याण का एक सशक्त माध्यम है। वे कहा करते थे कि जो लोग समाज को कुछ देना चाहते हैं या समाज या राष्ट्र के लिए स्वार्थ लिप्सा को छोड़कर त्याग करना चाहते हैं, ऐसे निर्मल चरित्र वाले लोगों को ही राजनीति में पदार्पण करना चाहिए किंतु आज गांधीजी की ये सारी बातें दफना दी गई हैं। आज के दौर में राजनेताओं के लिए राजनीति किसी भी कीमत पर सत्ता प्राप्ति और अपनी स्वार्थलिप्सा की पूर्णता का माध्यम बन गई है। ऐसा नहीं है कि सभी राजनेता भ्रष्ट हैं पर 1975 के बाद से राजनीति में जिस तरह से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का प्रवेश हुआ है और हो रहा है, वह बात गहन चिंता का विषय है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों व प्रबुद्ध व्यक्तियों का मानना है कि सन् 1975 के बाद चुनावी राजनीति में जिस तरह से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों ने शिरकत करनी शुरू की उसी का नतीजा है कि मौजूदा राजनीति अपराधीकरण की गिरफ्त में जा पहुंची।

असल में राजनीति में अपराधीकरण की इस प्रवृत्ति के लिए किसी एक राजनीतिक पार्टी को दोष देना बेकार है। कहावत है कि जैसा पानी कुएं में होगा, वही बाल्टी में आएगा। निःसंदेह 1975 के बाद देश के राजनेताओं की सोच, प्रवृत्ति व उनके दृष्टिकोण में काफी नकारात्मक बदलाव आए।

1947 में आजादी मिलने के बाद से लेकर कमोबेश 1975 तक राजनेता चुनाव जीतने के लिए हर तरह के हथकंडे नहीं अपनाते थे। उन्हें अपने कृतित्व व जनता के लिए किए गए सेवा-कार्य पर भरोसा था।

कालांतर में राजनेताओं ने किसी भी तरह से चुनाव जीतने को ही अपना साध्य बना लिया। वोट बैंक की जातिवादी राजनीति की पृष्ठभमि में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को राजनेताओं के करीब आने का मौका मिला। वहीं कुछ राजनेता (जिन्हें खुद पर भरोसा नहीं था) भी येन-केन-प्रकारेण (By hook or by crook) चुनाव जीतने की प्रवृत्ति के आदी हो गए।

मतपत्रों की लूट व मतदाताओं को डरा-धमका, मतदान से वंचित करने  में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग काफी सहायक हो सकते थे। नतीजतन आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की सियासत में शिरकत बढ़ने लगी।

राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के प्रवेश पर नकेल लगाने के लिए निर्वाचन आयोग (Election Commission) ने भी अपनी चिंता जताई है। आयोग के दिशा-निर्देश के अनुसार दोष सिद्ध (Convicted) व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य है पर इस क्रम में सुलगता सवाल यह है कि हमारे देश में किसी आपराधिक मामले के सिद्ध होने में भी वर्षों का समय लग जाता है तब कहीं न्यायालय अपना फैसला सुना पाती है।

इस समस्या के समाधान में राजनीतिक दलों को पहल करनी चाहिए। यदि सभी राजनीतिक दल यह तय कर लें कि उन्हें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को चुनाव में टिकट नहीं देना है तो इस समस्या का हल सहजता से निकल सकता है। इसी तरह जनता को भी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनाव में वोट नहीं देने चाहिए।

 

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Written by

Romi Sharma

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