भारत (इंडिया) पर निबंध Essay on india in Hindi

हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु Essay on india in Hindi पर पुरा आर्टिकल। भारत देश दुनिया का सबसे अलग है जो अपनी संस्कृति के पूरी दुनिया जाता है। आज के essay में आपको india के बारे में बहुत बातें पता चलेंगे तो अगर आप अपने बच्चे के लिए Essay on india in Hindi में ढूंढ रहे है तो हम आपके लिए india पर लाये है जो आपको बहुत अच्छा लगेगा। आईये पढ़ते है Essay on india in Hindi 

 

भारत (इंडिया) पर निबंध Essay on India in Hindi

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दिल्ली भारत की राजधानी है । इसके पुराने नाम हैं इन्द्रप्रस्थ तुगलकाबाद आदि। यह बहुत पुरानी नगरी है, जो कई बार उजड़ी और कई बार बसी है । पहले पाण्डव यहां के शासक थे। फिर चौहान वंश के राजा पृथ्वीराज ने यहाँ राज्य किया। फिर पठान शासकों का राज्य रहा। उनके बनाये किलेकुतुबमीनार, मकबरे आदि अब भी उनकी याद दिलाते हैं । मुगलकाल में दिल्ली की बहुत उन्नति हुई । अकबर के पोते और जहांगीर के पुत्र शाहजहाँ ने यहाँ जामा मस्जिद और लालकिले का निर्माण कराया। ये आज भी ज्यों-के-त्यों खड़े हैं, जैसे अभीअभी बनाए गये हों । दिल्ली में देखने योग्य स्थान बहुत हैं । पुराना किला कुतुबमीमार लालकिला, गौरीशंकर मन्दिरगुरुद्वारा सीसगंज लक्ष्मी नारायण मन्दिर (बिरला मन्दिर) आदि देखने ही योग्य हैं । इनके अतिरिक्त चिड़ियाघर, अजायबघर, जन्तर मन्तर आदि भी देखने योग्य हैं । बागों में रोशनारा बाग, कम्पनी बाग, ताल कटोरा गार्डनलोदी बागबुद्ध विहार (बुद्धा गार्डन) आदि भी दर्शनीय हैं।

चाँदनी चौक, खारी बावलीकनॉट प्लेसराजेन्द्र प्लेस नेहरू प्लेस, करोल बाग, सदर बाजार आदि यहाँ के मुख्य बाजार हैं । यहाँ स्वतन्त्रता (१९४७) के बाद बीसियों नयी बस्तियां बसाई गई हैं जैसे राजेन्द्र नगरपटेल नगरमोती नगरकीतिनगर, रमेशनगरराजोरी गार्डन, तिलक नगर, मालवीय नगर, वसन्त विहार, सुन्दर नगरकिदवई नगर आदिआदि। जनकपुरी यहाँ की नयी और सबसे बड़ी बस्ती नयी दिल्ली अंग्रेजों के राज्य में बनी थी। केन्द्रीय सचिवालय, संसद भवन तथा राष्ट्रपति भवन नयी दिल्ली में ही हैं। नयी दिल्ली में अनेक भवन कईकई मंजिलों के हैं, जो देखते ही बनते हैं। दिल्ली रेलों का, व्यापार का और शिक्षा का बहुत बड़ा केन्द्र है। दिल्ली संसार के सबसे बड़े जनतन्त्र भारत की राजधानी है ।

भारत (इंडिया) पर निबंध Essay on India in Hindi

1947 में ब्रिटिश शासन से आजादी प्राप्ति के बाद आधी शताब्दी से भी अधिक समय बीत चुका है। परन्तु हमने इतने वर्षों में क्या खोया या पाया, आइये इसका आकलन करें। पिछले 63 वर्षों में भारत में गरीबी घटी है लेकिन अभी भी लगभग 25 प्रतिशत लोग काफी दयनीय अवस्था में जीवन-यापन कर रहें हैं। उनको भूख के अलावा मूलभूत सुविधाओंस्वास्थ्य सम्बन्धी सेवाओं और नौकरियों के अभाव का सामना करना पड़ता है। मध्यवर्गीय परिवारों की स्थिति कुछ विशेष रूप से भिन्न नहीं है। धनाढय वर्ग का कारोबार व प्रभुत्व बढ़ा है। परन्तु ये परिवार देश की कुल जनसंख्या का केवल 20 प्रतिशत है।

 

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आजादी के बाद हमने मूलभूत उद्योगों, कृषि, कपड़ा व टैक्सटाइलयातायात और दूरसंचार के क्षेत्रों में बहुत उन्नति की है। खाद्यान्न के मामले में हम बिल्कुल आत्मनिर्भर हो चुके हैं। हम हर प्रकार की वस्तु व सेवा का देश में उत्पादन कर रहे हैं। फलस्वरूप हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की पांच प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक हो गई है। पेट्रोलियम पदार्थों के क्षेत्र में हम विदेशी स्रोतों पर आंशिक रूप से निर्भर हैं। इसके अलावा हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की उन्मुक्त बाजार प्रणाली से सामंजस्य बिठा चुकी है।

भारत अब अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राओं के समक्ष स्वतंत्र रूप से अपने रुपये का आदानप्रदान कर रहा है। हमारे निर्यात व आयात भी बढ़ रहे हैं। परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अभी तक कुल मिला कर घाटा ही चल रहा है क्योंकि आयात के आंकड़े निर्यात के आंकड़ों से अधिक हैं। सामाजिक व आर्थिक स्तरों पर हमारे देश में प्रगति हुई है। परन्तु युवा मुख्य मार्ग से भटक कर सिनेमा, इन्टरनैट, नशीली दवाओं और उन्मुक्त जीवन की व्याधियों के शिकार हो गये हैं। कुछ छात्र अपने जीवन के ध्येय निर्धारित करते हैं और सफल भी होते हैं। कारोबार बढ़ने से उद्योगों की उत्पादकता व संख्या में वृद्धि हुई है। परन्तु बेरोजगारों की संख्या भी बढ़ी है।

नैतिक मूल्यों का ह्रास भारत में सत्तर के दशक में ही आरम्भ हो गया था। अब हम सब पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे जा चुके हैं। विदेशी पहनावा, भाषायें तथा खानपान हमें आधुनिक लगते हैं। हमारे पूर्वजों की देन हमें याद नहीं रह गई है और डिस्को, मद्यपान नशा, तेज रफ्तार से चलने वाला जीवन व आपसी मनमुटाव हमारे जीवन के अभिन्न अंग बन कर रह गये हैं। सबसे अधिक हमने अपना राष्ट्रीय चरित्र खो दिया है जिससे समाज में अनाचार तथा भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई है। आज हमारे आचारविचार, सदाचार, आदर्श और मानवीयता की नाव मंझधार में फंस कर डूबने को तैयार है।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। हमारी भावनाओं इच्छाओं तथा गतिविधियों का आदर पूरे विश्व में होता है। कश्मीर समस्या व चीन के साथ सम्बन्ध दो मुद्दे हैं जिनके परिपेक्ष्य में भारत को कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कुल मिला कर भारत की स्वतंत्रता के 62 वर्षों में हमने प्रगति की है। परन्तु और प्रगति की आवश्यकता है ताकि भारत विश्व का अग्रणी राष्ट्र बन सके।

 

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भारतवर्ष की वर्तमान परिस्थितियों में भावात्मक एकता का विषय बहुत महत्त्व रखता है। यह विषय एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में देश के शुभचिंतकों और देशभक्तों का ध्यान प्रबल रूप में आकर्षित कर रहा है । प्रत्यक्ष में यह बात कही जा रही है कि देश का भविष्यउसकी सभी योजनाओं की सफलता और भावी पीढ़ी की सुखसमृद्धि उसके नागरिकों की भावात्मक एकता पर निर्भर है। भावात्मक एकता का तात्पर्य है प्रत्येक भारतीय यह अनुभव करे कि भारतभूमि उसकी मातृभूमि है।

यहाँ के प्रत्येक नागरिक का हित उसका अपना हित है। भारतभूमिइसकी नदियोंपर्वतों, पशु-पक्षियों और निवासियों के प्रति, यहाँ के इतिहासपरंपरासंस्कृति तथा सभ्यता के प्रति प्रत्येक भारतवासी का पूज्य भाव हो—यही भावात्मक एकता है। अतीत काल से हमारा देश एक भौगोलिक इकाई रहा है, किंतु उसमें राजनीतिक या प्रशासनिक एकता की भावना अंग्रेजों के पूर्व कभी नहीं आ पाई।

इस दिशा में अशोक, समुद्रगुप्तचंद्रगुप्त, अकबर जैसे महान् सम्राटों के प्रांत भी केवल अंशतसफल रहे। प्राचीन और मध्यकाल में देश अनेक राजनीतिक और प्रशासनिक इकाइयों में विभक्त था, फिर भी यह बात सर्वमान्य है कि समस्त भारतीय जीवन एक प्रकार की एकता के सूत्र में आबद्ध था। जीवन की बाह्य विभिन्नताओं और असमानताओं के अंतराल में भावात्मक, रागात्मक और सांस्कृतिक एकता की मंदाकिनी प्रवाहित होती रहती थी। अंग्रेजी शासन काल में ही सर्वप्रथम इतने व्यापक स्तर पर देश में राजनीतिक और प्रशासनिक एकता स्थापित हुई और उत्तराधिकार के रूप में यह स्वतंत्र भारत को भी प्राप्त हुई।

 

कुछ वर्षों से यह अनुभव किया जाने लगा है कि भावात्मक एकता के अभाव में देश की राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक एकता को दृढ़ बनाना अत्यंत कठिन है। कितनी विचित्र स्थिति है, जब देश में राजनीतिक एकता नहीं थी तब भावात्मक एकता का अभाव नहीं था और जब देश में शताब्दियों के पश्चात् स्वतंत्रता के साथ राजनीतिक एकता स्थापित हुई तब भावात्मक एकता की सरिता सूख चली। महात्मा गांधी ने बहुत पहले देश के विभिन्न वर्गों के बीच बढ़ती इस संकुचित प्रवृत्ति को लक्ष्य करते हुए ही कहा था-‘कैसा विचित्र समय आता जा रहा है कि पंजाबी केवल पंजाब के हित की बात करता है; बंगाली बंगाल के हित की तथा मद्रासी मद्रास के हित की, पर समूचे देश के हित की बात कोई नहीं करता।

यदि पंजाब पंजाबियों का है, बंगाल बंगालियों का है, मद्रास मद्रासियों का है तो फिर भारत किसका है ?” महात्मा गांधी ने प्रांतीयता सांप्रदायिकताजातीयता, धार्मिकता तथा असहिष्णुता की जिन संकीर्ण मनोवृत्तियों पर चिंता प्रकट की थी, वे मनोवृत्तियाँ आज देशव्यापी बनकर विविध रूपों में प्रकट हो रही हैं, जिनके कारण देश का भविष्य ही संकट में पड़ गया है। वह जातिवाद, भाषावाद क्षेत्रवाद और जाने कितने अन्य ‘वादों’ के जंजाल में फंसकर किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो रहा है।

पश्चिम में पंजाबी सूबे की माँग पर कितना भयंकर विवाद चला और अंत में वह बनकर ही रहा। दक्षिण में मद्रास राज्य का हिंदी-विरोधी आंदोलन भी उग्र रहा जिसका परिणाम तमिलनाडु के रूप में आज हमारे सामने है। हाल ही में बने तीन नए राज्यों उत्तराखंडझारखंड और छत्तीसगढ़ के आंदोलनों को तो हम सभी ने देखा है। विदर्भ हरित प्रदेश, बोडोलैंडभोजपुरी अंचलमिथिलांचल आदि की माँगों को लेकर समय समय पर रक्तिम क्रांतियाँ होती रही हैं।

राजनीतिक दलों का जन्म तो बरसाती मेढकों की तरह होता रहा है। प्रत्येक दल और संगठन अपने-अपने रंगमंच से देश की एकता की दुहाई देता है, पर अधिकार हस्तगत करने के लिए वह नीचता और क्षुद्रता का मार्ग अपनाने में लेशमात्र भी नहीं हिचकता। हमारे सार्वजनिक जीवन से जिस प्रकार ईमानदारी, नैतिकता और सत्यनिष्ठा कूच कर गई हैं, उसी प्रकार हमारे मनों से जननी जन्मभूमि के प्रति अनुरागश्रद्धा और भक्ति की भावना भी किनारा करती जा रही है।

यही वह भावना है, जो किसी देश के नागरिकों में परस्पर प्रेमसहानुभूति, विश्वास और एकता का बीजारोपण करती है जिस देश के नागरिकों में उनकी जन्मभूमि की एक समूची प्रतिमा अपने समस्त प्राकृतिक वैभवशस्य-संपदा और जनसंकुल समाज-संपत्ति के साथ सदैव नेत्रों के सामने रहती है, उस देश के नागरिक अपने को एक भाव-सूत्र में गुंथा हुआ अनुभव करते हैं। और वही देश भावात्मक दृष्टि से दृढ़ आधार पर संगठित हो पाता है। भावात्मक एकता का मूलाधार है कि हम अपने देश और उसके विधायी तत्वों के प्रति प्रेमसहानुभूति और लगाव अनुभव करें। भारत में यह आधार विभिन्न कारणों से दुर्बल और अशक्त हो गया है। इस समय एक समस्या के रूप में अथवा एक चुनौती के रूप में उनके कारणों को स्वीकार कर देश एक बार फिर भावात्मक एकता के मूल आधार को शक्तिशाली बनाने के लिए प्रतिषेत हुआ है।

अब तक इस दिशा में अनेक महत्वपूर्ण प्रयत्न हो चुके हैं तथा अखिल भारतीय स्तर पर अनेक निश्चय किए जा चुके हैं, उनमें से कुछ कार्यान्वित भी हो चुके हैं और कुछ का क्रियान्वयन होना अभी तक शेष है। देश में भावात्मक एकता की उत्पत्ति और उन्नयन के लिए भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय का ध्यान सबसे पहले विद्यार्थियों पर गयाकिसी देश का भविष्य उसके विद्यार्थियों पर ही निर्भर करता है। वहाँ के विद्यार्थियों में यदि भावात्मक एकता का बीजारोपण हो जाए, तो उस देश का भविष्य सुनिश्चित हो जाता है, क्योंकि देश का नेतृत्व अंतत: उन्हीं के हाथों में जाना है।

इधर विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता सरकार के समक्ष एक विचारणीय प्रश्न बनकर आ खड़ी हुई है। इस विषय पर अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने विभिन्न मत प्रकट किए हैं। विद्यार्थियों में भावात्मक एकता को दृढ़ करने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एक आयोग गठित किया। इसके कुछ वर्षों पूर्व इसी प्रकार ‘संपूर्णानंद समिति’ ने सारी परिस्थिति का बारीकी से अध्ययन करके अनेक उपयोगी सुझाव प्रस्तुत किए थे, जिन्हें राज्य सरकारों ने स्वीकार भी कर लिया था।

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अभी संसार में सभ्यता का सूर्योदय भी नहीं हुआ था, जब भारत के ऋषि वेदों की रचना कर रहे थे। ऋषिमुनियों ने सर्वप्रथम ज्ञान का प्रकाश देकर विश्व के मनुष्य को जीवन का पथ दिखाया था। उपनिषदों के ज्ञान से मानवता को नया दर्शन मिला था। जिस देश में गंगा बहती है, वही भारतवर्ष मेरा देश है। उत्तर में संसार का सबसे ऊँचा पर्वत हिमालय अपनी रुपहली चोटियों के साथ हीरे और चाँदी के श्वेत मुकुट के समान इसके मस्तक की शोभा बढ़ा रहा है । गंगायमुना, ब्रह्मपुत्रसिन्धु जैसी नदियाँ इसके गले में मोतियों की माला की तरह शोभा देती हैं।

हिन्द महासागर की शीत लहरें प्रतिक्षण इसके चरण कमलों को धोकर प्रशंसा के मधुर गीत गाया करती हैं । बद्रीनाथ केदारनाथ, जगन्नाथपुरीगया, वाराणसी, प्रयाग, द्वारका, रामेश्वरम जैसे महान और पवित्र तीर्थस्थान इसके अंक में बसे हुए हैं, वही भारत मेरा देश है।

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प्रकृति का समस्त सौन्दर्य जिस देश की स्थायी सम्पत्ति है. पृथ्वी का स्वर्ग कश्मीर जिसे केसर के फूल भेंट करता है, संसार का आठवाँ आश्चर्य ताजमहल जिसकी कला का विज्ञापन विश्वभर में किया करता है, अजन्ता और ऐलोरा की विख्यात गुफाएँ जिसके अतीव गौरव को संजोए हुए हैं, महाराष्ट्र की भूमि, राजस्थान का इतिहास, बंगाल और पंजाब की वीर गाथाएँ जिसकी स्वतन्त्रता की साक्षी हैं वही मेरा देश है

कुरुक्षेत्र, अयोध्या, मथुरानालन्दा, लखनऊ, दिल्ली जैसी नगरियों में जिसकी विविध पुण्यस्मृतियाँ आज भी जीती-जागती हैं, वही राम, कृष्ण, बुद्ध और नानक की जन्मभूमि मेरा देश भारतवर्ष को जगद्गुरु की उपाधि मिली थी। इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था।

संसार के कोनेकोने से विद्यार्थी यहाँ विद्या ग्रहण करते थे। अशोक, विक्रमादित्य, हर्ष, स्कंदगुप्त जैसे चक्रवर्ती सम्राट् इसके रक्षक थे। वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास, सूरदास आदि महाकवियों ने इसी का अन्नजल खाकर विश्व के अमर साहित्य की रचना की थी। राणा प्रताप और शिवाजी ने इसकी मान-मर्यादा के लिए जीवनभर तपस्या की थी। लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे से लेकर तिलक, गांधी, सुभाष और नेहरू जैसे वीर सपूतों ने जिसको विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए स्वतन्त्रता संग्राम में अपना तन, मनधन न्योछावर कर दिया, मैं उसी देश का वासी हैं।

आज मेरा भारतवर्ष विश्व का एक विशाल प्रजातन्त्रात्मक गणराज्य है । यह देश विकास की सीढ़ी पर धीरे धीरे परन्तु दृढ़ता के साथ आगे बढ़ता ही जा रहा है ।

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