Essay on importance of Fair – मेलों का महत्व पर निबंध

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हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु Essay on importance of Fair in Hindi पर पुरा आर्टिकल। आज हम आपके सामने Politics के बारे में कुछ जानकारी लाये है जो आपको हिंदी essay के दवारा दी जाएगी। आईये शुरू करते है Essay on different type Fair in Hindi

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मेलों का महत्व (मेरा मनपसन्द मेला)

मेले हमारे सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं। ये जीवन की एकसरता को समाप्त करके जीवन में प्रसन्नता भर देते हैं। अन्य लोगों से मिलने का तथा अपनी संस्कृति को पहचानने का ये मेले सुअवसर प्रदान करते हैं। भारत में तो हर वर्ष कितने ही मेलों का आयोजन होता रहता है। लेकिन मैं जिस मेले का पूरे वर्ष इंतजार करता हूँ वह है मेरे घर के पास ही लगने वाला दशहरे का मेला। इस बार भी यह मेला बहुत आनंददायक था।

रामलीला के साथ मैंने तरह-तरह के झूलों का भी आनंद उठाया। मेरा भाई भी झूलों का खूब आनंद ले रहा था। इस बार मेले का मुख्य आकर्षण के केन्द्र थे-कुछ व्यक्ति जो शिवजी, रामजी, लक्ष्मण जी, हनुमान जी आदि का वेश बनाए मूर्तिवत् खड़े थे।

हर व्यक्ति उन्हें देखकर दंग सा रह जाता था और बिना पलक झपके एकटक निहारता रहता था। कुछ लोग तो उन्हें छूकर भी देख रहे थे कि वे आदमी हैं या मूर्तियाँ। पुरानी दिल्ली के मशहूर हलवाइयों ने खाने-पीने की दुकाने सजायी थीं। खाने की चीजों से इतनी बढ़िया खूशबू आ रही थी कि पैर उसी ओर चले जा रहे थे।

हमने खूब खाया, खूब झूले झूले तथा रामलीला का भी पूरा आनंद उठाया। उस मेले में मेरे कई मित्र भी मिल गए थे। साथ-साथ घूमने में खूब आनंद आया। वास्तव में वह मेला मेरे लिए अविस्मरणीय था। मैं फिर से उस मेले की प्रतीक्षा में हूँ।

 

एक मेले का दृश्य

प्रत्येक वर्ष हमारे गांव के पास एक मेला लगता है। वार्षिक पशु प्रदर्शनी के अवसर पर यह मेला आयोजित किया जाता है। पशु प्रदर्शनी पूर्ण पंजाब राज्य की ओर से आयोजित की जाती है। इस मेले में पंजाब के प्रत्येक कोने से मालिकों द्वारा अपने पशु लाये जाते हैं। सर्वोतम नस्ल के पशु वहां लाये जाते है। लोग बहुत बड़ी संख्या में पशुओं की विभिन्न नस्लों को देखने मेला स्थल पर आते हैं। गाय, भैसें, बैल, सांड एवं अन्य पशु उनके मालिकों द्वारा वहां लाये जाते हैं।

चूंकि इस मेले में सभी पड़ोसी गांवों एवं राज्यों के लोग आते हैं इसलिये लोगों के उपयोग का अन्य सामान भी यहां पर प्रदर्शित किया जाता है। मैंने वहाँ बहुत कुछ देखा। वहां पर एक बाज़ार लगा हुआ था जिसमें दुकानदार दैनिक प्रयोग की कई वस्तु बेच रहे थे। एक ओर एक मदारी बैठा था। वह अपने करतब से लोगों का मनोरंजन कर रहा था। उसके करतब बहुत रोमांचक थे। उसका व्यवहार विचित्र, आश्चर्य जनक एवं साहसिक था एक बार तो उसने एक छोटे बच्चे का पेट काट दिया। जिससे वहां उपस्थित सभी दर्शक सन्न रह गये।

वहां से आगे जाने पर मैंने गोल वाला झूला देखा। जिसपर । बहुत से बच्चे, पुरुष और स्त्रियां झूलने का आनंद उठा रहे थे।  उस झूले पर लोगों की बहुत भीड़ एकत्रित थी।

दूसरी ओर दंगल बाजी का प्रबंध किया गया था। पड़ोस – के स्थानों के जाने पहचाने पहलवान वहां कुश्ती में हिस्सा लेने  आये हुये थे। उन्हें एक दूसरे के साथ जूझते, दांवपेच करते देखने  का अपना एक अलग आनंद है। थोड़ी देर यह देखने के बाद मैं आगे बढ़ा। दूर से मैंने कुछ लोगों को घेरा बना के खड़े देखा। पास जाने पर ज्ञात हुआ कि वहां एक सपेरा है जिसे देखने के लिये भीड़ एकत्रित हुई है। सपेरा अपनी बीन बजा रहा था जिससे बहुत मधुर धुन बज रही थी। उसकी बीन की धुन पर सामने एक सांप नाच रहा था। ऐसा लगता था जैसे सांप उस आवाज के वशीभूत हो गया है। यह एक मनोहारी दृश्य था जो सभी लोगों  को अच्छा लगा।

मेले का आयोजन बड़े स्तर पर किया गया था। बहुत से लागअपन खरादन आरबचन 3 य को अपने पशुओं के बहुत अच्छे मूल्य प्राप्त हुये। कई किसान बहुत अच्छी नस्लों के बैल लेकर आये थे। पशु बहुत अच्छे ढंग से व्यवस्थित किये गये थे। मेले में आने वाला हर व्यक्ति कुछ न कुछ खरीद रहा था। कुछ अपंग एवं लंगड़े लाचार लोग भीख मांग रहे थे। लोग उन्हें एक दो रुपये दान में दे रहे थे। बहुत से साधु भी मेला देखने आये हुये थे। यह साधु बहुत से मंत्री एवं धार्मिक गीतों का उच्चारण कर रहे थे। कुछ साधु प्रवचन दे रहे थे। धार्मिक प्रवृति के लोग उनके आस-पास बैठ कर बहुत ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।

मैंने इस मेले में भरपूर आनंद उठाया। मेरे लिये यह एक रोमांचक अनुभव था। मानव समुन्द्र जैसे उमड़ा पड़ा था। सांय-काल होते-होते भीड़ कम होने लगी। पूरे मेले का चक्कर लगाने के पश्चात् सायं काल में भी अपने घर की ओर चल पड़ा। मुझे बहुत थकावट महसूस हो रही थी किन्तु इस नये अनुभव ने मुझे रोमांचित कर दिया।

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प्रदर्शनी की सैर

मुझे प्रदर्शनियाँ देखना बहुत अच्छा लगता है। प्रदर्शनियां कई प्रकार की होती हैं। कुछ महीने पहले प्रगति मैदान में मैंने जो प्रदर्शनी देखी उससे मैं बहुत प्रभावित हुआ। इस प्रदर्शनी में बहुत प्रकार के सामान प्रदर्शित किये गये थे। किन्तु मुख्यतया यह पुस्तकों, पेंटिग, चिकनी मिट्टी के माडल एवं लेखाचित्रों की प्रदर्शनी थी। प्रगति मैदान के सभी हॉल प्रदर्शित समान से भरे हुये थे।

जैसे ही मैं मुख्य द्वार से अन्दर घुसा मैंने चिकनी मिट्टी (क्ले) से बनी एक बड़ी मूर्ति देखी। मेरे लिये तो यह कला का एक अदभुत नमूना थी। तत्पश्चात् मैं एक अन्य हॉल में गया जिसमें पुस्तकें ही पुस्तकें रखी गयी थी। यहाँ लगभग सभी विषयों की पुस्तकें थीं। विज्ञान, तकनीकि, एवं अभियान्त्रिकी (इन्जीनियरिंग) की पुस्तकें एक ओर थीं। इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र एवं साहित्य इत्यादि विषयों की पुस्तकें दूसरी ओर रखी गयी थीं। विज्ञान एवं मानविकी विषयों की सभी शाखाओं की बहुत सारी पुस्तकें वहां प्रदर्शित थीं। प्रसिद्ध साहित्यकार शेक्सपियर की कृतियों ने लोगों को बहुत बड़ी संख्या में आकर्षित किया।

उसकी कृतियां मेकवेथ, हेमलेट एवं ओथेलो को बहत बिक्री हई। जिस हॉल में क्ले (चिकनी मिट्टी) के माडल प्रर्दशित किये गये थे वह लोगों के आर्कषण के केन्द्र बने हुये थे। चिकनी मिट्टी के इन माडलों में घड़े, केतलियां, गिलास, तश्तरियों के अतिरिक्त पुरुष एवं स्त्रियों की आकृतियों के माडल भी थे। यह मॉडल बहुत सुन्दर लग रहे थे। बच्चों को यह क्ले मॉडल के खिलौने बहुत पसन्द आ रहे थे।

इस प्रदर्शनी से मेरे ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। बहुत सी प्रदर्शित वस्तुओं को देखकर मैं बहुत प्रभावित हुआ। यह प्रदर्शनी 15 दिन चली। इसने लाखों दर्शकों को आकर्षित किया। यह प्रदर्शनी अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की गयी थी। बहुत से  देशों जैसे अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जपान, नेपाल एवं श्रीलंका इत्यादि ने इसमें भाग लिया। उन्होंने विज्ञान एवं मानविकी से सम्बन्धित अपनी पूर्ण सामर्थ्य का प्रदर्शन किया। उनके कुछ अच्छे कलाकार एवं चित्रकार भी इस प्रदर्शनी में मौजूद थे। इस प्रदर्शनी ने मेरे मस्तिष्क पर एक अच्छी छाप छोड़ी।

एक मेले का वर्णन (Visiting a Fair)

हमारे शहर में प्रतिवर्ष 26 जनवरी के अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता है। मेला गाँधी मैदान में लगता है जिसे देखने शहर के नागरिकों के अलावा निकटवर्ती गाँवों और कस्बों के लोग बड़ी संख्या में आते हैं।

मैं भी अपने माता-पिता के साथ संध्या चार बजे मेला देखने गया। वहाँ खचाखच  भीड़ थी। मुख्य मार्गों पर तो तिल रखने की जगह भी नहीं थी। लोग धक्का-मुक्की  करते आपस में टकराते चल रहे थे। हम लोगों ने भी भीड़ का अनुसरण किया। भीतर तरह-तरह की दुकानें थीं। मिठाई, चाट, छोले, भेलपुरी तथा खाने-पीने की तरह-तरह की दुकानों में भी अच्छी-खासी भीड़ थी। तरह-तरह के आकर्षक खिलौने बेचने वाले  भी कम नहीं थे।

गुब्बारे वाला बड़े-बड़े रंग-बिरंगे गुब्बारे फुलाकर बच्चों को आकर्षित कर रहा था। कुछ दुकानदार घर-गृहस्थी का सामान बेच रहे थे। मुरली वाला, सीटी वाला, आईसक्रीम वाला और चने वाला अपने-अपने ढंग से ग्राहकों को लुभा रहा था। हम मेले का दृश्य देखते आगे बढ़े जा रहे थे। देखा तो कई प्रकार के झूले हमारा इंतज़ार कर रहे थे। पिताजी ने मुझे झूले की टिकटें लेने के लिए पैसे दिए।

कुछ ही मिनटों में हम आसमान से बातें करने लगे। डर भी लग रहा था और मजा भी आ रहा था। ऊपर से नीचे आते समय शरीर भारहीन-सा लग रहा था। पंद्रह चक्करों के बाद  झूले की गति थमी, हम बारी-बारी से उतर गए।

दाएँ मुड़े तो जादू का खेल दिखाया जा रहा था। बाहर जादूघर के कर्मचारी शेर, बिल्ली, जोकर आदि का मुखड़ा पहने ग्राहकों को लुभा रहे थे। टिकट लेने के लिए लाइन लगी थी। हम भी लाइन में खड़े हो गए। टिकट दिखाकर भीतर प्रवेश किया। बड़ा ही अद्भुत जादू का खेल था।

जादूगर ने अपने थैले में कबूतर भरा और भीतर से खरगोश निकाला। उसके कई खेल तो मुझे हाथ की सफ़ाई लगे। कई खेलों में मैंने उसकी चालाकी पकड़ ली। पर एक-दो करतब सचमुच जादुई लगे। जादूगर ने दर्शकों की वाहवाही और तालियाँ बटोरीं।

अब पेटपूजा की बारी थी। मेले में कुछ चटपटा न खाया तो क्या किया। इसलिए हम लोग चाट वाले की दुकान पर गए। चाट का रंग तगड़ा था पर स्वाद फीका। फिर हमने रसगुल्ले खाए जिसका जायका अच्छा था। पर मेले से अभी मन न भरा था। हम आगे बढ़ते-बढ़ते प्रदर्शनी के द्वार तक पहुँचे। पंक्ति में खड़े होकर भीतर पहुँचे। वहाँ तरह-तरह के स्टॉल थे। एक स्टॉल में परिवार नियोजन के महत्त्व को समझाया गया था।

दूसरे में आधुनिक वैज्ञानिक कृषि से संबंधित जानकारी की भरमार थी। तीसरे में खान से खनिज पदार्थों को निकालने की विधि मॉडल के रूप में दर्शायी गई थी। चौथे में इक्कीसवीं सदी में भारत की उन्नति का चित्रण था। और आगे सब्जियों की विभिन्न किस्में रखी थीं। वहाँ एक ही मूली पाँच किलो की तथा एक ही लौकी पचास किलो की देखी। बड़ा ही अद्भुत लगा। प्रदर्शनी में प्रदूषण समस्या, शहरों की यातायात समस्या, आदि बहुत सी बातों की जानकारी दी गई थी।

हम प्रदर्शनी से बाहर निकले। भीतर बहुत शांति थी पर बाहर शोर ही शोर था। माइक से तरह-तरह की आवाजें निकल रही थीं। सभी आवाजें एक-दूसरे से टकरा कर गूंज रही थीं। कहीं सीटी, कहीं बाँसुरी, कहीं डमरू तो कहीं ढोल बज रहे थे।

एक कोने में आदिवासियों का नृत्य चल रहा था। धुंघरुओं, मोर के पंखों तथा परंपरागत वस्त्रों से सज्जित आदिवासियों का लोक नृत्य दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ गया।  मेले में धूल, धुआँ, धक्का और शोर चरम सीमा पर था फिर भी लोगों को मज़ा आ रहा था। हर कोई अपनी धुन में था। सभी खुश दिखाई दे रहे थे। हम मेले का एक और चक्कर लगाकर मेला परिसर से बाहर निकल आए। मेला पीछे छूट गया पर मेले की यादें मेरे मन मस्तिष्क में अभी तक अंकित हैं 26 जनवरी का मेला!

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Written by

Romi Sharma

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