दहेज प्रथा पर निबंध व भाषण – Essay on Dowry System in Hindi

हेलो दोस्तों आज फिर में आपके लिए लाया हु Essay on Dowry System in Hindi पर पुरा आर्टिकल लेकर आया हु। दहेज प्रथा हमारे समाज में बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है आजकल दहेज देना और लेना बहुत आम बात हो गयी है अगर स्कूल में आपके बच्चो को इस topic पर essay लिखने के लिए बोला गया है तो आप नीचे दिए हुवे आर्टिकल को पढ़ सकते है। आईये पढ़ते है Essay on Dowry System in Hindi

दहेज प्रथा पर निबंध व भाषण Essay on Dowry System in Hindi

Essay on Dowry System

 

Also Read:

 

देश में व्याप्त दहेज की कुप्रथा का स्वरूप अत्यंत प्राचीन है। प्राचीनतम धर्मग्रंथ मनुस्मृति में उल्लिखित है, ‘‘मातापिता कन्या के विवाह के समय दान भाग के रूप में धनसंपत्ति व गाएं आदि कन्या को प्रदत्त कर वर को समर्पित करें।” पर इस संदर्भ में स्मृतिकार मनु ने इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया कि यह भाग कितना होना चाहिए। कालांतर में स्वेच्छा से कन्या को प्रदत्त किया जाने वाला धन वरपक्ष का अधिकार बन गया और बाद में इस प्रथा ने एक कुप्रथा या बुराई का रूप धारण कर लिया।

दहेज प्रथा आज के मशीनी युग में एक दानव का रूप धारण कर चुकी है। यह ऐसा काला सांप है जिसका डसा पानी नहीं मांगता। इस प्रथा के कारण विवाह एक व्यापार प्रणाली बन गया है। यह दहेज प्रथा हिन्दू समाज के मस्तक पर एक कलंक है। इसने कितने ही घरों को बर्बाद कर दिया है। अनेक कुमारियों को अल्पायु में ही घुटघुट कर मरने पर विवश कर दिया है। इसके कारण समाज में अनैतिकता को बढ़ावा मिला है तथा पारिवारिक संघर्ष बढ़े हैं। इस प्रथा के कारण समाज में बालविवाहबेमेल- विवाह तथा विवाहविच्छेद जैसी अनेकों कुरीतियों ने जन्म ले लिया है।

दहेज की समस्या आजकल बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है। धन की लालसा बढ़ने के कारण वरपक्ष के लोग विवाह में मिले दहेज से संतुष्ट नहीं होते हैं। परिणामस्वरूप वधुओं को जिन्दा जला कर मार दिया जाता है। इसके कारण बहुत से परिवार तो लड़की के जन्म को अभिशाप मानने लगे हैं। यह समस्या दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती। जा रही है। धीरे-धीरे सारा समाज इसकी चपेट में आता जा रहा है।

 

इस सामाजिक कोढ़ से छुटकारा पाने के लिए हमें भरसक प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए हमारी सरकार द्वारा अनेकों प्रयत्न किए गए हैं जैसे हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम’ पारित करना। इसमें कन्याओं को पैतृक सम्पत्ति में अधिकार मिलने की व्यवस्था है। दहेज प्रथा को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया तथा इसकी रोकथाम के लिए ‘दहेज निषेध अधिनियम पारित किया गया। इन सबका बहुत प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके उपरान्त विवाह योग्य आयु की सीमा बढ़ाई गई है। आवश्यकता इस बात की है कि इसका कठोरता। से पालन कराया जाय। लड़कियों को उच्च शिक्षा दी जाए, युवा वर्ग के लिए अन्तर्जातीय विवाह संबंधों को बढ़ावा दिया जाए ताकि वे इस कुप्रथा का डट कर सामना कर सकें। अतः हम सबको मिलकर इस प्रथा को जड़ से ही समाप्त कर देना चाहिए तभी हमारा समाज प्रगति कर सकता है।

दहेज प्रथा पर निबंध व भाषण Essay on Dowry System in Hindi

 

दहेज से तात्पर्य उस धनसम्पत्ति व अन्य पदार्थों से है जो विवाह में कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को दिए जाते हैं। यह विवाह से पूर्व ही तय कर लिया जाता है। और कन्या पक्ष वाले कन्या के भविष्य को सुखी बनाने के लिए यह सब वर पक्ष को दे दिया करते हैं। प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति में विवाह को एक आध्यात्मिक कर्मदो आत्माओं का मिलनपवित्र संस्कार तथा धर्मसमाज का आवश्यक अंग माना जाता था। उस समय दहेज नाम से किसी भी पदार्थ का लेनदेन नहीं होता था। बाद में इस प्रथा का प्रचलन केवल राजा-महाराजाओं धनी वर्गों व ऊँचे कुलों में प्रारम्भ हुआ। परन्तु वर्तमान काल में तो यह प्रथा प्राय: (प्रत्येक परिवार में ही प्रारम्भ हो गई है।

 

दहेज प्रथा आज के मशीनी युग में एक दानव का रूप धारण कर चुकी है। यह ऐसा काला साँप है जिसका डसा पानी नहीं मांगता। इस प्रथा के कारण विवाह एक व्यापार प्रणाली बन गया है। यह दहेज प्रथा हिन्दू समाज के मस्तक पर एक कलंक है। इसने कितने ही घरों को बर्बाद कर दिया है। अनेक कुमारियों को अल्पायु में ही घुटघुट कर मरने पर विवश कर दिया है। इसके कारण समाज में अनैतिकता को बढ़ावा मिला है तथा पारिवारिक संघर्ष बढ़े हैं। इस प्रथा के कारण समाज में बाल-विवाह बेमेल विवाह तथा विवाह विच्छेद जैसी अनेकों कुरीतियों ने जन्म ले लिया है।

दहेज की समस्या आजकल बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है। धन की लालसा बढ़ने के कारण वर पक्ष के लोग विवाह में मिले दहेज से संतुष्ट नहीं होते हैं। परिणामस्वरूप वधुओं को जिन्दा जला कर मार दिया जाता है। इसके कारण बहुत से परिवार तो लड़की के जन्म को अभिशाप मानने लगे हैं। यह समस्या दिनप्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है। धीरेधीरे सारा समाज इसकी चपेट में आता जा रहा है।

इस सामाजिक कोढ़ से छुटकारा पाने के लिए हमें भरसक प्रयत्न करना | चाहिए। इसके लिए हमारी सरकार द्वारा अनेकों प्रयत्न किए गए हैं जैसे हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम पारित करना। इसमें कन्याओं को पैतृक सम्पत्ति में अधिकार मिलने की व्यवस्था है। दहेज प्रथा को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया तथा इसकी रोकथाम के लिए दहेज निषेध अधिनियम पारित किया गया। इन सब का बहुत प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके उपरान्त विवाह योग्य आयु की सीमा बढ़ाई गई है। आवश्यकता इस बात की है कि उस का कठोरता से पालन कराया जाए। लड़कियों को उच्च शिक्षा दी जाएयुवा वर्ग के लिए अन्तर्जातीय विवाह संबंधों को बढ़ावा दिया जाए ताकि वे इस कुप्रथा का डट कर सामना कर सकें। अतहम सब को मिलकर इस प्रथा को जड़ से ही समाप्त कर देना चाहिए तभी हमारा समाज प्रगति कर सकता है।

Also Read:

 

दहेज प्रथा एक सामाजिक कलंक

 

यूँ तो मानव समाज एवं सभ्यता के समक्ष कई सारी चुनौतियाँ ह बाए खड़ी हैं, परंतु इनमें से एक चुनौती ऐसी है, जिसका कोई भी तोड़ अभी तक समर्थ होता नहीं दिख रहा है। कहना नहीं होगा कि विवाह संस्कार से जुड़ी हुई यह सामाजिक विकृति दहेज प्रथा ही है। दहेज कुप्रथा भारतीय समाज के लिए एक भयंकर अभिशाप की तरह है। हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का यह एक बड़ा कलंक है। ‘दहेजशब्द अरबी भाषा के ‘जहेज’ शब्द से रूपान्तरित होकर उर्दू और हिन्दी में आया है, जिसका अर्थ होता है ‘सौगात’। इस भेंट या सौगात की परम्परा भारत में कब से प्रचलित हुईयह विकासवाद की खोज के साथ जुड़ा हुआ तथ्य है।

प्राचीन आर्य ग्रन्थों के अनुसार, अग्निकुंड के समक्ष शास्त्र विद्वान विवाह सम्पन्न कराता था तथा कन्या का हाथ वर के हाथ में देता था। कन्या के माता-पिता अपनी सामथ्र्य और शक्ति के अनुरूप कन्या के प्रति अपने स्नेह और वात्सल्य के प्रतीक के रूप में कुछ उपहार भेंट स्वरूप दिया करते थे। इस भेंट में कुछ वस्त्र, गहने तथा अन्न आदि होते थे। इसके लिए वस्त्रभूषणालंकृताम्’ शब्द का प्रयोग सार्थक रूप में प्रचलित था। इन वस्तुओं के अतिरिक्त दैनिक जीवन में काम आने वाली कुछ अन्य आवश्यक वस्तुएँ भी उपहार के रूप में दी जाती थीं। उपहार की यह प्रथा कालिदास के काल में भी थी।

स्नेह, वात्सल्य और सद्भावनाओं पर आधारित यह प्रतीक युग में परिवर्तन के साथ-साथ स्वयं में परिवर्तित होता गया। स्नेहोपहार की यह भावना कालक्रम में अत्यन्त विकृत होती चली गयी। मध्य युग में वस्त्ररत्न, आभूषणहाथी, घोड़े तथा राज्य का कोई भाग-यहाँ तक कि दास-दासियाँ भी दहेज में देने की प्रथा चल पड़ी।

 

आधुनिक दहेज प्रथा मूलत: धनी लोगों की देन है, जिसकी चक्की में निर्धन भी पिस रहे हैं। इस प्रथा के पीछे लाभ की दुष्प्रवृत्ति छिपी हुई है। आज दहेज प्रथा भारत के सभी क्षेत्रों और वर्गों में व्याप्त है। इस कुप्रथा ने लड़कियों के पिता का जीवन दूभर कर दिया है। लड़के के पिता अपने लड़के का कथित सौदा करने लगे हैं। यह घोर नौतिक पतन नहीं तो और क्या है? इस कुप्रथा के चलते कितने लड़की वाले बेघर एवं बर्बाद हो रहे हैं। कितनी ही विवश कन्याओं को आत्महत्या जैसा कुकर्म करना पड़ रहा है। कितनी वधुएँ दहेज की खातिर जीवित जला कर मारी जा रही हैं। गाँधी भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के साथसाथ आर्थिक, नैतिक और सामाजिक स्वतंत्रता के भी हिमायती थे।

उन्होंने दहेज प्रथा की क्रूरता और भयावहता से क्षुब्ध होकर कहा था-“दहेज की पातकी प्रथा के खिलाफ जबरदस्त लोकमत बनाया जाना चाहिए और जो नवयुवक इस प्रकार गलत ढंग से लिए गए धन से अपने हाथों को अपवित्र करेउसे जाति से बहिष्कृत कर देना चाहिए।” आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने भी इस राष्ट्रीय कलंक की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट किया।

पं. जवाहर लाल नेहरू ने इस दहेज दानव के विनाश के लिए जनता का उद्बोधन किया इन्हीं के प्रधानमंत्रित्वकाल में सन् 1961 ई. में ‘दहेज निरोधक अधिनियम बनाया गया, किन्तु जनता के समर्थन अभाव में यह कानून की पुस्तकों की ही शोभा बनकर रह गया। यह कुप्रथा कानून बना देने मात्र से ही समाप्त नहीं हो सकती।

इस सामाजिक कोढ़ से तभी मुक्ति मिल सकती है, जब युवा वर्ग इस ओर अग्रसर हो। दहेज जैसी कुरीति को दूर करने के लिए देश के युवा वर्ग को आगे आना ही होगा।

Also Read:

दहेज प्रथा एक अभिशाप

प्राचीन काल से ही मानव-समाज के विकास के साथ उसमें अनेक प्रथाएँ जन्म लेती रही हैं। भिन्न भिन्न समाज अथवा सम्प्रदायों ने अपनी सुविधा अनुसार प्रथाओं को जन्म दिया, लेकिन किसी भी समाज की प्रथा में उस समाज का हित विद्यमान रहता था। समय के साथ मानव हित में रीति-रिवाजों अथवा प्रथाओं में परिवर्तन भी होते रहे हैं। हमारे भारतीय समाज में दहेज एक सामाजिक कलंक के रूप में विद्यमान है। यह एक थोपी गयी प्रथा के रूप में निरन्तर समाज का अहित कर रहा है।

वास्तव में प्राचीन काल से ही हमारे देश में दहेज का एक प्रथा के रूप में जन्म नहीं हुआ। विवाह के अवसर पर वर व को सगे-सम्बंधियों द्वारा भेंट देने की परम्परा अवश्य रही है। परन्तु भेंट देने की इस परम्परा में कोई विवशता नहीं होती थी। वर और वधूदोनों पक्ष के सगे-सम्बन्धी वरवधू का घर बसाने के उद्देश्य से स्वेच्छा से उन्हें भेंट दिया करते थे। राजाओंजमींदारों ने स्वेच्छा से दी जाने वाली इस भेंट को बढ़ाचढ़ाकर दहेज के रूप में परिवर्तित कर दिया। उनके लिए बढ़-चढ़कर दहेज लेना-देना शान का विषय बन गया। बाद में उनकी देखादेखी मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों में भी दहेज का प्रचलन बढ़ने लगा और एक स्वस्थ परम्परा समाज के लिए अभिशाप बनकर रह गयी।

 

आज भारतीय समाज में दहेज एक प्रथा के रूप में सामाजिक कलंक बना हुआ है। अमीर हो या गरीब, प्रत्येक वर्ग में दहेज की माँग की जाती है। धनाड्य वर्ग को दहेज देने में कठिनाई नहीं होती। लेकिन एक मध्यम अथवा निम्न वर्ग का परिवार अपनी विवाह योग्य कन्या को देखदेखकर चिंतित होता रहता है। वास्तव में अपनी कन्या को स्वेच्छा से भेंट देने में किसी परिवार को आपत्ति नहीं होती, परन्तु कठिनाई तब उत्पन्न होती है, जब वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष की अर्थिक स्थिति से अधिक दहेज की माँग की जाती है। अपनी कन्या के सुखद भविष्य की आशा में वधू पक्ष वर पक्ष की माँगों को पूर्ण करने का यथासम्भव प्रयत्न भी करता है। निस्संदेह इस प्रयास में वधू पक्ष को खून के औसू रोने पड़ते हैं। परन्तु दहेज का दानव सरलता से उसका पीछा नहीं छोड़ता। विवाह के उपरान्त भी अधिक दहेज की माँग की जाती है और इसके लिए वर पक्ष नवविवाहिता कन्या पर अत्याचार करने में भी संकोच नहीं करता। शर्मनाक स्थिति यह है कि दहेज के लिए मासूम कन्याओं को वर पक्ष द्वारा जलाकर मारा जा रहा है। बेबस कन्याएँ इस थोपी गयी प्रथा के लिए बलि चढ़ रही हैं।

वास्तव में आज विवाह एक आडम्बर बनकर रह गया है। हमारा सम्पूर्ण समाज विकृत हो चुका है। विवाह के नाम पर बढ़-चढ़कर प्रदर्शन किया जाता है। आज विवाह दो आत्माओं का मिलन अथवा दो परिवारों का सम्बन्ध नहीं रहा, बल्कि यह सौदेबाजी बन गया है। इसमें वर पक्ष ही नहीं बल्कि वधू पक्ष भी अपनी शान को अधिक महत्व दे रहा है। इसका कारण यह है। कि प्रत्येक वधू पक्ष को कभी वर पक्ष बनने का भी अवसर मिलता है। परिवारों में पुत्रियों के साथ पुत्र भी होते हैं। समाज की मानसिकता ऐसी हो गयी है कि पुत्रियों के विवाह में बढ़-चढ़कर प्रदर्शन किया जाएगा, तभी पुत्रों के विवाह में मनचाहा दहेज मिलेगा। प्रायः पुत्रियों के विवाह की व्यवस्था करने के उद्देश्य से भी पुत्रों के विवाह में अधिक दहेज की माँग की जाती है।

दहेज के दानव ने हमारे सम्पूर्ण समाज को अपने पंजों में जकड़ा हुआ है। इसके निराकरण के लिए कानून में दंड की व्यवस्था है। अनेक महिला संस्थाएँ भी दहेज के विरुद्ध आवाज उठा रही हैं। परन्तु दहेज हमारे समाज का पीछा नहीं छोड़ रहा है। आज भी दहेज के लिए मासूम कन्याओं को प्रताड़ित किया जा रहा है, उनकी हत्याएं की जा रही हैं।

इस दिशा में हमारे समाज की युवा पीढ़ी महत्वपूर्ण कदम उठा सकती है। हमारे सम्पूर्ण समाज के हित के लिए युवा पीढ़ी दृढ़ संकल्प के साथ दहेज का विरोध कर सकती है। वह चाहे तो दहेज के कलंक को हमारे समाज से समाप्त करने में सफल हो सकती है। दहेज के दानव से पीछा छुड़ाने के लिए कुंआरा रहना अच्छा है।

Also Read:

Essay on Dowry System in Hindi

 

 

स्थिति में दोनों में कष्ट सहने पड़ते रहे। धनियों से दहेज न दे सकने से दु:ख भोगना पड़ता रहा है। समय के चक्र में इस सामाजिक उपयोगिता की प्रथा ने धीरे-धीरे अपना बुरा रूप धारण करना आरम्भ कर दिया और लोगों ने अपनी कन्याओं का विवाह करने के लिए भरपूर धन देने की प्रथा चला दी। इस प्रथा को खराब करने का आरम्भ धनी वर्ग से ही हुआ है क्योंकि धनियों को धन की चिंता नहीं होती। वे अपनी लड़कियों के लिए लड़का खरीदने की शक्ति रखते हैं। इसलिए दहेजप्रथा ने जघन्य बुरा रूप धारण कर लिया और समाज में यह कुरीति-सी बन गई है। अब इसका निवारण दुष्कर हो रहा है। नौकरी पेशा या निर्धनों को इस प्रथा से अधिक कष्ट पहुँचता है। अब तो बहुधा लड़के को बैंक का एक चैक मान लिया जाता है कि जब लड़की वाले आयें तो उनकी खाल बेंचकर पैसा इकट्ठा कर लिया जाये ताकि लड़की का विवाह कर देने के साथ ही उसका पिता बेचारा कर्ज से भी दब जाये।

आज दहेज की प्रथा को देश भर में बुरा माना जाता है। इसके कारण कई दुर्घटनाएँ। हो जाती हैं, कितने ही घर बर्बाद हो जाते हैं। आत्महत्याएँ भी होती देखी गई हैं। नित्य-प्रति तेल डालकर बहुओं द्वारा अपने आपको आग लगाने की घटनाएँ भी समाचार-पत्रों में पढ़ी जाती हैं। पति एवं सासससुर भी बहुओं को जला देते या हत्याएँ कर देते हैं। इसलिए दहेज प्रथा को आज कुरीति माना जाने लगा है। भारतीय सामाजिक जीवन में अनेक अच्छे गुण हैं, परन्तु कतिपय बुरी रीतियाँ भी उसमें घुन की भाँति लगी हुई हैं। इनमें एक रीति दहेज प्रथा की भी है। विवाह के साथ ही पुत्री को दिए जाने वाले सामान को दहेज कहते हैं। इस दहेज में बर्तनवस्त्र, पलंगसोफा, रेडियो, मशीन, टेलीविजन आदि की बात ही क्या है, हजारों रुपया नकद भी दिया जाता है। इस दहेज को पुत्री के स्वस्थ शरीर, सौन्दर्य और सुशीलता के साथ ही जीवन को सुविधा देने वाला माना जाता है।

दहेज प्रथा का इतिहास देखा जाए तब इसका प्रारम्भ किसी बुरे उदेश्य से नहीं हुआ था। दहेज प्रथा का उल्लेख मनु स्मृति में ही प्राप्त हो जाता है, जबकि वस्त्राभूषण युक्त कन्या के विवाह की चर्चा की गई है। गौएँ तथा अन्य वाहन आदि देने का उल्लेख मनुस्मृति में किया गया है। समाज में जीवनोपयोगी सामग्री देने का वर्णन भी मनुस्मृति में किया गया है, परन्तु कन्या को दहेज देने के दो प्रमुख कारण थे। पहला तो यह कि माता पिता अपनी कन्या को दान देते समय यह सोचते थे कि वस्त्रादि सहित कन्या को कुछ सामान दे देने उसका जीवन सुविधापूर्वक चलता रहेगा और कन्या को प्रारम्भिक जीवन में कोई कष्ट न होगा। दूसरा कारण यह था कि कन्या भी घर में अपने भाईयों के समान भागीदार है, चाहे वह अचल सम्पत्ति नहीं लेती थी, परन्तु विवाह के काल में उसे यथाशक्ति धनपदार्थ आदि दिया जाता था, ताकि वह सुविधा से जीवन व्यतीत करके और इसके पश्चात भी उसे जीवन भर सामान मिलता रहता था। घर भर में उसका सम्मान हमेशा बना रहता था। पुत्री जब भी पिता के घर आती थी, उसे अवश्य ही धनवस्त्रादि दिया जाता था। इस प्रथा के दुष्परिणामों से भारत के मध्ययुगीन इतिहास में अनेक घटनाएँ भरी पड़ी हैं। धनी और निर्धन व्यक्तियों को दहेज देने और न देने की दहेज प्रथा को सर्वथा बंद नहीं किया जाना चाहिए परन्तु कानून बनाकर एक निश्चित मात्रा तक दहेज देना चाहिए। अब तो पुत्री और पुत्र का पिता की सम्पत्ति में समान भाग स्वीकार किया गया है। इसीलिए भी दहेज को कानूनी रूप दिया जाना। चाहिए और लड़कों को माता-पिता द्वारा मनमानी धन दहेज में लेने पर प्रतिबंध लग जाना चाहिए। जो लोग दहेज में मनमानी करें उन्हें दण्ड देकर इस दिशा में सुधार करना चाहिए। दहेज प्रथा को भारतीय समाज के माथे पर कलंक के रूप में नहीं रहने देना चाहिए।

Also Read:

 

Essay on Dowry System in Hindi

 

सदियाँ बीत जाने के बावजूद आज भी, नारी शोषण से मुक्त नहीं हो पाई है। उसके लिए दहेज सबसे बड़ा अभिशाप बन गया है। लड़की का जन्म माता-पिता के लिए बोझ बन जाता है। पैदा होते ही उसे अपनी ही माँ द्वारा जनमे भाई की अपेक्षा दोयम दर्जा प्राप्त होता है। यद्यपि माता-पिता के लिए ममत्व में यह समानता की अधिकारिणी है, तथापि कितने ही उदार व्यक्ति हों, लड़के की अपेक्षा लड़की पराई समझी जाती है। दहेज समाज की कुप्रथा है। मूल रूप में यह समाज के आभिजात्य वर्ग की उपज है। धनवान् व्यक्ति ही धन के बल पर अपनी अयोग्य कन्या के लिए योग्य वर खरीद लेता है और निर्धन वर्ग एक ही जाति में अपनी योग्य कन्या के लिए उपयुक्त वर पा सकने में असमर्थ हो जाता है।

 

धीरे-धीरे यह सामाजिक रोग आर्थिक कारणों से भयंकरतम होता चला गया। दहेज के लोभ में नारियों पर अत्याचार बढ़ने लगे। प्रतिदिन अनेक युवतियाँ दहेज की आग में जलकर राख हो जाती हैं अथवा आत्महत्या करने पर विवश होती हैं। समाज-सुधार की नारेबाजी में समस्या का निराकरण सोच पाने की क्षमता भी समाप्त होती जा रही है। दहेजप्रथा को मिटाने के लिए कठोर कानून की बातें करनेवाले विफल हैं।

हिंदू कोड बिल के पास हो जाने के बाद जो स्थिति बदली है, यदि उसी के अनुरूप लड़की को कानूनी संरक्षण प्राप्त हो जाए तो दहेज की समस्या सदासर्वदा के लिए समाप्त हो सकती है। पिता अपनी संपत्ति से अपनी पुत्री को हिस्सा देने की बजाय एक-दो लाख रुपए दहेज देकर मुक्ति पा लेना चाहता है। इस प्रकार सामाजिक बुराई के साथ ही नारी के कानूनी अधिकार का परोक्ष हनन भी होता है। अभी तक बहुत कम पिताओं ने ही संपत्ति में अपनी बेटी को हिस्सा दिया है। लड़की के इस अधिकार को प्राप्त करने के लिए न्यायालय की शरण लेनी पड़े तो उसे प्राप्त होनेवाले धन का अधिकांश भाग कोर्ट-कचहरी के चक्कर में व्यय हो जाता है।

यदि गहराई से देखें तो हर सामाजिक बुराई की बुनियाद में आर्थिक कारण होते हैं। दहेज में प्राप्त होनेवाले धन के लालच में स्त्री पर अत्याचार करनेवाले दोषी , परंतु उसका कानूनी अधिकार न देकर इस स्थिति में पहुँचा देनेवाले भी कम दोषी नहीं हैं। दहेज पर विजय पाने के लिए स्त्री को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना आवश्यक है। रूढ़िग्रस्त समाज की अशिक्षित लड़की स्वावलंबी बनेगी कैसे? दहेज जुटाने की बजाय पिता को अपनी पुत्री को उच्च-से-उच्च शिक्षा दिलानी चाहिएउसे भी पुत्र की तरह अपने पैरों पर खड़ा करना जरूरी है।

दहेज की ज्यादा समस्या उसी वर्ग में पनप रही है, जहाँ संपत्ति और धन है। धनी वर्ग पैसे के बल पर गरीब लड़का खरीद लेते हैं और गरीब की लड़की के लिए रास्ता बंद करने का अपराध करते हैं। लड़के और लड़की में संपत्ति का समान बंटवारा विवाह में धन की फिजूलखर्ची की प्रवृत्ति को कम कर सकता है और इस प्रकार विवाह की शान शौकतदिखावाफिजूलखर्चा एवं लेन-देन स्वत: समाप्त हो सकता है।

किसी भी लड़की को यदि उसके पिता की संपत्ति का सही अंश मिल जाए तो उसकी आर्थिक हैसियत उसे आत्मबल प्रदान करे और अपने जीवन-यापन का सहारा पाने के बाद वह स्वयं लालची व क्रूर व्यक्तियों से संघर्ष कर सकेगी। आर्थिक पराधीनता और पिता के घर-द्वार बंद होने के कारण लाखों अबलाओं को अत्याचार सहने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

Also Read:

Essay on Dowry System in Hindi

 

आज दहेज की प्रथा को देश भर में बुरा माना जाता है। इसके कारण कई दुर्घटनाएँ हो जाती हैंकितने ही घर बर्बाद हो जाते हैं। आत्महत्याएँ भी होती देखी गई हैं। नित्य-प्रति तेल डालकर बहुओं द्वारा अपने आपको आग लगाने की घटनाएँ भी समाचार-पत्रों में पढ़ी जाती हैं।

पति एवं सास-ससुर भी बहुओं को जला देते या हत्याएँ कर देते हैं। इसलिए दहेज प्रथा को आज कुरीति माना जाने लगा है। भारतीय सामाजिक जीवन में अनेक अच्छे गुण हैं, परन्तु कतिपय बुरी रीतियाँ भी उसमें घुन की भाँति लगी हुई हैं।

इनमें एक रीति दहेज प्रथा की भी है। विवाह के साथ ही पुत्री को दिए जाने वाले सामान को दहेज कहते हैं। इस दहेज में बर्तनवस्त्रपलंगसोफा, रेडियो मशीन, टेलीविजन आदि की बात ही क्या है, हजारों रुपया नकद भी दिया जाता है। इस दहेज को पुत्री के स्वस्थ शरीर, सौन्दर्य और सुशीलता के साथ ही जीवन को सुविधा देने वाला माना जाता है। दहेज प्रथा का इतिहास देखा जाए तब इसका प्रारम्भ किसी बुरे उद्देश्य से नहीं हुआ था। दहेज प्रथा का उल्लेख मनु स्मृति में ही प्राप्त हो जाता है, जबकि वस्त्राभूषण युक्त कन्या के विवाह की चर्चा की गई है।

गौएँ तथा अन्य वाहन आदि देने का उल्लेख मनुस्मृति में किया गया है। समाज में जीवनोपयोगी सामग्री देने का वर्णन भी मनुस्मृति में किया गया है, परन्तु कन्या को दहेज देने के दो प्रमुख कारण थे। पहला तो यह कि माता पिता अपनी कन्या को दान देते समय यह सोचते थे कि वस्त्रादि सहित कन्या को कुछ सामान दे देने उसका जीवन सुविधापूर्वक चलता रहेगा और कन्या को प्रारम्भिक जीवन में कोई कष्ट न होगा। दूसरा कारण यह था कि कन्या भी घर में अपने भाईयों के समान भागीदार है, चाहे वह अचल सम्पत्ति नहीं लेती थी, परन्तु विवाह के काल में उसे यथाशक्ति धनपदार्थ आदि दिया जाता था, ताकि वह सुविधा से जीवन व्यतीत करके और इसके पश्चात भी उसे जीवन भर सामान मिलता रहता था। घर भर में उसका सम्मान हमेशा बना रहता था।

पुत्री जब भी पिता के घर आती थी, उसे अवश्य ही धनवस्त्रादि दिया जाता था। इस प्रथा के दुष्परिणामों से भारत के मध्ययुगीन इतिहास में अनेक घटनाएँ भरी पड़ी हैं। धनी और निर्धन व्यक्तियों को दहेज देने और न देने की स्थिति में दोनों में कष्ट सहने पड़ते रहे। धनियों से दहेज न दे सकने से दु:ख भोगना पड़ता रहा है। समय के चक्र में इस सामाजिक उपयोगिता की प्रथा ने धीरे-धीरे अपना बुरा रूप धारण करना आरम्भ कर दिया और लोगों ने अपनी कन्याओं का विवाह करने के लिए भरपूर धन देने की प्रथा चला दी। इस प्रथा को खराब करने का आरम्भ धनी वर्ग से ही हुआ है क्योंकि धनियों को धन की चिंता नहीं होती। वे अपनी लड़कियों के लिए लड़का खरीदने की शक्ति रखते हैं। इसलिए दहेजप्रथा ने जघन्य बुरा रूप धारण कर लिया और समाज में यह कुरीति-सी बन गई है।

अब इसका निवारण दुष्कर हो रहा है। नौकरीपेशा या निर्धनों को इस प्रथा से अधिक कष्ट पहुँचता है। अब तो बहुधा लड़के को बैंक का एक चैक मान लिया जाता है कि जब लड़की वाले आयें तो उनकी खाल बेचकर पैसा इकट्ठा कर लिया जाये ताकि लड़की का विवाह कर देने के साथ ही उसका पिता बेचारा कर्ज से भी दब जाये। दहेज प्रथा को सर्वथा बंद नहीं किया जाना चाहिए परन्तु कानून बनाकर एक निश्चित मात्रा तक दहेज देना चाहिए। अब तो पुत्री और पुत्र का पिता की सम्पत्ति में समान भाग स्वीकार किया गया है।

इसीलिए भी दहेज को कानूनी रूप दिया जाना चाहिए और लड़कों को माता-पिता द्वारा मनमानी धन दहेज में लेने पर प्रतिबंध लग जाना चाहिए। जो लोग दहेज में मनमानी करें उन्हें दण्ड देकर इस दिशा में सुधार करना चाहिए। दहेज प्रथा को भारतीय समाज के माथे पर कलंक के रूप में नहीं रहने देना चाहिए।

 

Also Read:

 

The Author

Romi Sinha

I love to write on JoblooYou can Download Ganesha, Sai Ram, Lord Shiva & Other Indian God Images

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Jobloo.in © 2018 About Us | Contact US |Privacy Policy |
Copy Protected by Chetan's WP-Copyprotect.