बाल श्रम पर निबंध – Essay on Child Labour in Hindi 2018

बाल श्रम पर निबंध भी स्कूल में दिया जाने वाला टॉपिक है।हमारे देश में बाल श्रम एक बहुत बड़ी समस्या है और इसका कोई समाधान नहीं हुवा है। इस आर्टिकल में हमने Essay on Child Labour in Hindi में बहुत से essay लिखे है। अगर आपको बाल श्रम पर निबंध पसंद आया तो इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करे।

बाल श्रम पर निबंध – Essay on Child Labour in Hindi

परिश्रम मानव जीवन का वह हथियार है जिसके बल पर भारी से भारी संकटों पर भी जीत हासिल की जा सकती है। परिश्रम वह गुण है जिसे अपना लेने पर व्यक्ति के दु:ख मिट जाते हैं। परिश्रम सफलता का मूल मंत्र है। यह कभी भी बेकार नहीं जाता। संसार परिश्रमी व्यक्तियों का लोहा मानता है। परिश्रमी लोगों ने संसार में बड़ेबड़े कारनामे कर दिखाए हैं। वे बाधाओं से लड़ते हुए अपने जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति कर ही लेते हैं। किसान और मजदूर अनथक श्रम करते हुए संसार को भोजन, वस्त्र और आवास प्रदान करते हैं। व्यापारियों और पूंजीपतियों के श्रम से देश में रोजगार के नए-नए अवसर प्राप्त होते हैं। जिन लोगों ने परिश्रम को पूजा माना है संसार ने उनकी पूजा की है। जीवन की दौड़ में श्रम करनेवाला विजयी होता है लेकिन आलसी लोगों को हार का मुँह देखना पड़ता है। इसलिए हमें परिश्रमशील और कर्मठ बनना चाहिएपरिश्रम से भाग्य को भी बदला जा सकता है।

 

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बाल श्रम पर निबंध – Essay on Child Labour in Hindi

भारत में भगवान के बाल रूप के अनेक मंदिर हैं जैसे बाल गणेश, बाल हनुमानबाल कृष्ण एवं बाल गोपाल इत्यादि। भारतीय दर्शन के अनुसार बाल रूप को स्वयं ही भगवान का रूप समझा जाता है। ध्रुवप्रहलाद, लव-कुश एवं अभिमन्यु आज भी भारत में सभी के दिल-दिमाग में बसे हैं। आज के समय में गरीब बच्चों की स्थिति अच्छी नहीं है। बाल श्रम समाज की गंभीर बुराइयों में से एक है। गरीब बच्चों का भविष्य अंधकारमय है। पूरे संसार में गरीब बच्चों की उपेक्षा हो रही है तथा उन्हें तिरष्कार का सामना करना पड़ता है। उन्हें स्कूल से निकाल दिया जाता है और शिक्षा से वंचित होना पड़ता है, साथ ही बाल श्रम हेतु मजबूर होना पड़ता है। समाज में गरीब लड़कियों की स्थिति और भी नाजुक है। नाबालिग बच्चे घरेलू नौकर के रूप में काम करते हैं। वे होटलोंकारखानों, दुकानों एवं निर्माण स्थलों में कार्य करते हैं और रिक्शा चलाते भी दिखते हैं। यहाँ तक की वे फैक्ट्रियों में गंभीर एवं खतरनाक काम के स्वरुप को भी अंजाम देते दिखाई पड़ते हैं।

भारतीय के संविधान, १६५० के अनुच्छेद २४ के अनुसार १४ वर्ष से काम आयु के किसी भी फैक्ट्री अथवा खान में नौकरी नहीं दी जाएगी। इस सम्बन्ध में भारतीय विधायिका ने फैक्ट्री एक्ट, १६४८ एवं चिल्ड्रेन एक्ट, १६६० में भी उपबंध किये हैं। बाल श्रम एक्ट, १६८६ इत्यादि बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित रखने हेतु भारत सरकार की पहल को दर्शित करते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद ४५ के अनुसार राज्यों का कत्तव्य है कि वे बच्चों हेतु आवश्यक एवं निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करें। गत कुछ वर्षों से भारत सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा इस सम्बन्ध में प्रशंसा योग्य कदम उठाए गए हैं। बच्चों की शिक्षा एवं उनकी बेहतरी के लिए अनेक कार्यक्रम एवं नीतियाँ बनाई गयी हैं तथा इस दिशा में सार्थक प्रयास किये गए हैं। किन्तु बाल श्रम की समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। इसमें कोई शक नहीं है कि बाल श्रम की समस्या का जल्दी से जल्दी कोई हल निकलना चाहिए। यह एक गंभीर सामाजिक कुरीति है तथा इसे जड़ से समाप्त होना आवश्यक है।

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बाल श्रम पर निबंध – Essay on Child Labour in Hindi

 

बाल-मन सामान्यतया अपने घर-परिवार तथा आसपास की स्थितियों से अपरिचित रहा करता है। स्वच्छन्द रूप से खाना-पीना और खेलना ही वह जानता एवं इन्हीं बातों का प्राय: अर्थ भी समझा करता है। कुछ और बड़ा होने पर तख्तीस्लेट और प्रारम्भिक पाठमाला लेकर पढ़नालिखना सीखना शुरू कर देता है। लेकिन आज परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन गई और बन रही हैं कि उपर्युक्त कार्यों का अधिकार रखने वाले बालकों के हाथ-पैर दिन-रात मेहनत मजदूरी के लिए विवश होकर धूलधूसरित तो हो ही चुके हैं, अक्सर कठोर एवं छलनी भी हो चुके होते हैं। चेहरों पर बालसुलभ मुस्कान के स्थान पर अवसाद की गहरी रेखायें स्थायी डेरा डाल चुकी होती हैं।

फूल की तरह ताजा गन्ध से महकते रहने योग्य फेफड़ों में धूल, धुआं, भरकर उसे अस्वस्थ एवं दुर्गन्धित कर चुके होते हैं। गरीबीजन्य बाल मजदूरी करने की विवशता ही इसका एकमात्र कारण मानी जाती हैं ऐसे बाल मजदूर कई बार तो डर, भय, बलात कार्य करने जैसी विवशता के बोझ तले दबेघुटे प्रतीत होते हैं और कई बार बड़े बूढ़ों की तरह दायित्वबोध से दबे हुए भी। कारण कुछ भी हो, बाल मजदूरी न केवल किसी एक स्वतंत्र राष्ट्र बल्कि समूची मानवता के माथे पर कलंक है।

छोटे-छोटे बालक मजदूरी करते हुए घरोंढाबों, चायघरोंछोटे होटलों आदि में तो अक्सर मिल ही जायेंगे, छोटी-बड़ी फैक्टरियों के अन्दर भी उन्हें मजदूरी का बोझ ढोते हुए देखा जा सकता है। काश्मीर का कालीन उद्योग, दक्षिण भारत का माचिस एव पटाखा उद्योग, महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल का बीड़ी उद्योग तो पूरी तरह से बालमजदूरों के श्रम पर ही टिका हुआ है। इन स्थानों पर सुकुमार बच्चों से बारह- चौदह घण्टे काम लिया जाता है, पर बदले में वेतन बहुत कम दिया जाता है, अन्य किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं दी जाती। यहां तक कि इनके स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रखा जाता। इतना ही नहीं, यदि ये बीमार पड़ जाये तब भी इन्हें छुट्टी नहीं दी जाती बल्कि काम करते रहना पड़ता है।

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यदि छुट्टी कर लेते हैं तो उस दिन का वेतन काट लिया जाता है। कई मालिक तो छुट्टी करने पर दुगुना वेतन काट लेते हैं। ढाबों, चायघरों आदि में या फिर हलवाइयों की दुकानों पर काम कर रहे बच्चों की दशा तो और भी दयनीय होती है। कई बार तो उन्हें बचा-खुचा जूठन ही खानेपीने को बाध्य होना पड़ता है। बेचारे वहीं बैंचों पर या भट्टियों की बुझती आग के पास चौबीस घण्टों में दो-चार घण्टे सोकर गर्मी-सर्दी काट लेते हैं। बात-बात पर गालियां तो सुननी ही पड़ा करती हैं, मालिकों के लात-घूसे भी सहने पड़ते हैं।

यदि किसी से कांच का गिलास या कपप्लेट टूट जाता है तो उस समय मार-पीट और गाली-गलौच के साथ जुर्माना तक सहन करना पड़ता है। यही मालिक अपनी गलती से कोई वस्तु इधर-उधर रख देता है और न मिलने पर इन बाल मजदूरों पर चोरी करने का इल्जाम लगा दिया जाता है। इस प्रकार बाल मजदूरों का जीवन बड़ा ही दयनीय एवं यातनापूर्ण होता है।

बाल-मजदूरों का एक अन्य वर्ग भी है। कन्धे पर झोला लादे इस वर्ग के मजदूर सड़क पर फिके हुए गन्दे, फटे कागज पॉलिथीन के लिफाफे या प्लास्टिक के टुकड़े आदि बीनते दिखाई दे जाते हैं। कई बार गन्दगी के ढेरों को कुरेद कर उसमें से लोहे, टिनप्लास्टिक आदि की वस्तुएँ चुनतेराख में से कोयले बीनते हुए भी देखा जा सकता है। ये सब चुनकर कबाड़खानों पर जाकर बेचने पर इन्हें बहुत कम दाम मिल पाता है जबकि ऐसे कबाड़ खरीदने वाले लखपति-करोड़पति बन जाते हैं।

आखिर में बालमजदूर उत्पन्न कहाँ से होते हैं ? इसका सीधा-सा एक ही उत्तर है-गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले घर-परिवारों से आया करते हैं। फिर चाहे ऐसे घर-परिवार ग्रामीण हों या नगरीय झुग्गी-झोपड़ियां, दूसरे अपने घरपरिवार से गुमराह होकर आये बालक। पहले वर्ग की विवशता तो समझ में आती है कि वे लोग मजदूरी करके अपने घर-परिवार के अभावों की खाई पाटना चाहते हैं।

दूसरे उन्हें पढ़ने लिखने के अवसर एवं सुविधाएं नहीं मिल पाईं। लेकिन दूसरे गुमराह होकर बालमजदूरी करने वाले बालवर्ग के साथ कई प्रकार की कहानियां एवं समस्यायें जुड़ी रहा करती हैं। जैसे पढ़ाई में मन न लगने या फेल हो जाने पर मार के डर से घर से दूर भाग आनासौतेली मां या पिता के कठोर व्यवहार से पीड़ित होकर घर त्याग देना, बुरी आदतों और बुरे लोगों की संगत के कारण घरों में न रह पाना या फिर कामचोर आदि कारणों से घर से भाग कर मजदूरी करने के लिए विवश हो जाना पड़ता है।

देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों को किसी भी कारण से मजदूरी करनी पड़ेइसे मानवीय नहीं कहा जा सकता। एक तो घरों में बालकों के रह सकने योग्य सुविधायें परिस्थितियां पैदा करना आवश्यक है। दूसरे स्वयं राज्य को आगे बढ़कर बालकों के पालन की व्यवस्था सम्हालनी चाहिएतभी समस्या का समाधान सम्भव हो सकता है।

 

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Romi Sinha

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