साम्प्रदायिकता पर निबंध & Essay on communalism in hindi

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हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु साम्प्रदायिकता or Essay on communalism in Hindi पर पुरा आर्टिकल। सम्प्रदाय से अभिप्राय एक ऐसा जन-समूह है जो एक भगवान या देवी-देवता-सम्बन्धी किसी एक ही प्रकार की पूजा-पद्धति पर विश्वास रखता हो। Essay on communalism in Hindi की जानकारी जिससे आपको निबंध लिखने में बहुत मदद मिलेगी । अगर आपको हमारी वेबसाइट के और बहुत से Hindi essay पढ़ने हो तो पढ़ सकते है

Essay on communalism

साम्प्रदायिकता पर निबंध

सभी धर्म संप्रदाय, मत, मजहब मानव मात्र को ईश्वर-आस्था, समस्त प्राणियों के प्रति स्नेह-भाव, उपकार, स्वार्थ-त्याग तथा आपसी प्रेम की सीख देते हैं। किसी भी मजहब में घृणा, हिंसा, बैर, द्वेष आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। सभी मनुष्य उसी परमपिता परमात्मा की संतान है और इसी कारण धर्म सम्प्रदाय से परे मानवता रूपी सूत्र में बंधे हुए हैं, लेकिन कुछ लोग यह बात भूलकर स्वयं निर्मित धर्म के मिथ्या उन्माद में बह जाते हैं और एक-दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। ऐसा वही लोग करते हैं जो धर्म का सही अर्थ न तो समझते हैं और न ही समझना चाहते हैं।

व्यक्ति का अहंकार ही धार्मिक उन्माद का कारण है। हर धर्म के पूजा-उपासना करने के तरीके भिन्न हो सकते हैं, हम अपने आराध्य देव को अलग-अलग नामों जैसे-ईश्वर, अल्लाह, गुरुदेव, गॉड जैसे नामों से पुकार सकते हैं, लेकिन ये सभी उस परम परमात्मा तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न मार्ग हैं। सबका सार एक है, सबकी मंजिल एक है। धर्म तोड़ना नहीं जोड़ना सिखाता है।

संस्कृत में एक कथन भी है- “धर्म: यो बाधते धर्म न सधर्मः कुधर्म तत्।” अर्थात् जो धर्म दूसरे धर्म को बाधित करता है, वह धर्म नहीं अधर्म है, यही बात धर्म समभाव शायर इकबाल ने भी कही थी- “मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना। हिंदी है हम वतन है, हिन्दोस्ताँ हमारा॥” अर्थात् हम सब भारतीय हैं और भारतीयता ही हमारा धर्म है। साम्प्रदायिकता फैलाकर इसे नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए।

Essay on communalism in hindi

केवल अपने संप्रदाय को श्रेष्ठ समझ उसके हितों का विशेष ध्यान रखना और दूसरे संप्रदाय को हीन समझ उससे द्वेष रखना ही सांप्रदायिकता कहलाता है। भारत में सांप्रदायिकता का इतिहास बहुत पुराना है। इसके पीछे मुख्य वजह देश में कई संप्रदाय के लोगों का रहना है। प्राचीन काल में भारत में बौद्धों का हिन्दुओं, वैष्णव तथा शैवों व शाक्तों के मध्य वाद-विवाद तथा हिंसा होती रहती थी। विभिन्न संप्रदायों के लोग अपने धर्म व आचार-विचार को श्रेष्ठ समझ दूसरे संप्रदाय के लोगों को हेय दृष्टि से देखते रहे हैं। इधर भारत में सांप्रदायिकता की एक नई व्याख्या पनपी है। धीरे-धीरे धर्म संप्रदाय का रूप ले रहा है।

हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई अब धर्म नहीं संप्रदाय बन गया है। यदि हिन्दू, मुस्लिम दंगा हो तो सांप्रदायिक दंगा कहा जाता है। देश में मुस्लिमों के आने के बाद से हिन्दू तथा मुस्लिम धर्म में टकराव शुरू हुआ। हमारे देश में कई संप्रदाय के लोग रहते हैं।

सांप्रदायिकता राष्ट्रीयता की भयंकर विरोधी होती है। यह किसी सांप्रदायिक भावना से प्रेरित या संचालित व्यक्ति राष्ट्रीयता का समर्थक हो सकता है। मुगल काल में इस्लाम के नाम पर हिन्दुओं पर जुल्म ढाये गये थे। उनका काला इतिहास पढ़कर आज भी आंखें भर आती हैं। राणा प्रताप या शिवाजी की कहानी हममें एक नयी स्फूर्ती का संचार करती है। राष्ट्रीयता का समर्थक कभी भी सांप्रदायिक नहीं हो सकता।

राष्ट्र का समर्थक प्रत्येक जाति, धर्म, प्रांत और भाषा-भाषी को एक ही परिवार और समान दृष्टि से देखेगा। भारत में अनादि काल से ही विभिन्न जातियां या वर्ग आये हैं। उनमें से कुछ भारत की भूमि से आकर्षित हो यहीं निवास करने के लिए आये और कुछ यहां से संपत्ति लूट ले जाने के लिए आक्रांता बनकर आये। आर्यों का भारत आगमन का उद्देश्य यहां निवास करना था। जबकि अरब के लोग यहां की संपत्ति लूटने के लिए आये थे। यह सांप्रदायिकता हमारे देश का अभिशाप है। हर धर्म की अपनी मान्यताएं हैं। उनके आपस में टकराव है।

ये धार्मिक सम्प्रदाय एक-दूसरे से लड़ते रहते हैं। धार्मिक कट्टरता के साथ राजनीति जुड़ गई है। धर्म के अंधे भक्त तथा चालाक राजनीतिज्ञ इस सांप्रदायिकता से लाभ उठाते हैं। साधारण, अज्ञानी तथा निरीह, निर्दोष लोग हिंसा, आगजनी, लूट तथा विध्वंस के शिकार बनते हैं। आए दिन दंगे-फसाद, मारकाट तथा भयंकर विनाश की खबरें छपती हैं। ये धर्मात्मा तथा समाज के अपराधी वर्ग मिलकर देश में नए विध्वंस की तैयारी छिपे रूप से तथा खले रूप से करते रहते हैं।

भारत देश धर्मनिरपेक्ष है। यहां सरकार का कोई धर्म नहीं है। सभी धर्म स्वतंत्र हैं। हर नागरिक को अपनी आस्थानुसार अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता है। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति से अब तक सांप्रदायिकता की आग में लाखों लोग भस्म हो चुके हैं। करोड़ों की संपत्ति नष्ट हुई है। लाखों बच्चे अनाथ हो गए हैं तथा लाखों औरतें विधवा हो गई हैं। अब तो जगह-जगह बम विस्फोट हो रहे हैं। एक साथ हजारों लोग हताहत हो रहे हैं।

मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे आदि के झगड़े में इस देश को सांप्रदायिक शक्तियां तहस-नहस कर रही हैं। हमारा शत्रु देश पाकिस्तान भी प्रसन्न होकर जन, धन से सहायता कर रहा है। इस देश का बंटवारा केवल सांप्रदायिकता के आधार पर हुआ था। पाकिस्तान की नींव सांप्रदायिक तत्वों ने रखी थी। अंग्रेज उनके सहायक थे। यह विचार था कि इस बंटवारे से साम्प्रदायिकता का शैतान दफन होगा लेकिन सारी बातें विपरीत हो गई।

इस सांप्रदायिकता के चलते हिन्दू, मुसलमान तथा सिख धर्म के अनुयायियों में भाईचारा समाप्त हो रहा है। देश की एकता, अखंडता नष्ट हो रही है। परस्पर अविश्वास का वातावरण पैदा हो रहा है। देश की सुख-शांति छिन रही है। सारा वातावरण हिंसक घटनाओं से दूषित हो रहा है।

सांप्रदायिकता से छुटकारा पाने के लिए सरकार के साथ-साथ नागरिकों का भी कर्तव्य है कि वह इसके खिलाफ विशेष रूप से सजग रहे। राजनीतिक दल भी वोटों की राजनीति के चलते सांप्रदायिकता को बढ़ावा देते रहते हैं। ऐसे लोग जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और भाषा के नाम पर राष्ट्रीय निष्ठा को अंगूठा दिखा रहे हैं। धर्म निरपेक्ष गणतंत्र में राजनीतिज्ञों की यह नीति देश के लिए घातक है।

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Essay on communalism in hindi

सम्प्रदाय से अभिप्राय एक ऐसा जन-समूह है जो एक भगवान या देवी-देवता-सम्बन्धी किसी एक ही प्रकार की पूजा-पद्धति पर विश्वास रखता हो। उसका औपचारिक स्तर पर आचरण और व्यवहार भी एक जैसा ही हो। यह भी एक पौराणिक एवं ऐतिहासिक तथ्य है कि आरम्भ से ही इस पृथ्वी पर कई-कई सम्प्रदाय एक साथ अपने मतों का प्रचार-प्रसार करते रहे हैं तथा उनके अनुसार आचरण व्यवहार भी करते रहे हैं।

भारत में अनेक प्रकार के देवी-देवताओं को मान्यता प्राप्त होना, अनेक तीर्थ और पूजास्थल होना, तरह-तरह के मन्दिर और स्थान बनना, यहाँ तक कि वृक्षों, पर्वतों और नदियों तक को देवत्व का सा महत्त्व प्रदान किया जाना साम्प्रदायिक विभिन्नता एवं विविधता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वैष्णव, शैव, शाक्त, वल्लभ: राधावल्लभ आदि मध्यकालीन और प्राचीनतम कुछ प्रमुख सम्प्रदाय माने जाते हैं। आज भी भारत में तरह-तरह के सम्प्रदाय सक्रिय हैं और वे नित्य नए-नए स्वरूप बदलते रहते हैं। सभी के अपने-अपने अनन्त अनुयायी और सेवक-भक्त हैं। इतने सम्प्रदायों का होना कोई बुरी बात नहीं यदि वे किसी का कुछ बिगाड़ नहीं रहे हों।

परन्तु कोई भी सम्प्रदाय या किसी तरह की साम्प्रदायिकता तब बुरी बन जाया करती है जब कि कोई सम्प्रदाय या व्यक्ति दूसरे सम्प्रदाय या व्यक्ति को भला-बुरा कहने और उपासना-पद्धति में गुण-दोष निकालने लगता है। ऐसी स्थिति में बहुधा भिन्न सम्प्रदाय के लोगों में सिर-फुटौवल हो जाया करती है।

आज भारत में बाहर से आए हए धर्मों-जातियों के अनेक सम्प्रदाय मौजद। हैं। ऐसी स्थिति में साम्प्रदायिक सद्भाव बना रह पाना वास्तव में कठिन कार्य है। आज साम्प्रदायिकता का भाव वास्तव में अपनी मूल अवधारणा से हट कर एक ऐसी विष की बेल बन चुका है जिस पर केवल विषफल ही उगा करता है। आज के मानव में यों भी सहनशीलता का अभाव-सा हो गया है।

व्यक्ति हो या सम्प्रदाय सभी की महत्त्वाकाँक्षाएँ भी बढ़ चुकी हैं। कुछ निहित स्वार्थी लोग थोथी और हीन सामुदायिक मनोवृत्तियों को हवा देते रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में साम्प्रदायिक सदभाव बने रहना असम्भव-सा है।

आज भारत का वातावरण हर दृष्टि से भयावह एवं विस्फोटक बन चुका है। कहाँ, कब, क्या हो जाए, कोई कुछ नहीं कह सकता। ऐसे समय में सभी को विशेष सावधान रहना आवश्यक होता है। सभी सम्प्रदायों को यह सोचकर सतर्क रहना चाहिए कि जब इसी धरती पर रहना है तो किसी भी प्रकार से उन तत्त्वों के हाथ का खिलौना न बनें, जो देश की शान्ति भंग कर अपने निहित स्वार्थ को पूरा करना चाहते हैं। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि देश सर्वोपरि है। यदि देश है तो हम और हमारे सम्प्रदाय होंगे अन्यथा कुछ नहीं होगा।

Essay on communalism in hindi

किसी जाति अथवा धर्म विशेष के सम्प्रदाय को ही महत्त्वपूर्ण मानना, अन्य जाति अथवा धर्म के प्रति तिरस्कार का भाव उत्पन्न होना ही साम्प्रदायिकता है। मानव के लिए कोई भी जाति अथवा धर्म तुच्छ नहीं है, परन्तु साम्प्रदायिकता का भाव अवश्य मानवता के लिए शत्रु है।

हमें किसी भी जाति अथवा धर्म का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। इस पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य ईश्वर की सन्तान है। प्रत्येक दृष्टिकोण से सम्पूर्ण मानव जाति एक समान है। जाति, धर्म अथवा सम्प्रदाय विशेष मनुष्य के स्वनिर्मित हैं। विभिन्न सम्प्रदाय अथवा धर्मों के पर्व, रीति-रिवाज भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, परन्तु प्रत्येक धर्म के मूल में मानवता का हित विद्यमान है।

किसी सम्प्रदाय अथवा धर्म विशेष को मानना गलत नहीं है। जाता है और समाज में विभिन्न सम्प्रदाओं का एक साथ जीवन व्यतीत करना दूभर हो जाता है। यह स्थिति मानव जाति के लिए अत्यंत कष्टप्रद होती है। परन्तु उन्माद में मनुष्य कष्टों की भी परवाह नहीं करता और विकट परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर भी अपने सम्प्रदाय विशेष का राग अलापता रहता है। इतना ही नहीं, धार्मिक उन्माद के कारण इस पृथ्वी पर जितनी हत्याएँ हुई हैं, अन्य किसी कारण से नहीं हुई।

साम्प्रदायिकता के कारण वैमनस्य उत्पन्न करने में राजनैतिक एवं धार्मिक नेताओं ने निष्ठुरता से मानवता को कुचला है। सत्य यह है कि आम नागरिक के लिए साम्प्रदायिक विवाद से अधिक महत्त्वपूर्ण अपने परिवार का भरण-पोषण होता है। आम नागरिक दिनभर परिश्रम करता है और कठिनाई से अपना जीवनयापन कर पाता है। किसी विवाद में पड़ने का न तो उसके पास समय होता है, न ही क्षमता। परन्तु राजनैतिक एवं धार्मिक नेता तथा असामाजिक तत्त्व निजी स्वार्थों के लिए आम नागरिक को साम्प्रदायिकता की चक्की में पिसने पर विवश कर देते हैं। इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सुख-शांति से जीवन व्यतीत करने का अधिकार है। उसे अपनी इच्छा अनुसार भगवान की भक्ति करने का भी अधिकार प्राप्त है।

परन्तु प्रत्येक मानव को सर्वप्रथम यह विचार करना चाहिए कि उसकी धार्मिक गतिविधियाँ अथवा साम्प्रदायिक विचारधाराएँ समाज के अन्य सम्प्रदायों को ठेस तो नहीं पहुंचा रहीं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं है और प्रेम एवं मित्रता से बड़ा सुख नहीं है। साम्प्रदायिक सद्भाव से ही समाज उन्नति कर सकता है, जो कि सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हितकर है। अतः समाज की सुरक्षा के लिए प्रत्येक मानव का कर्तव्य है कि वह साम्प्रदायिकता के चंगुल से स्वयं को बचाए रखे।

 

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Written by

Romi Sharma

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