Chanakya Quotes Hindi 😳जिंदगी बदलेगे चाणक्य के सुविचार 👿

Chanakya Quotes Hindi 😳जिंदगी बदलेगे चाणक्य के सुविचार 👿
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हेलो दोस्तों आज फिर मै आपके लिए लाया हु Chanakya Quotes Hindi पर पुरा आर्टिकल। चाणक्य के विचार आपको motivate करने मे बहुत मदद करते है
आईये शुरू करते है Chanakya Quotes in Hindi. आप हमे ये बताना ना भुले की आपको कोनसा चाणक्य के विचार आपको बहुत अच्छा लगा चाणक्य चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। लोग उनको ‘कौटिल्य पंडित नाम से भी जानते थे उन्होने नंदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया। उनके द्वारा रचित बहुत किताबे आज भी पढ़ी जाती है जिनमे से कुछ है अर्थशास्त्र राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाजनीति आदि ।

चाणक्य को भारत के एक महान् राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री के रूप में जाना जाता है। चाणक्य का जन्म तक्षशिला या दक्षिण भारत में 350 ई-पू- के आसपास हुआ था। चाणक्य को ।जन्म के समय से ही चाणक्य के मुंह में पूरे दाँत थे। यह राजा या सम्राट बनने की निशानी थी। लेकिन चूंकि उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था, इसलिए यह बात सच नहीं हो सकती थी। इसलिए उनके दाँत उखाड़ दिए गए और यह भविष्यवाणी की गई कि वे किसी और व्यक्ति को राजा बनवाएंगे और उसके माध्यम से शासन करेंगे।

चाणक्य कटु सत्य को कहने से भी नहीं चूकते थे। इसी कारण पाटलिपुत्र के राजा घनानंद ने उन्हें अपने दरबार से बाहर निकाल दिया था। तभी चाणक्य ने प्रतिज्ञा थी कि वे नंद वंश को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे।

अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए चाणक्य ने बालक चंद्रगुप्त को चुना क्योंकि उसमें जन्म से ही राजा बनने के सभी गुण मौजूद थे। चंद्रगुप्त के कई दुश्मन थे। राजा नंद भी उनमें शामिल था। उसने उन्हें कई बार विष देकर मारने की कोशिश की।

अतः चंद्रगुप्त की विष-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए चाणक्य ने उसे भोजन में थोड़ा-थोड़ा विष मिलाकर देना आरंभ कर दिया।चंद्रगुप्त को भोजन में विष दिए जाने की बात नहीं पता थी इसलिए एकबार 7 दिन के लिए उसने अपने भोजन में से थोड़ा अपनी पत्नी को भी दे दिया, जो नौ माह की गर्भवती थी। विष की तीव्रता वह नहीं खेल पाई और मर गयी

लेकिन चाणक्य ने उसका पेट चीरकर नवजात शिशु को बचा लिया। वह शिशु बड़ा होकर एक योग्य सम्राट् बिंदुसार बना। उसका सुबंधु नाम का एक मंत्री था। सुबं चाणक्य को फूटी आँखों पसंद नहीं करता था। उसने बिंदुसार के कान भरने शुरु कर दिए कि चाणक्य उसकी माता का हत्यारा है। तथ्यों को जांचे परखे बगैर बिंदुसार चाणक्य के विरुद्ध खड़ा हो गया। लेकिन जब उसे सच्चाई ज्ञात हुई तो वह बहुत लज्जित हुआ और अपने दुर्व्यवहार के लिए चाणक्य से क्षमा माँगी। उसने सुबंधु से भी कहा कि जाकर चाणक्य से क्षमा माँगे।

सुबंधु बड़ा कुटिल व्यक्ति था। चाणक्य से क्षमा माँगने का बहाना करते हुए उसने धोखे से उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार, राजनीतिक षड्यंत्र के चलते एक महान् व्यक्ति के जीवन का अंत हो गया।

Chanakya से जुड़े हुवे कुछ सवाल और उनके जवाब।

1. kautilya ne kis vishwavidyalaya se shiksha pai thi

कौटिल्य ने तक्षशिला से अपनी shiksha ली थी  (अब पाकिस्तान में) उन दिनों भारत के उच्च शिक्षा-संस्थानों में से एक था,

2. चाणक्य का असली नाम क्या था

चाणक्य को बहुत से नामो से जाना जाता था जैसे की विष्णुगुप्त, वात्स्यायन, मल्लनाग, पक्षिलस्वामी, अंगलद्रमिल और कौटिल्य लेकिन सबसे ज्यादा लोग उन्हें चाणक्य के नाम से ही जानते थे।

3. acharya chanakya ka niwas  kaha tha

पाटलिपुत्र में था

4. kautilya kiske darbar me rahta tha

चाणक्य चंद्रगुप्त के दरबार में रहता था।

 

Chanakya hindi quotes

Chalo Padte hai Chanakya Quotes Hindi me

  • विष से भी अमत की प्राप्ति संभव हो तो निस्संकोच उसका सेवन कर लेना चाहिए।
  • राहु के लिए अमत भी मत्य का कारण बना. जबकि भगवान् शिव द्वारा ग्रहण किए जाने पर विष भी अमत बन गया।
  • अज्ञान कष्टप्रदायक होता है तथा इसके कारण मनुष्य उपहास का पात्र बन जाता है।
  • अतिथि का महत्त्व क्षणिक विराम में ही निहित है।
  • पैर की मोच और छोटी सोच , हमें आगे बढ़ने नहीं देती ।
  • निस्संकोच या निर्लज्ज होकर एक ही स्थान पर निवास करते रहना अतिथि के लिए अशोभनीय है।
  • दूरस्थ स्थान से आए अतिथि, थके-हारे पथिक तथा आश्रय हेतु आए व्यक्ति ईश्वर के समान होते हैं।
  • अति अत्यंत हानिकारक है। अति सुंदर होने के कारण ही रावण द्वारा सीता का हरण हुआ। अहंकार और गर्व की अति ही महाविद्वान् रावण की मृत्यु का कारण बनी। दैत्यराज बलि की । अति दानशीलता ने ही उसे सबकुछ गवाकर पाताल जाने के लिए विवश कर दिया।
  • अतिभक्ति चोर का लक्षण है। अति से सब जगह बचना चाहिए। ‘अति’ द्वारा मनुष्य का अंतनिश्चित है। अन्न जैसा स्वादिष्ट और रुचिकर भोज्य पदार्थ कोई दूसरा नहीं
  • बीजों के अभाव या कमी के कारण फसल भरपूर नहीं होती।
  • सेनापति के अभाव में सेना युद्ध में विजयश्री कभी प्राप्त नहीं कर सकती।
  • अभ्यास के बिना विद्वान् भी शास्त्रे का यथोचित वर्णन नहीं कर पाता और लोगों के बीच उपहास का पात्र बन जाता है ।
  • जो विद्वान् निरंतर अभ्यास नहीं करता, उसके लिए शास्त्र भी विष के समान हो जाते हैं।
  • आलस्य और अनभ्यास विद्वानों की बुद्धि को भी भ्रष्ट करके उनके ज्ञान का नाश कर देता है।
  • केवल निरंतर अभ्यास द्वारा प्राप्त विद्या की रक्षा की जा सकती है।
  • मनुष्य को अपनी दानवीरता, तप, साहसविज्ञान, विनम्रता और नीतिनिपुणता पर कभी अहंकार नहीं करना चाहिए।
  • जो मनुष्य अहंकार में डूब जाता है, वह अतिशीघ्र पापों में लिप्त होकर नष्ट हो जाता है।
  • राजा और गुरु की निकटता से व्यक्ति अहंकारी होकर दोष-युक्त हो जाता है।
  • मनुष्य का आचरण ही लोगों को अपने समक्ष नतमस्तक करने के लिए पर्याप्त है। इससे शत्रुओं पर भी विजय पाई जा सकती है।
  • गलत आचरण से सौंदर्य नष्ट हो जाता है।
  • जिसके क्रोध से कोई भयभीत न हो और जिसके प्रसन्न होने से भी किसी को कोई लाभ नहीं होता, ऐसे मनुष्य का आचरण किसी को प्रभावित नहीं कर सकता।
  • केबल आचरण ही मनुष्य को पशुओं से श्रेष्ठ सिद्ध करता है।
  • राजा अधर्मयुक्त आचरण करके नष्ट हो जाता है।
  • विवशता मनुष्य और उसके आचरण को पथभ्रष्ट होने से रोकती है ।
  • मनुष्य बिना अधिक परिश्रम किए केवल अच्छे आचरण और स्वभाव द्वारा ही विद्वान् व्यक्ति सज्जन पुरुष और पिता को संतुष्ट कर सकता है।
  • श्रेष्ठ आचरण एवं श्रेष्ठ गुणों के कारण साधारण मनुष्य श्रेष्ठता के शिखर की ओर अग्रसर होता है।
  • आत्मबल सभी बलों में सबसे श्रेष्ठ बल होता है।
  • मनुष्यशरीर में आत्मा का वास होता है। उसे देखा नहीं जा सकता, लेकिन विवेक द्वारा अनुभव अवश्य किया जा सकता है।
  • मनुष्य को विवेक द्वारा आत्मा को जाग्रत् करना चाहिए।
  • यदि मनुष्य का मन पापों एवं अशुद्धियों से परिपूर्ण है तो अनेक तीर्थस्नान करने के बाद भी उसकी आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती
  • कौआ, कबूतर, चिड़िया, तोता-ये सभी विभिन्न जाति और वर्ग के पक्षी होते हुए भी रात्रि-समय एक ही वृक्ष पर विश्राम करते हैं लेकिन प्रातः होते ही अपने-अपने मार्ग की ओर उड़ जाते हैं।
  • जीवात्माएँ भी इसी प्रकार परिवार रूपी वृक्ष पर कुछ समय के लिए बसेरा करती हैं। तदनंतर नियत समय आने पर वृक्ष को छोड़कर उड़ जाती हैं। इसलिए उनके जाने पर दुखी या शोकानुर नहीं होना चाहिए।
  • शरीर में स्थित आत्मा एक नदी है। यह नदी ईश्वर के शरीर से निकली है। धैर्य इसके किनारे हैं, करुणा इसकी लहरें हैं, पुण्य इसके तीर्थ हैं। जो मनुष्य सदा पुण्य कमों में लिप्त रहता है, वह इस नदी में स्नान करके पवित्र होता है।
  • लोभ-रहित आत्मा को ‘सदापवित्र’ कहा गया है।
  • आत्मा ही हमारा हितैषी और आत्मा ही हमारा शत्रु जो व्यक्ति अपनी आत्मा को जीत लेता है, वह आत्मा ही उसकी हितैषी बन जाती है।
  • प्रायः बुरे या नीच कर्म के बाद मनुष्य की आत्मा जाग्रत् हो उठती है और उसे अपने किए पर पश्चात्ताप होने लगता है। लेकिन बुरे कर्म करने से पूर्व ही उसे अच्छेबुरे का ज्ञान हो जाए तो वह बुरे कमों से सदा के लिए निवृत्त हो जाएगा ।
  • संसार ज्ञान के अथाह भंडार से परिपूर्ण है। जीवात्मा सहस्रों जन्म लेकर भी इस ज्ञान को पूरी तरह अर्जित नहीं कर सकती।
  • अपमान मृत्यु से भी अधिक पीड़ादायक और अहितकारी है।
  • अपनी मर्यादा के विपरीत कर्म करके ये दो प्रकार के लोग संसार में अपमान के भागी बनते हैं-एक, कर्महीन गृहस्थ और दूसरे सांसारिक मोह-माया में फ़ैसे संन्यासी।
  • अग्निए सपए सिंह तथा अपने कुल में जनमे व्यक्तियों का कभी अनादर नहीं करना चाहिए।
  • अपमानित व्यक्ति क्षणप्रतिक्षण अपमान का कड़वा गूंट पीता है समाज उसे घृणा की दृष्टि से देखता है सगे-संबंधी एवं मित्र आदि उसके साथ नीच व्यवहार करते हैं।
  • यहाँ तक कि उसकी पत्नी एवं पुत्र आदि भी उससे कतराने लगते हैं।
  • विघेला न होने पर भी जिस प्रकार सर्प के उठे हुए फन को देखकर लोग भयभीत हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रभावहीन व्यक्ति को भी आडंबर द्वारा समाज में अपना प्रभाव बनाकर रखना चाहए।
  • आडंबर-युक्त प्रभाव से भी लोग भयभीत रहते हैं।
  • उद्देश्य की प्राप्ति हेतु लिया गया आश्रय उद्देश्य के पूर्ण हो जाने के बाद अतिशीघ्र छोड़कर चले जाना चाहिए।
  • किसी दूसरे पर आश्रित होकर जीना सबसे अधिक कष्टदायक होता है।
  • इंद्रियों को अपने इच्छित कायों से सर्वथा दूर रखना तो मृत्यु को जीतने से भी कठिन है, लेकिन उन्हें बेलगाम छोड़ दिया जाए तो वे शीलवान देवगण को भी नष्ट कर देती हैं।
  • जो व्यक्ति इंद्रियों को जीतने के बजाय स्वयं उनका गुलाम बन जाता है, उसकी मुसीबतें शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की तरह बढ़ती जाती हैं।
  • जो राजा अपनी इंद्रियों और मन को जीते बिना अपने मंत्रियों को जीतना चाहता है तथा मंत्रियों को जीते बिना अपने शत्रुओं को जीतना चाहता , उसका नष्ट होना अवश्यंभावी है।

Chanakya Quotes on love hindi

  • इंद्रियों पर नियंत्रण करके मनुष्य जिनजिन बुराइयों को छोड़ना चाहता , वे छूटती जाती हैं और सारी बुराइयों से मुक्ति के बाद उसके कष्ट भी समाप्त हो जाते हैं।
  • जो पुरुष सबका भला चाहता हैवह किसी को कष्ट में नहीं देखना चाहता। जो सदा सच बोलता है, जो मन का कोमल है और जितेंद्रिय भी, उसे उत्तम पुरुष कहा जाता है।
  • जैसे बेकाबू और अप्रशिक्षित घोड़े पूर्व सारथि को मार्ग में ही गिराकर मार डालते हैं वैसे ही यदि इंद्रियों को वश में न किया जाए तो वे मनुष्य की जान की दुश्मन बन जाती हैं।
  • अज्ञानी लोग इंद्रियसुख को ही श्रेष्ठ समझकर आनंदित होते हैं। इस प्रकार के लोग अनर्थ को अर्थ और अर्थ को अनर्थ कर देते हैं तथा अनायास ही नाश के मार्ग पर चल पड़ते हैं।
  • जो व्यक्ति अपनी बेलगाम पाँचों इंद्रियों को गलत मार्ग पर चलने से नहीं रोकताउसका नाश अवश्यंभावी है।
  • जो व्यक्ति मन में घर बनाकर रहनेवाले काम, क्रोध, लोभमोह, मद (अहंकार) और मात्सर्य (ईष्य) नामक छह शत्रुओं को जीत लेता हैवह जितेंद्रिय हो जाता है।
  • ईश्वर मनुष्य के हृदय में वास करता है और मनुष्य इन्हीं भावों द्वारा निर्जीव वस्तुओं में ईश्वर की कल्पना कर सिद्धियाँ प्राप्त करता है।
  • ईश्वर जिसकी रक्षा करना चाहते , उसे बुद्धि दे देते हैं, डंडा लेकर उसके पीछे पहरा नहीं देते। लकड़ी, पत्थरधातु आदि से निर्मित देवप्रतिमाओं को साक्षात् देव मानकर पूजने पर ही ईशकृपा प्राप्त होती है।
  • ईश्वर बेजान वस्तुओं में नहींभावना में वास करते हैं। मनुष्य ईश्वर को प्रसन्न करके तभी उनसे वरदान प्राप्त कर सकता है, जब वह स्वयं अपने हाथों से उनकी सेवा करे।
  • कलियुग में जब संपूर्ण पृथ्वी पापियोंअधर्मियों और अत्याचारियों से भर जाएगी, तब भगवान् पृथ्वी का त्याग कर देंगे।
  • ईश्वरभक्ति में डूबे रहनेवाले व्यक्ति पाप-रहित होते
  • ईष्र्यालु लोगों को अपनी भलाई की बात भी कड़वी लगती उद्देश्य जो मनुष्य उद्देश्य-रहित होकर जीवन व्यतीत कर रहे , उन्हें न तो घर में शांति मिल सकती है और न ही वन में।
  • ऐसे मनुष्यों का जीवन बोझ के समान है जिनसे किसी को लाभ नहीं होता।
  • प्रत्येक कार्य बहुत सोचविचार करके और उद्देश्य निश्चित करके करना चाहिए।
  • मनुष्य को चाहिए कि पहले कार्य का उद्देश्य तय करेउसके परिणाम का आकलन करेउससे अपनी उन्नति का विचार करेफिर उसे आरंभ करे।
  • जीवन में उद्देश्य का होना अत्यंत आवश्यक है।
  • ‘ जो मनुष्य जीवन का उद्देश्य निर्धारित कर लेते हैं उनके जीवन में कभी भटकाव नहीं आता।
  • अपच की शिकायत में जल औषधि का कार्य करता है, अतः भरपूर जल का सेवन करें
  • औषधियों में अमृत सबसे श्रेष्ठ है। भलीभाँति उपयोग न किया जाए तो प्राण प्रदायक औषधियाँ प्राणों का हरण भी कर लेती हैं।
  • काम मनुष्य का सबसे प्रबल शत्रु है।
  • जो व्यक्ति काम के वशीभूत होकर नेत्रहीन हो जाता, वह देखने की शक्ति गंवा बैठता है।
  • कामक्रोध और लोभ-आत्मा को भ्रष्ट कर देनेवाले नरक के तीन द्वार कहे गए हैं।
  • वृद्धावस्था खूबसूरती को नष्ट कर देती है, निराशा वैर्य को, मृत्यु प्राणों को, निंदा धर्मपूर्ण व्यवहार को, क्रोध आर्थिक उन्नति को, दुर्जनों की सेवा सज्जनता को, कामभाव लाजशर्म को तथा अहंकार सबकुछ नष्ट कर देता है।
  • काम और क्रोध मिलकर विवेकशील ज्ञान को नष्ट कर देते हैं।
  • कामांध व्यक्ति पवित्रता के अर्थ और महत्व से अनभिज्ञ होता है।
  • वह ज्ञान बेकार है, जिससे कर्तव्य का बोध न हो। वह कर्तव्य बेकार है, जिसकी कोई सार्थकता न हो
  • मनुष्य जीवन में वही कर्म करता और भोगता , जो वह लिखवाकर लाया है।
  • आय से अधिक व्यय करना, बिना बात के दूसरों से लड़ना-झगड़ना तथा व्यभिचार-ये तीन कर्म मनुष्य और उसके कुल को विनाश की ओर धकेलते हैं।
  • उद्देश्य-रहित दीर्घकालिक जीवन की अपेक्षा शुभ कर्मों से युक्त अल्पकालिक जीवन अधिक श्रेष्ठ है।
  • जब तक पृथ्वी पर मनुष्य के सत्कमों का गुणगान होता हैतब तक वह स्वर्ग में भी पूजा जाता है।
  • सत्कर्मों से युक्त अल्पकालिक जीवन भी परम सुखदायक होता है।
  • प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल स्वयं ही भोगना पड़ता है।
  • कर्म ही मनुष्य को माया के बंधनों में जकड़े रहते हैं। मनुष्य का कार्य केवल कर्म करना है, लेकिन कर्मों के अनुसार उसका फल ईश्वर ही प्रदान करता है।
  • इच्छाओं का पूर्ण होना या न होना मनुष्य के भाग्य और कम पर निर्भर करता है।
  • मनुष्य जो कर्म करता हैउसका भाग्य उसी के अनुरुप उसे फल प्रदान करता है।
  • बुरे कर्म करके सुखों की कामना करना व्यर्थ है।
  • बछड़ा सहत्रों गौओं के बीच भी जैसे अपनी माता को पहचान लेता , उसी प्रकार कर्म भी अपने कर्ता को ढूंढ़ लेते हैं । मनुष्य का कर्मफल उसके कर्मों के साथ ही बँधा होता है।
  • मनुष्य जैसा कर्म करता , उसी के अनुरुप उसे अच्छे या बुरे फल की प्राप्ति होती है। मनुष्य-जीवन में आनेवाले , शोक, चिंताएँ बंधन तथा संकट पापकमों के ही फल हैं। दु:ख व क्लेश-रहित सुखमय जीवन सत्कर्मों से प्राप्त होता है।
  • संसार में केवल काल अर्थात् समय ही सबसे शक्तिशाली है।
  • काल का चक्र निरंतर गतिशील रहता है। इसके समक्ष बड़ेसे-बड़ा ज्ञानी, विद्वान् और पुण्यात्मा भी असहाय हो जाता है। चीर और निर्भय क्षत्रिय भी परास्त हो जाता है।
  • ‘ मनुष्य-जीवन की चारों अवस्थाएं काल के अनुरूप ही कार्य करती हैं।
  • काल को जीतना असंभव है।
  • बीता हुआ समय लौटकर नहीं आताउसमें घटित घटनाओं को बदला नहीं जा सकता। इसलिए उसे बारबार याद करने से कोई लाभ नहीं होता।
  • भविष्य में क्या घटित होने वाला हैमनुष्य इससे
    पूर्णतः अनभिज्ञ होता है। इसलिए उसका चिंतन व्यर्थ है।
  • मनुष्य को केवल अपने वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिएयदि वह वर्तमान को सुधार लेगा तो
  • उसका भविष्य अपने आप ही उज्ज्वल हो जाएगा।
  • विधि का विधान कोई बदल नहीं सकता।

 

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chanakya quotes in hindi for success

  • समय को देखे बिना कार्य करनेवाले सदैव असफलता का मुख देखते हैं।
  • नीच कुल में जनमा विद्वान् एवं गुणों से युक्त व्यक्ति भी समाज में ऊँचा स्थान प्राप्त करता है।
  • कुल की शोभा सदाचार में निहित होती है।
  • व्यक्ति के आचरण पर ही कुल की श्रेष्ठता निर्भर करती है।
  • जो मनुष्य मानमर्यादा का पालन करता है, धर्मनिष्ठ है, अपनी सज्जनता नहीं त्यागता, वह चाहे उत्तम कुल में पैदा हुआ हो या नीच कुल , हजारों कुलीनों से श्रेष्ठ होता है।
  • पथभ्रष्ट होने कुल कलंकित हो जाता है। विद्वत्ता एवं गुणों के अभाव में उच्च कुल में जनमा व्यक्ति भी तिरस्कार का भागी बन जाता है।
  • महान् बनने के लिए मनुष्य का उच्च कुल में जन्म लेना ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए उसका सहनशीलसंतोषी, विद्वान् एवं परोपकारी होना भी आवश्यक है।
  • भवन की छत पर बैठने से कौआ गरुड़ नहीं हो जाता।
  • कौआ यह नहीं जानता कि उसे क्या खाना चाहिए और क्या नहीं।
  • नेवें से क्रोध का ज्ञान होता है।
  • क्रोध भयंकर अग्नि के समान है, जो अपनी लपटों से मनुष्य को बार-बार प्रताड़ित करता है।
  • निर्धनता एवं अक्षमता के बावजूद धनसंपत्ति की इच्छा तथा अक्षम एवं असमर्थ होने के बावजूद क्रोध करना—ये दोनों अवगुण शरीर में काँटों की तरह चुभकर उसे सुखाकर रख देते हैं।
  • क्रोध एक तीक्ष्ण विष , जो कड़वा, सिरदर्द पैदा करनेवाला, पापी, क्रूर और प्रकृति में गरम है। दुष्ट प्रकृति के लोग इसे नहीं पी सकतेसज्जन पी जाते मनुष्य को क्रोध से बचते हुए शांतिपूर्वक समस्त कष्टों को सहना चाहिए।
  • क्रोध व्यक्ति का पूर्णतः सर्वनाश कर डालता है। – क्रोध साक्षात् यम का स्वरूप है, जो अपने विकराल मुख से व्यक्ति को ग्रसने के लिए सदा तत्पर रहता
  • क्षत्रिय तलवार की धार पर चलकर स्वय को सम्मानित और गौरवान्वित अनुभव करता है।
  • गाय
    गायें गंध से देखती हैं, ज्ञानी लोग वेदों से, राजा गुप्तचरों से तथा जनसामान्य नेसे देखते हैं।
  • जो गाय कठिनाई से दूध देती है, उसे बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं। जो गाय सरलता से दूध देती है उसे कोई कष्ट नहीं होता।
  • जो बाँझ गाय दूध नहीं देतीउसे घर में रखने का लाभ नहीं है।
  • गायत्री मंत्र
    मंचें में गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ और समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है।
  • गुण/अवगुण
    स्वाभाविक गुणदोष प्रत्येक प्राणी की व्यक्तिगत उपलब्धि होते हैं। ये प्राणी के अंदर जन्म के साथ प्रकट होते हैं इन्हें कहीं भी बाहर से ग्रहण नहीं करना पड़ता।
  • बुद्धि, उत्तम कुलजितेंद्रियताज्ञानसंयमित वाणी पराक्रम यथा शक्ति दान और कृतज्ञता ये आठ गुण व्यक्ति की शोभा बढ़ाते हैं।
  • यज्ञ, दान, अध्ययन तथा तपश्चर्या ये चार गुण सज्जनों के साथ रहते हैं और इंद्रियदमनसत्य, सरलता तथा कोमलता- इन चार गुणों का सज्जन पुरुष अनुसरण करते हैं।
  • अच्छाई में बुराई देखना मृत्यु जैसा कष्टकारी अवगुण ‘ कुल में उत्पन्न एक गुणवान् पुत्र ही संपूर्ण कुल का उद्धार कर देता है।
  • घोर अहंकारवाचालता, भोग प्रवृत्ति, क्रोध स्वउदर-पोषण और मित्र से घात ये छह अवगुण मनुष्य की आयु को क्षीण करते हैं।
  • धन और स्वास्थ्य मनुष्य के दो सबसे बड़े गुण हैं। अवगुणी पुत्र अपने कमों द्वारा संपूर्ण कुल को कलंकित कर देता है।
  • केवल गुण ही प्रेम होने का कारण , बल प्रयोग नहीं।
  • मनुष्य अपने आसपास के प्राणियों से कुछन- कुछ अवश्य सीख सकता है। राजपुत्र से नम्रता और विनयशीलताविद्वानों से स्नेहयुक्त मधुर वचन बोलने की कलाजुआरियों से मिथ्या भाषण की कला तथा स्त्रियों से छलकपट का गुण ग्रहण करना चाहिए।
  • संसार में उन्नति के अभिलाषी व्यक्तियों को नींद, तंद्रा (य), भयक्रोध, आलस्य तथा देर से काम करने की आदत -इन छह दुर्गुणों को सदा के लिए त्याग देना चाहिए।
  • जल्दबाजी, बात पर ध्यान न देना तथा आत्मप्रशसा- ये तीन अवगुण ज्ञान के शत्रु हैं।
  • व्यक्ति को कभी भी सच्चाईदानशीलता निरालस्य, द्वेषहीनता, क्षमाशीलता और धैर्य इन छह गुणों का त्याग नहीं करना चाहिए ।
  • बुद्धि, उच्च कुलइंद्रियों पर काबू, शास्त्र-ज्ञान, पराक्रमकम बोलना, यथाशक्ति दान देना तथा कृतज्ञता—ये आठ गुण मनुष्य की ख्याति बढ़ाते हैं। आयु के स्थान पर मनुष्य को गुणअवगुण के आधार पर परखना चाहिए।
  • गुणवान व्यक्ति का विवेकशील होना आवश्यक है। ‘जब तक गुणी एवं विवेकी व्यक्ति को यथोचित स्थान प्राप्त नहीं होता, तब तक वह मूल्यहीन एवं तिरस्कृत रहता है।
  • सच्चाई, खूबसूरती, शास्त्रज्ञान, उत्तम कुलशील पराक्रमधनशौर्यविनय और वाव्फ़पटुता—ये गुण समस्त ऐश्वर्य पाने के साधन हैं।
  • उचित स्थान प्राप्त करने के बाद ही किसी गुणी व्यक्ति के गुणों को समाज द्वारा स्वीकारा जाता है। विद्वान् व्यक्ति का एक छोटा सा अवगुण उसके लिए अभिशाप बन जाता है।
  • कभीकभी अनेक अवगुणों पर एक गुण भी बहुत आते हों, ऐसा व्यक्ति संसार में श्रेष्ठ होता है। उसके लिए तीनों लोक ही अपने देश के समान हो जाते हैं।
  • —अर्थात् वह तीनों लोकों का स्वामी हो जाता है।
  • लेकिन ऐसी स्थिति प्राप्त करने के लिए मनुष्य में सज्जनता, परोपकार, सहनशीलता तथा दानवीरता के गुण होने चाहिए।
  • – केवल एक गुण के कारण ही अवगुणी होते हुए भी मनुष्य समाज में मानसम्मान प्राप्त कर लेता है।
  • भले ही मनुष्य दुजनों की संगति करता हो, भयानक एवं कुरूप हो या नीच कुल में जनमा हो, लेकिन यदि उसमें बुद्धिविवेक का गुण है तो वह अवगुणों से युक्त होते हुए भी विद्वानों की सभा में सम्मानित होता है।
  • जो व्यक्ति विद्वान् न हो, उसे गुरु न मानें। ब्राह्मणक्षत्रिय और वैश्य के लिए अग्नि ही गुरु के समान है।
  • स्त्रियों के लिए उनके पति गुरु हैं।
  • गुरु के आदेश का यथोचित पालन न करने पर अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं।
  • गुरु की कृपा से ही मनुष्य मोहमाया के चक्र को भेदकर ब्रह्म-दर्शन के योग्य बनता है।
  • श्वर और भक्त के बीच में गुरु सेतु का कार्य करता
  • संपूर्ण वृक्ष जड़ पर टिका होता है। यदि जड़ नष्ट या कमजोर हो जाए तो वृक्ष को सूखते समय नहीं लगताइसलिए जड़ की यथासंभव रक्षा करनी चाहिए।
  • जो व्यक्ति सावधान, सजग और जागरुक होगा, कोई उसका अहित नहीं कर सकता है।
  • संसार में शांति से बढ़कर कोई तप नहीं है।
  • तप द्वारा मनुष्य को ऊंचा पद मिलता है।
  • दो समान ताकतें जब लड़ती हैं तो दोनों का ही नुकसान होता है।
  • ताकत ही मैत्री कायम रखने का मुख्य घटक है।
  • धन की ताकत से सेनाएँ जन्म लेती हैं।
  • सेना के खजाने (ताकत’ से धन रूपी पृथ्वी की रक्षा होती है।
  • युद्ध जीत लेने के बावजूद धन और सैन्य ताकत के दंड द्वारा लोगों को काबू में रखा जाता है।
  • आत्मनियंत्रित लोग गिने चुने हैं।
  • आत्मसुरक्षा में सबकी सुरक्षा निहित है।
  • अमानवीय दड से राजा सबकी घणा का पात्र बन जाता है।
  • क्षत दड सावधानीपूर्वक देना चाहिए। उसी दंड का लाभ , जिससे अपराधों पर लगाम लग सके।
  • दान ही दरिद्रता को नष्ट करने का सशक्त साधन है।
    दान ऐसे मनुष्य को दे , जो दरिद्र हो।
  • जिस प्रकार समुद्र का जल ग्रहण कर मेघ उसे समृद्धिदायक वर्षा के रूप में खेतों पर बरसाते हैं।
  • और वही जल कई गुना होकर पुनः समुद्र में जा मिलता है, उसी प्रकार दान का वास्तविक अधिकारी वही व्यक्ति है जो सहनशीलता, विद्वत्ता, ईमानदारी सज्जनता आदि गुणों से संपन्न हो।
  • दान हर किसी को नहीं देना चाहिए।
  • योग्य व्यक्ति को दिया गया दान सहन गुना होकर वापस मिलता है।
  • जो व्यक्ति निधन होने पर भी दानशील हो, उसे स्वर्ग से भी ऊपर स्थान प्राप्त होता है।
  • न्याय और मेहनत से कमाए धन के ये दो दुरुपयोग कहे गए हैं-एक, कुपात्र को दान देना और दूसरा,
  • रक्षा का भाव आदि जैसे सद्ण नहीं होते।
  • मनुष्यों में नाई, पक्षियों में कौआ, पशुओं में गीदड़ और स्त्रियों में मालिन सबसे धूर्त व मक्कार होते हैं।
  • दुष्ट और दुर्जन व्यक्तियों को धन की महत्वाकाक्षा होती है। उसे प्राप्त करने के लिए वे नीच कार्य करने से भी पीछे नहीं हटते। धन-प्राप्ति ही उनका एकमात्र ध्येय होता है।
  • सत्य, क्षमा, दया और अलोभ को दुर्जन लोग चाहकर भी नहीं अपना सकते। ये उनके लिए दुलभ दुर्जन व्यक्ति काँटों के समान होते , इसलिए या तो उन्हें जूते से मसल दें या उन्हें देखकर अपना मार्ग बदल लें।
  • दूसरों की उन्नति को देखकर ईष्र्या करना दुर्जन व्यक्ति का जन्मजात स्वभाव होता है।
  • किसी अवसर पर सज्जनों द्वारा पूजित होने पर दुष्ट और अत्याचारी लोग भी स्वयं को सज्जन समझने का भ्रम पाल लेते हैं।
  • गुणहीन मनुष्य दुर्जन है।
  • दुष्ट व्यक्ति गुप्त रहस्य छिपाकर नहीं रख सकता। बुरे कमर्थों में लिप्त दुर्जन व्यक्ति अपने साथ-साथ अपने वंश को भी कलंकित करता है।
  • दुर्जन व्यक्ति विपैले जीवों के समान होते हैं।
  • सर्प का विष उसके दाँत में, मधुमक्खी का मस्तक में
    तथा बिच्छू का पुंछ में होता है जबकि दुर्जन व्यक्ति की संपूर्ण देह विषयुक्त होती है।
  • दुर्जन व्यक्ति कितना भी वृद्ध हो जाएउसमें दुष्टता और पाप विद्यमान रहते हैं।
  • धीर पुरुष सरल, संयमी, विनयी और लज्जाशील होते , जिन्हें दुर्जन लोग कमजोर मानकर तिरस्कृत करते हैं। दुर्जनों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
  • जो व्यक्ति दानादि। से विमुख रहते , वेदों के श्रवण को महत्वहीन मानते हैंजिनकी दृष्टि में संत- महात्माओं के दर्शन निरर्थक हैं, जिन्होंने कभी भी तीर्थयात्र का सुख नहीं भोगा, जिनके पेट पाप की कमाई से भरे हुए , जिन्होंने अभिमान और अहंकार के आवरण से खुद को ढक रखा है, वे मनुष्य नीच दुष्ट और स्वार्थी कहे जाते हैं।
  • दुष्ट व्यक्ति की निकटता अत्यंत हानिकारक और संकटदायक होती है।
  • संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं , जिसने दुर्जन व्यक्तियों के कारण संकटों का सामना न किया हो। सन्मार्ग की ओर अग्रसर करनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को दुर्जन अपना शत्रु मानते हैं।

 

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 Chanakya Funny quotes in hindi

  • दुराचारियों से बचने के लिए देश का त्याग भी निस्संकोच कर देना चाहिए।
  • हाथी को अंकुश, घोड़े को चाबुक तथा सींगवाले पशुओं को डंडे से जिस प्रकार वश में किया जाता , उसी प्रकार दुर्जन को वश में करने के लिए तलवार इसमें मेघों का दोष नहीं है।
  • शत्रुओं से छेष होने पर प्राणों के साथसाथ धन की भी हानि होती है।
  • राजा से द्वेष करने पर प्राण एवं धन सहित मान सम्मान का भी नाश हो जाता है।
  • जो व्यक्ति दूसरों की धनसंपत्तिसौंदर्यपराक्रम उच्च कुलसुखसौभाग्य और सम्मान से ईष्र्या व द्वेष करता है, वह असाध्य रोगी है। उसका यह रोग कभी ठीक नहीं होता।
  • ब्राह्मण (विद्वान्) से इष करने के परिणामस्वरुप मनुष्य का धनप्राणसम्मान जाता ही , साथ में उसके संपूर्ण कुल का भी नाश हो जाता है।
  • विपत्ति काल के लिए मनुष्यों को धन का संचय अवश्य करना चाहिए लेकिन कभी यह न सोचें कि धन द्वारा वे विपत्ति को दूर करने में समर्थ हो जाएंगे। धन का संचय मनुष्य की बुद्धिमत्ता का परिचायक धन का अनुचित व्यय करने से वह नष्ट हो जाता है। अन्याय से कमाए गए धन से दोष नहीं छिपते बल्कि कई और दोष उघड़ जाते हैं।
  • परदेश में मनुष्य को अपने पास उपलब्ध संसाधनों से ही संतोष करना चाहिए।
  • जो वस्तु मनुष्य के लिए असाध्य है, उसकी सीमा से परे है, उसे तप अर्थात् अथक परिश्रम करके प्राप्त किया जा सकता है।
  • श्रम की शक्ति असीमित होती है इसके बल पर असंभव भी संभव हो जाता है।
  • परिश्रम से कभी जी न चुराएँ परिश्रम करके अपने जीवन को सुखमय बनाएँ।
  • काम के उत्तरदायित्व से सेवकों की, कष्ट या संकट के समय मिर्यों की, द:ख या असाध्य बीमारी में सगे- संबंधियों की तथा धनहीन होने पर स्त्री की परीक्षा होती है।
  • केवल परोपकार और परहित की भावना ही मनुष्य को पवित्र करती है।
  • जिनका हृदय परोपकार से भरा हुआ हैउन्हें कभी विपत्तियों का सामना नहीं करना पड़ता।
  • स्वाद और सार्थकता से अनभिज्ञ रहती है।
  • जो धातुएँ बिना गरम किए मुड़ जाती , उन्हें आग में तपने का कष्ट नहीं उठाना पड़ता। जो लकड़ी पहले से झुकी होती , उसे कोई नहीं झुकाता।
  • पशुओं के रक्षक बादल होते , राजा के रक्षक उसके मंत्री, पत्नियों के रक्षक उनके पति तथा वेदों के रक्षक ब्राह्मण (ज्ञानी पुरुष) होते हैं।
  • धर्म की रक्षा सत्य से होती , विद्या की रक्षा अभ्यास से, सौंदर्य की रक्षा स्वच्छता से तथा कुल की रक्षा सदाचार से होती है।
  • भक्त, सेवक तथा ‘मैं आपका ‘ कहकर शरण में आए इन तीनों व्यक्तियों को मुसीबत के समय भी नहीं छोड़ना चाहिए।
  • अल्प बुद्धिवालेदरी से कार्य करनेवालेजल्दबाजी करनेवाले और चाटुकार लोगों के साथ गुप्त विचार विमर्श नहीं करना चाहिए।
  • परिवार में सुखशांति और धनसंपत्ति बनाए रखने के लिए घर के बड़ेबूढ़ों, मुसीबत के मारे कुलीन व्यक्ति, गरीब मित्र तथा निस्संतान बहन को आदर सहित स्थान देना चाहिए ।
  • जिस तालाब का पानी पीने योग्य नहीं होता, उसमें बहुत जल भरा होता है।
  • उंगली प्रवेश होने के बाद हाथ प्रवेश किया जाता शर की कृपा से बकरी जंगल में बिना भय के चरती
  • कड़वा बोलनेवाला, अत्याचारीअन्यायी तथा कुटिल पुरुष पापकर्मों में लिप्त रहता है और शीघ्र ही मुसीबतों से घिर जाता है।
  • हर देिन ऐसा कार्य करें कि हर रात सुख से कटे जो कुडूबी सज्जन होते हैं वे ‘तारक होते हैं और जो कुडूबी दुर्जन होते हैं वे ‘मारक’ होते हैं।
  • जो काम करके अंतकाल में अकेले बैठकर पछताना पड़ेउसे शुरु ही नहीं होने देना चाहिए।
  • जो व्यक्ति बात के मर्म को समझकर उसी के अनुसार कार्य करता है, संसार में उसकी कीर्ति अक्षुण्ण रहती है।
  • सज्जनता से अपकीर्ति दूर की जा सकती है।
  • शिष्ट व्यवहार से बुरी आदतों को बदला जा सकता जो व्यक्ति गलत काया से धन कमाकर श्राद्धयज्ञ, हवन आदि अनुष्ठान करता , मृत्यु के बाद उसे इन कमों का सुफल नहीं मिलता क्योंकि अध से कमाए धन से धर्म अर्जित नहीं होता।
  • क्रोध को प्रेम , दुष्ट को सद्व्यवहार सेकंजूस को दान से तथा झूठ को सच से जीतना चाहिए।
  • सोकर नींद को नहीं जीता जा सकता, शारीरिक तुष्टि द्वारा स्त्री को नहीं जीता जा सकतालकड़ी डालकर आग को नहीं जीता (बुझाया) जा सकता तथा शराब पीकर उसकी लत को नहीं जीता जा सकता।
  • कुडूबी लोग तारनेवाले भी होते हैं और डुबोनेवाले जो व्यक्ति मुसीबत के समय भी कभी विचलित नहीं होता, बल्कि सावधानी से अपने काम में लगा रहता है, विपरीत समय में दु:खों को हँसतेहँसते सह जाता , उसके सामने शत्रु टिक ही नहीं सकते वे तूफान में तिनकों के समान उड़कर छितरा जाते हैं।
  • विनाशकाल के समय बुद्धि विपरीत हो जाती है। ऐसे व्यक्ति के मन में न्याय के स्थान पर अन्याय घर कर लेता है।
  • शुभ और कल्याणकारी कार्यों में लगे व्यक्ति के सभी उद्देश्य पूरे होते रहते हैं।
  • आग में तपाकर सोने की, सदाचार से सज्जन की, व्यवहार से संत पुरुष की , संकट काल में योद्धा की, आर्थिक संकट में धीर की तथा घोर संकट काल में मित्र और शत्रु की पहचान होती है।
  • अच्छे कर्मों से धन लक्ष्मी की उत्पत्ति होती है, चातुर्य से वह वृद्धि करती है, कौशल से जड़ जमा लेती है। तथा धीरता स्थायी होती है।
  • जो मनुष्य सदा बुरे कर्मों में लिप्त रहता है, उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती हैफिर उसे अच्छे में भी बुरे ही कर्म दिखाई देते हैं।
  • अच्छाई में बुराई देखनेवाला, उपहास उड़ानेवाला,
  • चरित्रहीन स्त्री की अपेक्षा कुरूप किंतु ज्ञानवान् एवं विवेकी स्त्री अधिक सुंदर है।
  • स्त्रियों को अनावश्यक भ्रमण की प्रवृत्ति से दूर रहना चाहिए।
  • व्यभिचारिणी पत्नी के बिना रहना अधिक श्रेयस्कर स्त्री की शक्ति के विषय में मनुष्य अनभिज्ञ होते हैं। चरित्रहीन स्त्री से दूर रहें, अन्यथा वह बदनामी का कारण बन जाएगी।
  • पत्नी वृद्धावस्था में सच्ची साथी होती है। जो स्त्री यथावत् पतिव्रत धर्म का पालन नहीं करती तथा जो कपट बुद्धि की होती , उससे प्रेम और सुख की कभी प्राप्ति नहीं होती।
  • पत्नी चाहे कुरूप हो या रूपवान, दुष्ट हो या सुशील मूख हो या बुद्धिमान मनुष्य को उसका परित्याग नहीं करना चाहिए।
  • स्त्रियों की शक्ति उनका रूपसौंदर्ययौवन और मृदु भाषा है।
  • व्यभिचारिणी पत्नी के लिए उसका पति शत्रु के समान होता है, क्योंकि वह उसकी स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाने का प्रयास करता है।
  • स्त्री की निकटता अनेक विकार उत्पन्न करती है तथा दूर रहने पर उसके पथभ्रष्ट होने का भय रहता है।
  • जो स्त्री पति की छोटी-से-छोटी आज्ञा का भी पालन करती हैउसका लोक-परलोक सुधर जाता
  • स्त्री भी धन के समान है, इसलिए उसकी भी रक्षा कर । लेकिन इससे पूर्व मनुष्य को अपनी सुरक्षा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। यदि वह स्वयं सुरक्षित , तभी धन और स्त्री की रक्षा करने में समर्थ होगा।
  • पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का आहार दुगुना, लज्जा चौगुनी, साहस छह गुना तथा कामभाव आठ गुना अधिक होता है।
  • योगी के लिए स्त्री शवतुल्य , कामांध व्यक्ति के लिए रूप-सौंदर्य की प्रतिमा तथा धान के लिए मांस के पिंड के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
  • स्त्रियों का आदर करें, लेकिन उनके अधीन न हों। स्त्रियों को घर की लक्ष्मी कहा गया है। उनकी यत्नपूर्वक रक्षा करें।
  • जो स्त्री अत्यंत क्रोधी हो, उसे पत्नी-रूप में कभी ग्रहण न करें
  • स्त्री यदि हठ पर आ जाए तो वह क्या कर सकती है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
  • पतिव्रता नारी के समान तेजस्वी कोई अन्य नहीं होता।
  • पति को सुख देनेवाली स्त्री ही वास्तव में पत्नी कहलाती है।
  • व्यापार में लोक-व्यवहार और घर के लिए उत्तम गुणों से युक्त स्त्री उपयुक्त है।

Other Important chanakya quotes in hindi

  • मोह समस्त दुःखों की जड़ है।
  • मोह ही जीवात्मा को बार-बार जीवन-मृत्यु के चक्र की ओर धकेलता है।
  • मोहरहित मनुष्य के लिए सभी एक समान होते हैं। उसे न तो किसी के दुखी होने से दुःख होता है और न ही किसी के सुखी होने से सुख।
  • विद्वान् मनुष्य को अत्यधिक मोह का परित्याग करके सुखमय जीवन व्यतीत करना चाहिए।
  • मोहमाया से ग्रस्त संसार विषयवासनाओं की ओर धकेलता है।
  • मौन रहने से वादविवाद नहीं होता।
  • भोजन के समय मनुष्य को मौन रहना चाहिए।
  • एक वर्ष तक नियमित मौन धारण कर भोजन करनेवाला मनुष्य कई युगों तक स्वर्ग का सुख भोगता है। देवगण भी उसकी नित्य पूजा करते हैं।
  • यज्ञ करते समय यदि उसके विधिविधान में किसी प्रकार की कमी रह जाए तो यज्ञ फलप्रदायक की अपेक्षा कष्टप्रदायक बन जाता है।
  • कटु वचन बोलनेवाली स्त्री, पापयुक्त आचरण करनेवाले मित्र तथा विश्वासघाती एवं स्वेच्छाचारी सेवक की संगति करनेवाले मनुष्य के निकट निश्चय ही मृत्यु का वास होता है। ऐसा मनुष्य कभी भी मृत्यु का ग्रास बन सकता है।
  • जीवन और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
  • आज तक ऐसा कोई प्राणी नहीं हुआ, जिसने मृत्यु को जीत लिया हो।
  • अधम मनुष्य जीवित होते हुए भी मृतक के समान जीवन भर शुभ एवं सत्कर्म करनेवाला मनुष्य मृत्यु के उपरांत भी स्मरणीय होता है।
  • अग्नि में जलने के बाद परलोक में जीव के साथ केवल उसके पाप और पुण्य जाते हैं।
  • मनुष्य देह नाशवान है, इसलिए देह का अभिमान नहीं करना चाहिए।
  • मृतक के साथ केवल उसके अच्छे और बुरे कर्म जाते
  • बुरे समय में मनुष्य की बुद्धि और विवेक उसका साथ छोड़ जाते हैं।
  • मनुष्य को कभी किसी असहाय एवं पीड़ित व्यक्ति का उपहास नहीं उड़ाना चाहिए।
  • मनुष्य को नारी के साथ अनावश्यक या अत्यधिक संसर्ग से बचना चाहिए
  • जो व्यक्ति धर्मकर्म और नैतिक गुणों से युक्त , वास्तव में वही मनुष्य कहलाने का अधिकारी है।
  • समर्थ मनुष्य द्वारा किया गया अनुचित काय भी लोगों को उचित प्रतीत होता है।
  • असमर्थ व्यक्ति द्वारा संपन्न उचित कार्य को भी लोग संदेह की दृष्टि से देखते हैं।
  • जिस मनुष्य ने लोक को सुधारने के लिए पर्याप्त धन का संग्रह नहीं कियाजो सांसारिक मायाजाल से मुक्त होने के लिए ईश्वरभक्ति नहीं करता, जिसने कभी रतिक्रिया का स्वाद न चखा हो-ऐसे मनुष्य का न तो लोक में भला होता है और न ही परलोक सुधरता है।
  • किसी सुंदर नवयुवती द्वारा स्नेहयुक्त अथवा चंचल व्यवहार करते देख जो यह समझने लगता है कि वह उससे प्रेम करने लगी , वह मनुष्य शीघ्र ही अपना सर्वस्व खो बैठता है।
  • मनुष्य जैसे भाग्य के साथ जन्म लेता है, उसकी बुद्धि भी उसी के अनुसार हो जाती है।
  • मनुष्य जीवन भर जिन दुखों एवं कष्टों को भोगता , उसमें उसका कोई दोष नहीं होता। ये उसके भाग्य में पहले से ही लिखे हुए होते हैं।
  • मनुष्य को भाग्यानुसार ही सगेसंबंधी एवं मित्र आदि मिलते हैं।
  • मनुष्य को वही सब मिलता है, जो उसके भाग्य में लिखा होता है।
  • भाग्य से पार पाना किसी के वश में नहीं है। यह भाग्य का ही खेल है कि एक राजा पल भर में रंक और एक रंक पल भर में राजा बन सकता है।
  • ईश्वर ने मनुष्य का जैसा भाग्य लिख दियाउसे उसी के अनुसार फल भोगना है।
  • भाग्य को किसी भी तरह से बदला नहीं जा सकता। भाग्य के फलस्वरूप मनुष्य-जीवन में ऐसी अनेक घटनाएं घटित होती , जिनके बारे में कोई कुछ नहीं

 

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