उनके जीवन से जुडी हुई 5 कहानियाँ dr Bhimrao Ambedkar History in hindi !

भीमराव अम्बेडकर का जन्म 6 दिसम्बर 1 9 56 में हुवा था , जिसे सब बाबा साहब के नाम से जानते है वो एक भारतीय विधिशास्त्री, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और सामाजिक सुधारक थे जिन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) के खिलाफ सामाजिक भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाया था । वह स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री थे और भारत के संविधान के प्रमुख वास्तुकार और भारत गणराज्य के संस्थापक पिता थे।

आईये पढ़ते है Dr Bimrao Ambedkar History की बारे में लेकिन उससे पहले में आपको उनके जीवन की 5 कहानियाँ सुनाऊंगा जो आपको बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करेंगी

Dr Bimrao Ambedkar History

 

dr Bhim Rao Ambedkar story No 1:आखिर क्यों

भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को रामजी मालोत्री के घर हुआ था। मां का अनुरूप होने क कारण उनका नाम भीम रखा गया। पारिवारिक परम्परा के अनुसार उनका पूरा नाम भीमराव रामजी सकपाल रखा गया। चूंकि उनका परिवार जाति से महार था, अत: उनके जीवन में कई ऐसी घटनाएं घटी , जिनसे उन्हें बहुत आघात लगा। उन घटनाओं में से एक घटना इस प्रकार है उनका स्कूल घर से दूर पड़ता था। दोपहर के बाद का समय था।

स्कूल की छुट्टी हो गयी थी। पसीने से लथपथ भीमराव लौट रहे थे, अधिक प्यास से गला सूख रहा था। कुआं दिखा कुएं की जगत पर डोल बाल्टी रखी थी। उनसे रह नहीं गया। बस्ता रख, कुएं की जगत पर चढ़ गये। पानी निकालकर हाथ-मुंह धोया, फिर पानी पीने लगे। तब तक एक व्यक्ति की निगाह पड़ गयी।

‘‘कौन है रे तू? ”

वह व्यक्ति भीमराव को जानता था। किसका बेटा है, उसे पता था।  वह चीख पड़ा-‘‘हरामजादे, कुत्ते ! तूने कुएं पर चढ़कर पानी क्यों पिया?”
‘‘प्यास लगी थी. .”
‘‘मांग कर नहीं पी सकता था। साला महार होकर कुएं पर चढ़ गया।”

शोर सुनकर आसपास क लोग आ गये। सब जानते ही, वह सब उन पर बरस पड़े। ‘‘इसने तो कुआं अपवित्र कर दिया।”
‘मारो साले को।’
लोग पीटने लगे।

” पीटो इसको। इसे याद तो रहेगा जिन्दगी और चलकर ऐसी हरकत फिर तो न करेगा।”
”हां, मारो, मारो, पीटो।” भीमराव को निर्दयतापूर्वक पीटा गया। वह रोने के अलावा और क्या कर सकता था ।

रोते-राते घर आये। परिवार के सदस्यों को सब बताया। सुनकर सब चुप रह गये । कोई कुछ न बोला। बड़े भाई ने धीरे-से कहा-‘‘ऐसी गलती मत करना, हम लोग कुएं पर नहीं चढ़ सकते हैं। ”

भीमराव अपने भाई की ओर आंखें फाड़कर देखते रहे।

यह सवाल पूछने का साहस न हुआ कि आखिर क्यों ?

 

 

dr Bhim Rao Ambedkar story No 2: सपना पूरा हुआ

 

भीमराव ने अपनी बी. ए. की डिग्री अंग्रेजी और पारसियन से ली थी। भीमराव कठोर श्रम और अत्यन्त मितव्ययिता के साथ जी-जान से अध्ययन में लग गये। समय भागता गया। सन् 1915 में भीमराव ने एमए. की डिग्री के लिए अपना शोध प्रबन्ध तैयार किया। उनके शोध का विषय था-‘एनसियट इंडियन काम (प्राचीन भारतीय वाणिज्य)। उनका यह निबन्ध अत्यन्त शोधपूर्ण था। समीक्षकों ने इस निबन्ध की भूरि-भूरि प्रशसा की।

फलत: उनको एमए. की डिग्री मिल गयी। सन् 1916 में डॉक्टर गोल्डन वाइजर के नेतृत्व में ‘एन्थ्रोपालाजी सेमिनार में उन्होंने ‘कास्ट्स इन इंडिया’ (भारत में जातिवाद) पर एक सशक्त निबन्ध पेश किया। इस निबन्ध ने तहलका मचा दिया। एम. एकी डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने पी. एचडी. (डॉक्टर की डिग्री) के लिए काम शुरु कर दिया। इसके लिए उनके शोधप्रबन्ध (थीसिस) का विषय था-‘नेशनल डिविडेन्ड ऑफ इंडिया: ए हिस्टारिक एण्ड एनालीटिकल स्टडी।’

अपनी यह थीसिस उनको कोलम्बिया विश्वविद्यालय को देनी थी। अपना यह शोध प्रबन्ध तैयार करने के लिए भीमराव ने रातदिन एक करना शुरु किया। सैकड़ों पुस्तकों और प्रमाणिक दस्तावेजों का धैयपूर्वक अध्ययन कर उन्होंने अपनी थीसिस लिखना शुरु कर दिया।

वह लगातार अट्ठारह से बीस घण्टे तक काम करते थे। उनका यह परिश्रम देखकर उनके साथी हैरान थे।

भीमराव के प्रति वह अपनी हमदर्दी व्यक्त करते थे, पर भीमराव अपनी थीसिस का कार्य शीघ्र-से-शीघ्र समाप्त कर देना चाहते थे।

 

अंतत: रातदिन एक कर, उन्होंने अपना शोध-प्रबन्ध तैयार कर सम्बन्धित विभाग को सौंप दिया। जून 1916 में उनका यह शोधप्रबन्ध स्वीकृत हो गया।

उनको पी. एच. डी. (डॉक्टर) की उपध विधिवत् एक समारोह में प्रदान कर दी गयी। भीमराव के लिए यह जीवन का सबसे बड़ा सखद आनन्द था।

बरसों से संजोया गया उनका सपना पूरा हो गया था। उनको बड़ा आत्मसंतोष और बहुत गहरा सुख मिला।

Dr Bhim Rao Ambedkar story No 3: नाम

 

अपनी प्रतिभा और योग्यता के कारण भीमराव ने अपनी कक्षा के विद्यार्थियों को मात दे रखी थी। अन्य विद्याभीमराव की इस प्रतिभा पर चकित थे।

भीमराव की प्रतिभा के कारण अन्य शिक्षक भी दबे-दबे रहते थे। अगर भीम पढ़ने में ठीक न होते, तो उन्हें सरलता से बाहर निकालकर उस ‘अछूत’ से छुटकारा पा लिया होता।

कुछ समय बाद स्कूल में एक ब्राह्मण शिक्षक आ गये। रामचन्द्र भागवत अम्बेडकर। वह भीमराव की प्रतिभा से अत्यन्त प्रभावित थे। महाराष्ट्र में परम्परा है कि पुत्र अपने नाम के आगे पिता का नाम लगाता हैतब अपना नाम जोड़ता है, तब पुरखों के गांव का नाम जातिवाचक रूप में रखता है।

ब्राह्मण शिक्षक का नाम भागवत था, पिता का नाम रामचन्द्र और पुरखों का गांव अम्बावडे था। उसे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि भीमराव के पुरा का गांव भी अम्बावडे है। “तुम भी अपना नाम बदलकर अम्बेडकर रख लो। अपने नाम के साथ जोड़ लो।’’ भीमराव खुश हो गये। पिता से चर्चा की।

पिता ने सहमति प्रकट की और तब स्कूल के रिकार्ड में उनका नाम भीमराव अम्बेडकर रख दिया गया। वह इसी नाम से जाने लगे।

 

 

Dr. Bhim Rao Ambedkar Story No 4: मूक नायक

 

अम्बेडकर के मन में कुछ करने की भावना थी। लगातार की पीड़ा, आघात और अपमान विद्रोह के रूप में बाहर आने के लिए छटपटा रहा था। उन्होंने एक पाक्षिक पत्र निकालने की योजना बनायी। इसके लिए धन की आवश्यकता थी। वह महाराजा कोल्हापुर से मिले। महाराजा ने प्रेमपूर्वक उनसे वार्ता की। ध्यान से सारी बातें सुनें। जब अम्बेडकर ने पाक्षिक पत्र निकालने की योजना सामने रखी, तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

आप पत्र निकालिएजो सहायता बन पड़ेगी, हम करेंगे।” महाराज का आश्वासन पाकर अम्बेडकर को अत्यन्त प्रसन्नता हुई उन्होंने पाक्षिक पत्र की योजना को कार्यरूप दिया। प्रत्यक्ष रूप से वह पत्रिका के साथ न जुड़ेपर वास्तविक शक्ति वही थे। दलितों का मुखपत्र था-‘मूक नायक’ ।

विज्ञापन अखबारों में दियापर कुछ अखबारों ने दलितों के इस पत्र का विज्ञापन छापने से इंकार कर दिया। इनमें तिलक का अखबार केसरी भी था। डॉक्टर अम्बेडकर के लिए यह एक नया अनुभव था। अम्बेडकर हताश न हुए। 31 जनवरी 1920 को उन्होंने दलितों के मुखपत्र ‘मूक नायक’ पाक्षिक का प्रथम अंक प्रकाशित कर दिया। मूक नायक’ के प्रथम अंक ने ही खलबली मचा दी। अम्बेडकर ने इसमें अपने नाम से एक लेख दिया।

वह चर्चा का विषय बन गया। डॉ. अम्बेडकर ने ‘मूक नायक’ के प्रथमांक में भारत को अछूतों व असमानता का घर बताया। उन्होंने लिखा था कि भारत के स्वतन्त्र होने से पूर्व आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में समानता स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।

 

बिना उसके राजनीतिक आजादी का अर्थ होगा-सत्ता का स्थानांतरणअर्थात् उस ब्राह्मण वर्ग के हाथ में सत्ता का आ जानाजिसके कारण अछूत वर्ग हिन्दू होते हुए भी अपमानित, उपेक्षित और घृणित जीवन जी रहा है।

वही वर्ग सत्ता में आ जायेगा, तो निश्चय ही अछूतों के जीवन में स्थायी अभिशाप कुण्डली मारकर बैठ जायेगा। जब तक अछूतों के लिए मौलिक अधिकारों की गारन्टी नहीं होगी, तब तक स्वराज्य से कोई लाभ नहीं हो सकेगा। स्वराज्य बेमानी होगा।

इस लेख में उच्च वर्ग और ब्राह्मण वर्ग पर सीधी चोट थी। डॉक्टर अम्बेडकर के तर्क अकाट्य थे। उनका चिन्तन तार्किक था और उसकी काट कर पाना सम्भव नहीं था।

मृक नायक’ चर्चा का विषय बन गया। पढ़े लिखे अल्पशिक्षित दलितों में उत्साह आ गया।

 

The Author

Romi Sinha

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