[29*] Bihari Ke Dohe in Hindi – बिहारी के दोहो का हिंदी में अर्थ

Bihari – बिहारी लाल चौबे या बिहार (1595-1663) सदी के  एक हिंदी कवि थे , जो की बृजभाषा में सत्साह  (700 छंद) लिखने के लिए प्रसिद्ध है, जो की लगभग 700 डिलीक्ट्स का एक संग्रह है, जो की हिंदी में  सबसे ज्यादा माने  जाने वाला काम है। आज यह रितिकव्य काल या ‘रीति काल’ (  जिसमे राजाओं के लिए कविताएं लिखी जाती थी )  हिंदी साहित्य की  सबसे प्रसिद्ध किताब मानी  जाती  है। बिहारी का जन्म 1595 में ग्वालियर में हुआ था, और उन्होंने बूढ़ेलखंड क्षेत्र के ओरछा में अपना बचपन बिताया था, जहां उनके पिता केशव राय रहते थे। शादी के बाद वह मथुरा में अपने ससुराल में बस गए। उनके पिता केशव राय जाति से द्विज थे, जिसका अर्थ है क्षत्रिय और उनकी मां एक ब्राह्मण पिता की वंशज थी । Bihari Ke Dohe – बिहारी के दोहो पढ़ने के लिए निचे देखे

bihari ji ka jeevan parichay in hindi -बिहारी  का जीवन परिचय:

अपने जीवन के शुरू  में, उन्होंने प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया। ओरछा राज्य में, उन्होंने प्रसिद्ध कवि केशवदास से मुलाकात की, जिनसे उन्होंने कविता में पाठ लिया। बाद में, जब वह मथुरा में स्थानांतरित कर रहे थे

तो उन्हें मुगल सम्राट शाहजहां की यात्रा के दौरान अदालत में पेश करने का अवसर मिला, उसके बाद वो उनके काम से   से प्रभावित हो गए थे  और उन्हें आगरा में रहने के लिए आमंत्रित किया।

Bihari Ke Dohe
बिहारी ने आगरा में फारसी भाषा सीखी थी जहा पर वो प्रसिद्ध कवि रहिम दास के संपर्क में आये थे । वाह जयपुर के निकट अंबर के राजा जयसिंह ने उन्हें सुन लिया और अपने यहाँ जयपुर के लिए आमंत्रित किया और वहा उन्होंने अपने जीवन की सबसे महान काम सतसाई बनाई थी ।

उन्होंने भक्ति और वैराग्य के पथ का अनुसरण अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद किया। उसके बाद उन्होंने अदालत छोड़ दी और वृंदावन गए, जहां पर उनकी मृत्यु 1663 में हो गयी

SN बिंदु बिहारीलाल जीवन परिचय
1 जन्म  1595, ग्वालियर
2 मृत्यु 1664
3 काल रीती काल, राजा जय सिंह
4 रचना सतसई मुक्तक काव्य
5 अलंकर संयोग, विरह, अतिश्योक्ति, व्यंग

Bihari Ke Dohe  In Hindi – बिहारी के दोहे हिंदी अर्थ सहित

1. सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर।।

कविवर बिहारी कह रहे हैं कि उनकी रचना सतसई के दोहे देखने में छोटे हैं जैसे नावक एक प्रकार का तीर जो बहुत छोटा होता हैं लेकिन गहरा गंभीर घाव छोड़ता हैं |उसी प्रकार सतसई के दोहे छोटे हैं लेकिन उनमे अथाह ज्ञान समाहित हैं |

 

2. नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास यहि काल।अली कली में ही बिन्ध्यो आगे कौन हवाल।।

कविवर बिहारी ने राजा को व्यगं करते हुए यह कहा कि विवाह के बाद वे अपने जीवन में रसमय हो गये हैं और विकास कार्य की तरफ उनका कोई ध्यान नहीं हैं और राजकीय कार्य से भी दूर हैं ऐसे मैं कौन राज्य भार सम्भालेगा

 

3. घर घर तुरकिनि हिन्दुनी देतिं असीस सराहि।पतिनु राति चादर चुरी तैं राखो जयसाहि।।

कविवर बिहारी की वाणी सुनने के बाद राजा जय सिंह को समझ आ गया हैं और उन्होंने राज्य की रक्षा की |

4. मोर मुकुट कटि काछनी कर मुरली उर माल। यहि बानिक मो मन बसौ सदा बिहारीलाल।।

सिर पर मौर मुकुट, पीली धोती और बांसुरी लिए मीठी वाणी बोलने वाला मेरा बिहारी सदा मेरे मन मैं बसा हैं |

 

5. मेरी भववाधा हरौ, राधा नागरि सोय। जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय।।

प्रेम की छाया पड़ने से सभी का रंग बदल जाता हैं उसी प्रकार पीले वर्ण की राधा की छाया जब श्याम सलौने पर पड़ती हैं तब उनका रंग हरा हो जाता हैं |

6. चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न स्नेह गम्भीर। को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर॥

यह जोड़ी लंबी रहे क्यूँ न प्रेम गंभीर हो | एक बैल की बेटी हैं और दूसरा जोतने वाले का भाई |

 

7. करि फुलेल को आचमन मीठो कहत सराहि। रे गंधी मतिमंद तू इतर दिखावत काँहि।।

कर लै सूँघि, सराहि कै सबै रहे धरि मौन। गंधी गंध गुलाब को गँवई गाहक कौन।।

कवी बिहारी मूर्खो को व्यंग कर रहे हैं कि एक इत्र बेचने वाली खुशबु की तारीफ कर उसे बेचने आई हैं अरे मुर्ख खुशबू को तारीफ के शब्दों की क्या जरुरत

 

8. काजर दै नहिं ऐ री सुहागिन, आँगुरि तो री कटैगी गँड़ासा

बिहारी के काव्य में अतिश्योक्ति का परिचय मिलता हैं जैसे कि वे कह रहे हैं हे सुहागवती अपनी आँखों में काजल मत लगा वरना तेरे नैन गड़ासे अर्थात चारा काटने के औजार जैसे कटीले हो जायेंगे |

 

9.  सुनी पथिक मुँह माह निसि लुवैं चलैं वहि ग्राम। बिनु पूँछे, बिनु ही कहे, जरति बिचारी बाम।।

विरह की आग में जल रही प्रेमिका के अंदर इतनी अग्नि होती है मानो माघ के माह में भी लू सी ताप रही हो जैसे की वो किसी लुहार की धौकनी हो |

 

10. मैं ही बौरी विरह बस, कै बौरो सब गाँव। कहा जानि ये कहत हैं, ससिहिं सीतकर नाँव।।

या तो मैं पागल हूँ या सारा गाँव | ये सभी कहते हैं कि चंद्रमा शीतल हैं जबकि माता सीता ने इस चन्द्रमा से कहा था कि मुझे इस तरह विरह की आग में जलता देख यह अग्निरूपी चन्द्रमा भी अग्नि की बारिश नहीं करता (तुलसीदास दोहे अनुसार)

 

11.  कोटि जतन कोऊ करै, परै न प्रकृतिहिं बीच। नल बल जल ऊँचो चढ़ै, तऊ नीच को नीच।।

कोई सौ बार भी प्रयत्न करे किन्तु मनुष्य स्वभाव नहीं बदलता जैसे नल से पानी उपर की तरफ चढ़ तो जाता हैं लेकिन बहता नीचे की तरफ ही हैं |

 

12.  नीकी लागि अनाकनी, फीकी परी गोहारि, तज्यो मनो तारन बिरद, बारक बारनि तारि।

हे ईश्वर अब आप भी आँख मिचौली करने लगे हैं प्रार्थना सुनी अनसुनी करना आपको अच्छा लगने लगा हैं शायद भक्त की पुकार में वो बात नहीं रही शायद एक हाथी को तारने के बाद अब आपने उस और देखना बंद कर दिया हैं

 

13. कब को टेरत दीन ह्वै, होत न स्याम सहाय। तुम हूँ लागी जगत गुरु, जगनायक जग बाय।।

हे कृष्ण मैं कब से आस लगाये तुझे पुकार रहा हूँ लेकिन आप मुझे सुन ही नहीं रहे | हे गुरुवर जगदनाथ क्या तुम भी इस संसार की तरह कठोर हो गये हो |

Class 10 Hindi ke Bihari Ke Dohe In Hindi | बिहारी के दोहे:

1. सोहत ओढ़ैं पीतु पटु स्याम, सलौनैं गात। मनौ नीलमनि सैल पर आतपु परयौ प्रभात॥

इस दोहे में कवि ने कृष्ण के साँवले शरीर की सुंदरता का बखान किया है। कवि का कहना है कि कृष्ण के साँवले शरीर पर पीला वस्त्र ऐसी शोभा दे रहा है, जैसे नीलमणि पहाड़ पर सुबह की सूरज की किरणें पड़ रही हैं।

2. कहलाने एकत बसत अहि मयूर, मृग बाघ। जगतु तपोवन सौ कियौ दीरघ दाघ निदाघ।।

इस दोहे में कवि ने भरी दोपहरी से बेहाल जंगली जानवरों की हालत का चित्रण किया है। भीषण गर्मी से बेहाल जानवर एक ही स्थान पर बैठे हैं। मोर और सांप एक साथ बैठे हैं। हिरण और बाघ एक साथ बैठे हैं। कवि को लगता है कि गर्मी के कारण जंगल किसी तपोवन की तरह हो गया है। जैसे तपोवन में विभिन्न इंसान आपसी द्वेषों को भुलाकर एक साथ बैठते हैं, उसी तरह गर्मी से बेहाल ये पशु भी आपसी द्वेषों को भुलाकर एक साथ बैठे हैं।

3. बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ। सौंह करैं भौंहनु हँसै, दैन कहैं नटि जाइ॥

इस दोहे में कवि ने गोपियों द्वारा कृष्ण की बाँसुरी चुराए जाने का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि गोपियों ने कृष्ण की मुरली इस लिए छुपा दी है ताकि इसी बहाने उन्हें कृष्ण से बातें करने का मौका मिल जाए। साथ में गोपियाँ कृष्ण के सामने नखरे भी दिखा रही हैं। वे अपनी भौहों से तो कसमे खा रही हैं लेकिन उनके मुँह से ना ही निकलता है।

4. कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात। भरे भौन मैं करत हैं नैननु हीं सब बात॥

इस दोहे में कवि ने उस स्थिति को दर्शाया है जब भरी भीड़ में भी दो प्रेमी बातें करते हैं और उसका किसी को पता तक नहीं चलता है। ऐसी स्थिति में नायक और नायिका आँखों ही आँखों में रूठते हैं, मनाते हैं, मिलते हैं, खिल जाते हैं और कभी कभी शरमाते भी हैं।

5. बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन तन माँह। देखि दुपहरी जेठ की छाँहौं चाहति छाँह॥

इस दोहे में कवि ने जेठ महीने की गर्मी का चित्रण किया है। कवि का कहना है कि जेठ की गरमी इतनी तेज होती है की छाया भी छाँह ढ़ूँढ़ने लगती है। ऐसी गर्मी में छाया भी कहीं नजर नहीं आती। वह या तो कहीं घने जंगल में बैठी होती है या फिर किसी घर के अंदर।

6. कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेसु लजात। कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात॥

इस दोहे में कवि ने उस नायिका की मन:स्थिति का चित्रण किया है जो अपने प्रेमी के लिए संदेश भेजना चाहती है। नायिका को इतना लम्बा संदेश भेजना है कि वह कागज पर समा नहीं पाएगा। लेकिन अपने संदेशवाहक के सामने उसे वह सब कहने में शर्म भी आ रही है। नायिका संदेशवाहक से कहती है कि तुम मेरे अत्यंत करीबी हो इसलिए अपने दिल से तुम मेरे दिल की बात कह देना।

7.  प्रगट भए द्विजराज कुल, सुबस बसे ब्रज आइ। मेरे हरौ कलेस सब, केसव केसवराइ॥

कवि का कहना है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं ही ब्रज में चंद्रवंश में जन्म लिया था मतलब अवतार लिया था। बिहारी के पिता का नाम केसवराय था। इसलिए वे कहते हैं कि हे कृष्ण आप तो मेरे पिता समान हैं इसलिए मेरे सारे कष्ट को दूर कीजिए।

8. जपमाला, छापैं, तिलक सरै न एकौ कामु। मन काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै रामु॥

आडम्बर और ढ़ोंग किसी काम के नहीं होते हैं। मन तो काँच की तरह क्षण भंगुर होता है जो व्यर्थ में ही नाचता रहता है। माला जपने से, माथे पर तिलक लगाने से या हजार बार राम राम लिखने से कुछ नहीं होता है। इन सबके बदले यदि सच्चे मन से प्रभु की आराधना की जाए तो वह ज्यादा सार्थक होता है।

9. कहति नटति रीझति खिझति, मिलति खिलति लजि जात । भरे भौन में होत है, नैनन ही सों बात ॥

नायिका नायक से बातें करती है, नाटक करती है, रीझती है, नायक से थोड़ा खीझती है, वह नायक से मिलती है, ख़ुशी से खिल जाती है, और शरमा जाती है. भरी महफिल में नायक और नायिका के बीच में आँखों से हीं बातें होती है.

10. बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय । सौंह करै, भौंहन हँसै, देन कहै नटि जाय ॥

गोपियों ने कृष्ण की मुरली छिपा दी है. और कृष्ण के मुरली माँगने पर वे उनसे स्नेह करती हैं, भौंहें से आपस में इशारे करके हँसती हैं. कृष्ण के बहुत बोलने पर वो मुरली लौटने को तैयार हो जाती हैं, लेकिन फिर मुरली को वापस छिपा लेती हैं.

11. मेरी भववाधा हरौ, राधा नागरि सोय । जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय ।।

हे राधा, तुम्हारे शरीर की छाया पड़ने से तो कृष्ण भी खुश हो जाते हैं. इसलिए तुम मेरी भवबाधा (परेशानी) दूर करो.

 

12. मोर मुकुट कटि काछनी कर मुरली उर माल । यहि बानिक मो मन बसौ सदा बिहारीलाल ।।

हे कृष्ण, तुम्हारे सिर पर मोर मुकुट हो, तुम पीली धोती पहने रहो, तुम्हारे हाथ में मुरली हो और तुम्हारे गले में माला हो. इसी तरह (इसी रूप में) कृष्ण तुम मेरे मन हमेशा बसे रहो.

13. सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर । देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर ।।

सतसई के दोहे वैसे हीं हैं, जैसे नावक के तीर है. ये देखने में छोटे लगते हैं, लेकिन इनमें बड़ी अर्थपूर्ण बातें छिपी होती है.

14. काजर दै नहिं ऐ री सुहागिन, आँगुरि तो री कटैगी गँड़ासा ।।

हे सुहागन तुम काजल मत लगाओ, कहीं तुम्हारी उँगली तुम्हारे गँड़ासे जैसी आँख से कट न जाए.
गँड़ासा – एक हथियार।

15. या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ । ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ ॥

इस अनुरागी चित्त की गति कोई नहीं समझता है. इस चित्त पर जैसे-जैसे श्याम रंग (कृष्ण का रंग) चढ़ता है, वैसे-वैसे यह उजला होता जाता है.

16. नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास यहि काल । अली कली में ही बिन्ध्यो आगे कौन हवाल ।।

न हीं इस काल में फूल में पराग है, न तो मीठी मधु हीं है. अगर अभी से भौंरा फूल की कली में हीं खोया रहेगा तो आगे न जाने क्या होगा. दूसरे शब्दों में, हे राजन अभी तो रानी नई-नई हैं, अभी तो उनकी  युवावस्था आनी बाकि है. अगर आप अभी से हीं रानी में खोए रहेंगे, तो आगे क्या हाल होगा.
राजा जय सिंह अपनी नई पत्नी के प्रेम में इस कदर खो गए थे कि राज्य की ओर उन्होंने बिल्कुल ध्यान देना बंद कर दिया था. तब बिहारी ने इस दोहे को लिखा।

 

 

Bihari Ke Dohe With Meaning In Hindi बिहारी के दोहे एवं उनके हिंदी अर्थ आपको कैसे लगे कमेंट करे

The Author

Romi Sinha

I love to write on JoblooYou can Download Ganesha, Sai Ram, Lord Shiva & Other Indian God

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Jobloo.in © 2017